सीबीएफसी द्वारा फिल्म ‘द वॉइस ऑफ हिंद रजब’ पर कथित मौखिक रोक लगाए जाने को लेकर विपक्षी संसदों ने सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव को पत्र लिखकर रोक पर सवाल उठाए हैं. यह फिल्म एक वास्तविक घटना पर आधारित है, जिसमें गाज़ा में इज़रायली सेना के हमले के दौरान एक कार में फंसी पांच वर्षीय फिलिस्तीनी बच्ची की मौत हो गई थी.

 

नई दिल्ली: आठ सांसदों ने सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव को पत्र लिखकर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) द्वारा फिल्म ‘द वॉइस ऑफ हिंद रजब पर कथित मौखिक रोक लगाए जाने का विरोध किया है.

फिल्म के वितरक और मुंबई स्थित जय विराट्रा एंटरटेनमेंट के प्रमुख मनोज नंदवाना ने कहा था कि फिल्म को सीबीएफसी द्वारा इसलिए रोका जा रहा है क्योंकि यह ‘बहुत संवेदनशील’ है. उन्होंने यह भी बताया कि बोर्ड के एक सदस्य ने अनौपचारिक रूप से चिंता जताई थी कि फिल्म की रिलीज़ से भारत-इज़रायल संबंधों पर असर पड़ सकता है.

ज्ञात हो कि यह फिल्म एक वास्तविक घटना पर आधारित है, जिसमें गाजा में इज़रायली सेना के हमले के दौरान एक कार में फंसी पांच वर्षीय फिलिस्तीनी बच्ची की मौत हो गई थी. फिल्म पर लगी रोक को लेकर फिल्म के निर्देशक समेत कई लोगों ने भारत-इज़रायल संबंधों की ‘संवेदनशीलता’ पर सवाल उठाए हैं.

सांसदों ने सरकार से आग्रह किया है कि वह तुरंत हस्तक्षेप करते हुए सीबीएफसी को निर्देश दे कि फिल्म की जांच अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप की जाए.

इस पत्र पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के जॉन ब्रिटास, कांग्रेस के जयराम रमेश, समाजवादी पार्टी के राम गोपाल यादव और जावेद अली खान, राष्ट्रीय जनता दल के मनोज कुमार झा, डीएमके की सलमा, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के हारिस बीरन और झारखंड मुक्ति मोर्चा के सरफराज अहमद के हस्ताक्षर हैं.

पत्र में सांसदों ने लिखा है:

हम इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए आपको लिख रहे हैं कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराही गई फिल्म ‘द वॉइस ऑफ हिंद रजब’ को मौखिक रूप से प्रमाणन देने से इनकार कर दिया है, जिससे भारत में इसके सार्वजनिक प्रदर्शन पर प्रभावी रूप से रोक लग गई है. हम आपसे इस मामले में आपके तत्काल व्यक्तिगत हस्तक्षेप का आग्रह करते हैं, क्योंकि यह मुद्दा कलात्मक स्वतंत्रता, संस्थागत विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक मूल्यों तथा सांस्कृतिक खुलेपन के प्रति भारत की प्रतिबद्धता पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है.

ट्यूनीशिया में निर्मित और काउथर बेन हानिया द्वारा निर्देशित यह फिल्म 2024 के गाजा संघर्ष के दौरान एक फिलिस्तीनी बच्चे की वास्तविक हत्या की घटना पर आधारित है. यह फिल्म अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक पहचान हासिल कर चुकी है और ऑस्कर के लिए नामांकित भी रही है. समकालीन मानवीय मुद्दों से जुड़ाव के कारण इसे वैश्विक स्तर पर व्यापक आलोचनात्मक ध्यान मिला है. हालांकि, रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि भारत में इसके वितरक को मौखिक रूप से सूचित किया गया है कि इसे प्रमाणन नहीं दिया जा सकता. यह तरीका इस बात को लेकर गंभीर चिंता पैदा करता है कि क्या फिल्म प्रमाणन की वैधानिक प्रक्रिया से इतर किसी अन्य कारकों ने निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित किया है. किसी फिल्म का प्रदर्शन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है, जिसे संवैधानिक ढांचे में संरक्षण प्राप्त है और इसे कथित कूटनीतिक संबंधों के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता.

सिनेमा ऐतिहासिक रूप से एक ऐसा महत्वपूर्ण माध्यम रहा है, जिसके जरिए समाज जटिल ऐतिहासिक, राजनीतिक और मानवीय प्रश्नों के साथ संवाद करता है. यह हमारे संवैधानिक लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है कि कलात्मक अभिव्यक्ति को अनौपचारिक या अपारदर्शी तरीकों से सीमित नहीं किया जा सकता. सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 एक पारदर्शी और तर्कसंगत प्रमाणन प्रक्रिया का प्रावधान करता है, जिसमें फिल्मों के सार्वजनिक प्रदर्शन से जुड़े निर्णय केवल वैधानिक आधार पर लिए जाते हैं. इस प्रक्रिया से किसी भी प्रकार का विचलन, जैसे मौखिक निर्देश या अनौपचारिक सलाह, जो अंततः प्रमाणन से इनकार का कारण बनते हैं, संस्थागत विश्वसनीयता को कमजोर करते हैं और रचनात्मक स्वतंत्रता की रक्षा करने वाली संस्थाओं पर सार्वजनिक विश्वास को कम करते हैं.

यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि उक्त फिल्म समकालीन वैश्विक महत्व के मुद्दों को संबोधित करती है. किसी फिल्म में प्रस्तुत दृष्टिकोण से असहमति मात्र उसके सार्वजनिक प्रदर्शन पर रोक लगाने का वैध आधार नहीं हो सकती. भारत की लोकतांत्रिक ताकत इस बात में निहित है कि वह विभिन्न विचारों को सार्वजनिक मंच पर परखने और उन पर बहस करने की अनुमति देता है. प्रमाणन के वैधानिक मानकों से इतर विचारों, जैसे कथित भू-राजनीतिक संवेदनशीलताओं, पर आधारित निर्णय एक ऐसी अवांछनीय मिसाल कायम करेंगे, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार के अनुरूप नहीं है.

भारत की सभ्यतागत परंपरा लंबे समय से विचारों की विविधता और कलात्मक व्याख्याओं को अपनाती रही है. जटिल या असहज विषयों से संवाद ने कभी भी हमारे लोकतंत्र को कमजोर नहीं किया है, बल्कि इससे सार्वजनिक विमर्श समृद्ध हुआ है और लोकतांत्रिक मजबूती बढ़ी है. इसलिए यह मुद्दा केवल एक फिल्म तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति भारत की संवैधानिक प्रतिबद्धता और वैश्विक सांस्कृतिक परिदृश्य में उसकी नियामक संस्थाओं की विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ है.

इस परिप्रेक्ष्य में हम सरकार से आग्रह करते हैं कि वह सीबीएफसी को तत्काल निर्देश जारी करे, ताकि फिल्म ‘द वॉइस ऑफ हिंद रजब’ को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप परखा जाए और इसे जल्द से जल्द प्रमाणन दिया जाए. भारत की लोकतांत्रिक ताकत इस स्थायी विश्वास में निहित है कि विचारों, कथाओं और कलात्मक अभिव्यक्तियों को खुले दिमाग से परखा जाना चाहिए, न कि पपहले से ही नियंत्रण लगाकर.

Source: The Wire