1941 में भी सावरकर ने यही वादा दोहराया था। इसी कारण डॉ. अंबेडकर ने 1951 में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) का चुनावी घोषणा पत्र तैयार करते समय स्पष्ट किया था कि उनकी पार्टी किसी भी स्थिति में अत्यंत प्रतिगामी हिंदू महासभा या आरएसएस जैसी पार्टियों से कोई गठबंधन नहीं करेगी।

भारत के इतिहास में दो परस्पर विरोधी दार्शनिक और धार्मिक धाराएँ प्राचीन काल से ही एक-दूसरे के खिलाफ घातक संघर्ष में रही हैं। ये धाराएँ आज भी मौजूद हैं। एक ओर है ब्राह्मणवादी धारा, जो ऊँच-नीच की श्रेणी, वर्ण और जाति व्यवस्था को सामाजिक और व्यक्तिगत मूल्यों के साथ-साथ कानून और धर्म दर्शन के रूप में स्थापित करती है, और जो इस व्यवस्था को न मानने वालों को ‘पराया’ ठहराती है। दूसरी ओर है श्रमण धारा, जो समानता, करुणा, ज्ञान, शील और मैत्री को सामाजिक और व्यक्तिगत मूल्यों के रूप में प्रस्तुत करती है, और सभी को ‘अपना’ मानती है। इस धारा का नेतृत्व बुद्ध, बसव और अन्य समान विचारधारा वाले दार्शनिकों ने किया।

डॉ. बी.आर. अम्बेडकर के अनुसार, भारत का इतिहास इन दो धाराओं के बीच के इस घातक संघर्ष का इतिहास है। इस्लाम और ईसाइयत जैसे धर्म, जो मूल रूप से ऊँच-नीच के खिलाफ थे, भारत में आने के बाद यहाँ की अवैदिक (श्रमण) परंपराओं के साथ घुलमिल गए और भारत की मिट्टी में रच-बस गए। ये सभी धाराएँ मिलकर ब्राह्मणवाद के साम्राज्य को चुनौती देती रही हैं। इस चुनौती का सामना करने के लिए ब्राह्मणवाद ने इन धाराओं को नष्ट करने, पराये ठहराने या अपने अधीन करके आत्मसात करने की रणनीति अपनाई। इसके लिए उसने समय-समय पर विभिन्न मुखौटे भी धारण किए।

 हिंदुत्व का मुखौटा और ब्राह्मणवाद की पुनर्स्थापना
ब्रिटिश-विरोधी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, जब भारतीय अस्मिता के आधार पर विदेशी उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष चल रहा था, तब ब्राह्मणवाद ने एक बार फिर अपनी पुनर्स्थापना की रणनीति शुरू की। ‘सभी को अपना बनाने’ की भारतीय परंपरा के विपरीत, विनायक दामोदर सावरकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने ‘हिंदू राष्ट्र’ की अवधारणा पेश की, जिसमें भारतीयता को संस्कृति, जाति और धर्म के आधार पर परिभाषित किया गया। इस अवधारणा ने भारतीय मुसलमानों, ईसाइयों और पारसियों को ‘पराया’ ठहरा दिया। सावरकर ने कहा कि केवल वही भारतीय हैं, जिनके लिए भारत उनकी पितृभूमि और पवित्र भूमि दोनों है।

 हिंदुत्व: ब्राह्मणवाद का एक नया रूप
हिंदुत्व के नाम पर ब्राह्मणवाद ने न केवल इस्लाम और ईसाइयत को पराया ठहराया, बल्कि भारत में जन्मी अवैदिक और गैर-ब्राह्मणवादी परंपराओं—जैसे बौद्ध, जैन, सिख और लिंगायत—को भी अपने अधीन करने की कोशिश की। सावरकर ने अपनी पुस्तक Essentials of Hindutva (1923) में दावा किया कि हिंदुत्व का अर्थ हिंदू धर्म नहीं है, बल्कि भारत में जन्मी सभी परंपराएँ—बौद्ध, जैन, चार्वाक आदि—हिंदुत्व का हिस्सा हैं। RSS के नेताओं, जैसे गोलवलकर और वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत, ने भी यही बात दोहराई कि भारत में जन्मा सब कुछ हिंदुत्व है।

लेकिन सवाल यह है कि यदि RSS वास्तव में भारत में जन्मी सभी परंपराओं को हिंदुत्व मानता है, तो क्या वह इन सभी को समान मानता है? क्या वह ब्राह्मणवाद को ही सर्वोच्च स्थान नहीं देता?

 RSS और सावरकर का असली रुख
इस सवाल का जवाब पाने के लिए दो परीक्षाएँ की जा सकती हैं:
1. गैर-ब्राह्मणवादी दर्शन जैसे बौद्ध, सिख और लिंगायत के प्रति RSS और सावरकर का वास्तविक रुख क्या था?
2. जाति और वर्णाश्रम विरोधी मूल्यों के प्रति RSS के सिद्धांतकारों का दृष्टिकोण क्या था?

इतिहास बताता है कि सावरकर और RSS ने भारत में जन्मे बौद्ध, जैन, सिख, लिंगायत और आदिवासियों की सर्ना जैसी अवैदिक और वैदिक-विरोधी परंपराओं को कभी समान नहीं माना। इसके बजाय, इन परंपराओं को या तो खत्म करने, या उनके समानतावादी सार को हटाकर उन्हें ब्राह्मणवादी ‘विराट हिंदू’ ढांचे में शामिल करने की कोशिश की गई।

उदाहरण के लिए, RSS के दूसरे सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर ने अपनी पुस्तक *Bunch of Thoughts* में स्पष्ट रूप से कहा कि भारत की रक्षा ‘धर्मसत्ता’ यानी ‘ब्राह्मण साम्राज्य’ ने की। उन्होंने लिखा कि जब-जब इस धर्मसत्ता पर हमला हुआ, तब ब्राह्मण संतों ने क्षत्रियों का मार्गदर्शन कर भारत को बचाया। उदाहरण के तौर पर, उन्होंने रामायण का हवाला देते हुए कहा कि रावण के समय में विश्वामित्र, वशिष्ठ और अगस्त्य जैसे ब्राह्मण संतों ने राम को राष्ट्र रक्षा का संकल्प दिलाया।

 बुद्ध और बसव को ‘देशद्रोही’ ठहराना
गोलवलकर ने बौद्ध धर्म को ‘धर्मग्लानि’ का कारण बताया और कहा कि शंकराचार्य ने भारत को इस ‘खतरे’ से बचाया। उनकी पुस्तक में लिखा है कि बौद्ध धर्म ने मातृभूमि और मातृसमाज के साथ ‘द्रोह’ किया। उन्होंने यह भी कहा कि बौद्ध धर्म को एक अलग पंथ के रूप में भारत से मिटा दिया गया, और बुद्ध को केवल ‘देवता का अवतार’ बनाकर रखा गया। गोलवलकर ने सिख और लिंगायत परंपराओं को भी ‘राष्ट्र सुरक्षा के लिए खतरा’ माना और उन्हें ‘देशद्रोही’ करार दिया।

इसी तरह, सावरकर ने अपनी पुस्तक *Six Glorious Epochs of Indian History* में बौद्ध धर्म को भारत के लिए ‘देशद्रोही’ ठहराया। उनके अनुसार, शांति, अहिंसा और समानता की बात करने वाले दर्शन राष्ट्र निर्माण के लिए आवश्यक ‘क्रूरता’ और ‘द्वेष’ को कमजोर करते हैं। सावरकर ने पुष्यमित्र शुंग द्वारा बौद्धों के नरसंहार को सही ठहराया और इसे ‘राष्ट्र रक्षा’ का कार्य बताया।

 मनुस्मृति को सर्वोच्च स्थान
सावरकर और RSS का ब्राह्मणवादी रुख केवल अवैदिक परंपराओं तक सीमित नहीं था। उन्होंने मनुस्मृति को भी भारतीय संस्कृति का आधार माना। सावरकर ने 1932 में लिखा कि वेदों के बाद मनुस्मृति ही वह ग्रंथ है, जिसे हिंदू राष्ट्र सर्वोच्च सम्मान देता है। यह ग्रंथ भारतीय संस्कृति, परंपराओं और आचार-विचारों का आधार है। उन्होंने यह भी कहा कि मनुस्मृति आज भी भारत के करोड़ों लोगों के जीवन का मार्गदर्शन करती है और यह हिंदू कानून है।

यह वही मनुस्मृति है, जिसे डॉ. अम्बेडकर ने 1927 में दलितों, महिलाओं और मानवता के खिलाफ होने के कारण सार्वजनिक रूप से जलाया था। अम्बेडकर ने स्पष्ट कहा था कि अस्पृश्यता का मूल हिंदू धर्म और मनुस्मृति में है। लेकिन सावरकर ने मनुस्मृति की आलोचना को खारिज करते हुए कहा कि यह अन्य प्राचीन सभ्यताओं के सामाजिक नियमों से श्रेष्ठ है।

 संविधान और RSS का विरोध
1949 में जब भारत का संविधान तैयार हुआ, जो समानता और न्याय के मूल्यों पर आधारित था, तब RSS ने इसे भी स्वीकार नहीं किया। RSS के मुखपत्र *ऑर्गनाइज़र* ने 30 नवंबर 1949 को लिखा कि संविधान में कुछ भी भारतीय नहीं है। उन्होंने मनुस्मृति की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह विश्व की सबसे प्राचीन और सम्मानित कृति है, लेकिन संविधान निर्माताओं के लिए इसका कोई मूल्य नहीं।

 निष्कर्ष: हिंदुत्व या ब्राह्मणवाद?
RSS और सावरकर का हिंदुत्व वास्तव में ब्राह्मणवाद का पर्याय है। यह बुद्ध, बसव और अम्बेडकर जैसे समानतावादी विचारकों के खिलाफ है। यह वह विचारधारा है, जो भारत की अवैदिक और गैर-ब्राह्मणवादी परंपराओं को या तो नष्ट करना चाहती है या उन्हें अपने अधीन करना चाहती है।

कुछ बौद्ध और लिंगायत अनुयायी यह दावा करते हैं कि वे धार्मिक रूप से हिंदू नहीं हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर हिंदुत्ववादी हैं। यह आत्मवंचना है। RSS का हिंदुत्व बुद्ध-विरोधी, बसव-विरोधी और श्रमण भारत-विरोधी है। यह भारत की समावेशी और समानतावादी परंपराओं के खिलाफ एक ब्राह्मणवादी साजिश है, जिसे समझना और उसका विरोध करना आज के समय की माँग है।

*स्रोत: विभिन्न ऐतिहासिक दस्तावेज़, सावरकर की पुस्तकें, और गोलवलकर के लेखन।*

 

Source: Vartha Bharathi  ( Translate in hindi)