जी हाँ, आज हम इसी मुद्दे पर बात करेंगे। तमाम एग्ज़िट पोल के अनुमान इस बार लगभग गलत साबित हुए। नीतीश कुमार—जिन्हें अक्सर “पालतू राम” और “मौकापरस्त” कहकर आलोचना की जाती रही—ने इस बार बंपर जीत हासिल कर ली। सवाल कई हैं, क्योंकि एक तरफ आरजेडी-कांग्रेस और दूसरी तरफ भाजपा-जेडीयू के बीच कड़ा मुकाबला बताया जा रहा था। तीसरे मोर्चे के रूप में जनस्वराज पार्टी और एआईएमआईएम का भी ज़िक्र था। एआईएमआईएम को जहाँ 5 सीटें मिलती नज़र आ रही हैं, वहीं वाम दलों को सात सीटों पर सफलता मिली है।

ख़ैर, बिहार में एक बार फिर नीतीश राज तय माना जा रहा है। भाजपा-जेडीयू गठबंधन ने महागठबंधन को स्पष्ट रूप से मात दे दी। इन सबके बीच यह भी दिखा कि मुस्लिम वोट इस बार बिखरे हुए नज़र आए।

हर चुनाव की तरह सवाल उठते हैं, और चुनाव के बाद वही सवाल खामोश हो जाते हैं। अक्सर कहा जाता है कि भाजपा को अब कोई हरा नहीं सकता, क्योंकि वोट चोरी, ईवीएम की गड़बड़ियों और वीवीपैट की पर्चियाँ सड़कों पर मिलने जैसी घटनाओं की चर्चा होती रहती है। लेकिन भाजपा की जीत के बाद उठने वाले ये सवाल भी बेमानी हो जाते हैं, क्योंकि राजनीति में जो जीता वही सिकंदर

इस बार मैथिला ठाकुर की जीत भी सुर्खियों में है, जिन्हें बिहार की सबसे युवा विधायक के तौर पर पेश किया जा रहा है। मैथिला ठाकुर अपने विवादित बयानों, खासकर मुसलमानों के खिलाफ तीखी टिप्पणी के लिए जानी जाती हैं। जिस अलीनगर सीट से वह जीती हैं, चुनाव से पहले उन्होंने कहा था कि जीतने पर “अलीनगर का नाम बदलकर ‘सीतानगर’ रखा जाएगा।” दिलचस्प बात यह है कि जिस सीट पर उनका आरोप है कि वे “नफरत की राजनीति” करती हैं, वहीं उनके खिलाफ तीन मुस्लिम उम्मीदवार भी थे। कुल ग्यारह प्रत्याशी मैदान में थे और पाँच हज़ार से अधिक वोट नोटा को मिले।

ऐसे कई हल्के हैं जहाँ भाजपा और जेडीयू को बेहद आसान जीत मिली है। भाजपा की जीत पर कुछ लोग सिर्फ इसलिए खुश हैं क्योंकि कांग्रेस हार गई। उनकी सोच का अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि भाजपा की जीत पर भी कुछ मुसलमान खुश दिखाई देते हैं। कुछ राजनीतिक दल सोशल मीडिया पर अजीब-सा नैरेटिव चला रहे हैं—“भाजपा जीत जाए कोई फ़रक नहीं, बस कांग्रेस या महागठबंधन न जीते।” लालटेन के गिरने पर मज़े लिए जा रहे हैं। इस मानसिकता को आखिर क्या कहा जाए?

अब वोट चोरी और ईवीएम की कहानियों पर मातम मनाने का कोई फ़ायदा नहीं। ज़मीनी हकीकत कुछ और ही है। चुनाव में जीत-हार पर शक-शुब्हा अपनी जगह है, लेकिन राजनीति में शक की कोई कीमत नहीं—नतीजा ही असली हक़ीक़त होता है।

सियासी जानकार पाँच प्रमुख वजहें बता रहे हैं:

1. महिलाओं तक पहुँचे आर्थिक लाभ:
बिहार की महिलाओं को दस-हज़ार रुपये तक की आर्थिक मदद ने उनकी भारी भागीदारी सुनिश्चित की, जिसका लाभ सीधे जेडीयू को मिला। 2020 में जेडीयू 43 सीटों पर थी, अब वह बढ़कर 101 सीटों पर पहुँच गई है।

2. महिलाओं को 35% आरक्षण और शराबबंदी:
महिलाओं के लिए 35% आरक्षण और शराबबंदी से घरेलू विवादों में कमी आई। शराबबंदी ने कई परिवारों को टूटने से बचाया—इससे महिला वोट बड़े पैमाने पर नीतीश कुमार के पक्ष में गया।

3. आरजेडी का यादव-मुस्लिम इमेज:
तेजस्वी यादव की आरजेडी को यादव-मुस्लिम पार्टी के रूप में प्रचारित किया गया, जिससे भाजपा का “हिन्दुत्व वोट” मजबूती से एकजुट रहा। पिछली बार 75 सीटें जीतने वाली आरजेडी इस बार 35 पर सिमट गई। कांग्रेस 5 सीटों तक रह गई। सीपीआई(M) 12 से घटकर 7 पर आ गई।

4. दिल्ली धमाकों के बाद माहौल:
दिल्ली धमाकों के बाद बनाए गए माहौल का असर दूसरे चरण के चुनाव पर पड़ा—ऐसा कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है। कहते हैं कि अब जनता में उतना उत्साह भी नहीं बचा, क्योंकि आम धारणा यह है कि “जब तक ईवीएम है, भाजपा हर जगह जीतती ही रहेगी।” हालांकि दक्षिण भारत में भाजपा उतनी सफल नहीं हो पा रही—जो अपने आप में बड़ा सवाल है।

5. स्ट्रॉन्ग रूम विवाद और वीवीपैट पर्चियाँ:
सासाराम में स्ट्रॉन्ग रूम में ट्रक घुसने पर हंगामा हुआ। आरजेडी कार्यकर्ताओं ने वहीं धरना दिया। सीसीटीवी रिपेयर की कहानी सुनाई गई, लेकिन ट्रक में तीन बॉक्स क्या थे, यह सवाल अब भी बना है। अलग से वीवीपैट पर्चियाँ सड़क पर मिलने की घटना के बाद कुछ अधिकारियों को सस्पेंड किया गया। न जाने ऐसी कितनी घटनाएँ होंगी जो खामोशी से दबा दी जाती हैं।


इन सबके बीच मुसलमानों पर अफसोस होता है—क्योंकि भाजपा की जीत को कुछ मुसलमान अपनी जीत के रूप में देख रहे हैं। जबकि पूरे देश में UCC लागू होने जा रहा है, और जब भविष्य की आशंकाओं का ज़िक्र किया जाता है, तो कुछ लोग इसे “कांग्रेस के समर्थन” का बहाना बता देते हैं।

अगर मान भी लिया जाए कि कांग्रेस पूरी तरह हार चुकी है, तब भी भाजपा की जीत पर खुश होना या उसे “अपनी जीत” बताना क्या वाकई मुसलमानों के हित में है?

एआईएमआईएम 5 सीटें जीत रही है।
प्रशांत किशोर की पार्टी का तो खाता भी नहीं खुला, जबकि वे लगातार सभाएँ कर रहे थे। उन्होंने दावा किया था कि जेडीयू 25 सीटों से आगे नहीं जाएगी, जो पूरी तरह गलत साबित हुआ।


अब बड़ा सवाल यह है कि क्या बिहार में हिन्दुत्व की विचारधारा और मजबूत होगी?
भाजपा भले ही हिन्दू-मुस्लिम की राजनीति करती है, लेकिन नीतीश कुमार का लंबा राजनीतिक सफर इससे बहुत अलग रहा है। देशभर में हिन्दुत्व का असर अब कम होता दिख रहा है। मुद्दों पर चुनाव लड़ने की बातें हो रही हैं, लेकिन विरोध के बावजूद भाजपा की जीत कई सवाल खड़े करती है। राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की रैलियों में भारी भीड़ दिखी, जबकि कई जगह मोदी की रैलियों में खाली कुर्सियों की तस्वीरें वायरल हुईं।

जो भी हो—बिहार चुनाव में नीतीश कुमार का जादू फिर चल गया
लेकिन सवाल उस कौम का है—जो आज भी सियासी मैदान में बुरी तरह नाकाम है। जबकि फैसले ईवीएम, चुनाव आयोग और सरकारी एजेंसियाँ लेती हैं, मुसलमान अभी भी कौमी इत्तेहाद के बजाय सियासी इत्तेहाद में उलझे हुए हैं।

इतना ज़रूर…