कर्नाटक के मंत्री प्रियंक खड़गे ने आरएसएस को लेकर जो सवाल उठाए हैं, वे सिर्फ़ किसी संगठन की रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया तक सीमित नहीं हैं। यह बहस भारत के लोकतंत्र, संविधान, पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा बन चुकी है।
जब कोई संगठन खुद को देश का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन बताता हो, लाखों सदस्यों का दावा करता हो और बड़े पैमाने पर चंदा व संसाधनों का प्रबंधन करता हो, तो उसकी गतिविधियों, वित्तीय स्रोतों और सार्वजनिक जवाबदेही को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सबसे पहले यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि भारत में हर सामाजिक या सांस्कृतिक संगठन का एक ही कानून के तहत पंजीकृत होना अनिवार्य नहीं है। लेकिन अगर कोई संगठन देश के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन पर गहरा प्रभाव रखता है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में उससे पारदर्शिता और जवाबदेही की अपेक्षा भी बढ़ जाती है।
देश में काम करने वाले अनेक ट्रस्ट, एनजीओ, धार्मिक और सामाजिक संगठन अपने वार्षिक लेखे-जोखे, आय के स्रोत और खर्च का विवरण सार्वजनिक करते हैं। ऐसे में देश के सबसे प्रभावशाली संगठनों में गिने जाने वाले आरएसएस की वित्तीय व्यवस्था और आंतरिक प्रशासनिक ढांचे को लेकर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
जब आरएसएस से पारदर्शिता और जवाबदेही के बारे में सवाल पूछे जाते हैं, तो संगठन प्रमुख मोहन भागवत का जवाब आता है—“क्या हिंदू धर्म रजिस्टर्ड है?” कुछ राजनेता यह भी पूछते हैं कि “क्या आपने आतंकवादी संगठनों के रजिस्ट्रेशन की मांग की है?”
आलोचकों का कहना है कि ऐसी प्रतिक्रियाएं मूल सवाल से ध्यान भटकाने की कोशिश हैं। यहां चर्चा हिंदू धर्म की नहीं, बल्कि आरएसएस नामक एक संगठन की हो रही है। हिंदू धर्म एक विशाल आस्था और परंपरा का नाम है, जबकि आरएसएस एक विशिष्ट विचारधारा, नेतृत्व और संगठनात्मक ढांचे वाला संगठन है।
इसी तरह आतंकवादी संगठनों से तुलना भी अप्रासंगिक मानी जाती है। आरएसएस स्वयं को लोकतांत्रिक देश में कार्यरत एक सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन बताता है। इसलिए बहस का केंद्र यह होना चाहिए कि वह सार्वजनिक जवाबदेही और पारदर्शिता के मानकों पर कितना खरा उतरता है।
भारत का संविधान देश को एक “सार्वभौम, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य” घोषित करता है। संविधान का अनुच्छेद 14 समानता, अनुच्छेद 15 भेदभाव निषेध और अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। भारत की राष्ट्रीय पहचान किसी एक धर्म पर आधारित नहीं, बल्कि विविध संस्कृतियों, भाषाओं और परंपराओं के समन्वय पर टिकी है।
आरएसएस के वैचारिक प्रेरणास्रोत माने जाने वाले एम.एस. गोलवलकर की पुस्तकों “We, or Our Nationhood Defined” और “Bunch of Thoughts” में प्रस्तुत हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को लेकर दशकों से बहस होती रही है। संविधान को सर्वोच्च मानने वाले विचारकों का मानना है कि यह अवधारणा भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी मूल्यों से टकराती है।
इस संदर्भ में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों को याद करना भी महत्वपूर्ण है। अपनी प्रसिद्ध कृति “Annihilation of Caste” में उन्होंने जाति और धर्म के आधार पर समाज को बांटने वाली व्यवस्थाओं की आलोचना की थी। वहीं “Pakistan or Partition of India” में उन्होंने हिंदू और मुस्लिम दोनों प्रकार के सांप्रदायिकवाद की आलोचना की थी। आंबेडकर ने स्पष्ट रूप से कहा था कि “हिंदू राज” भारत के लोकतंत्र के लिए ख़तरा साबित हो सकता है।
आज देश जिन चुनौतियों का सामना कर रहा है, उनमें नीट पेपर लीक, किसानों की आत्महत्या, बेरोजगारी, निजीकरण, महंगाई, महिलाओं पर अत्याचार, दलितों पर हमले, ऑनर किलिंग, भ्रष्टाचार और सामाजिक असमानताएं शामिल हैं। आलोचकों का आरोप है कि इन मुद्दों पर आरएसएस ने कभी व्यापक जनआंदोलन खड़ा नहीं किया, जबकि उसका ध्यान अक्सर हिंदुत्व, हिंदू-मुस्लिम संबंधों और धार्मिक पहचान के मुद्दों पर केंद्रित रहा है।
आरएसएस समर्थक संगठन के सेवा कार्यों, शिक्षा संस्थानों और सामाजिक परियोजनाओं का उल्लेख करते हैं। लेकिन विरोधियों का तर्क है कि सार्वजनिक जीवन में संघ परिवार की सबसे अधिक चर्चा धार्मिक राजनीति, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सामाजिक ध्रुवीकरण से जुड़ी रहती है।
एक और अहम सवाल वित्तीय पारदर्शिता का है। जब कोई संगठन देशभर से चंदा इकट्ठा करता है और बड़े पैमाने पर संपत्तियों का संचालन करता है, तो उसकी आय और खर्च का सार्वजनिक रिकॉर्ड उपलब्ध होना चाहिए। आयकर कानून, ट्रस्ट कानून, सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, कंपनी कानून और एफसीआरए जैसे नियम आम तौर पर ऐसी संस्थाओं पर लागू होते हैं।
लोकतंत्र में प्रभाव जितना बड़ा होता है, जवाबदेही की अपेक्षा भी उतनी ही बढ़ती है। यह सिद्धांत केवल सरकारों पर ही नहीं, बल्कि समाज पर प्रभाव डालने वाले सभी संगठनों पर लागू होना चाहिए।
डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा में चेतावनी दी थी कि किसी व्यक्ति, नेता या संगठन को संविधान से ऊपर मानने की प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए घातक हो सकती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई भी संस्था सवालों और सार्वजनिक समीक्षा से परे नहीं हो सकती।
भारत की ताकत उसकी विविधता में है। देश की पहचान किसी हिंदू राष्ट्र या मुस्लिम राष्ट्र की अवधारणा में नहीं, बल्कि संविधान आधारित नागरिक राष्ट्र की सोच में निहित है।
इसीलिए प्रियंक खड़गे द्वारा उठाए गए सवालों को केवल राजनीतिक बयानबाज़ी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। असली प्रश्न यह है कि क्या लाखों सदस्यों और व्यापक सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव वाला कोई संगठन सार्वजनिक जवाबदेही और वित्तीय पारदर्शिता से बाहर रह सकता है?
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा दिया गया संविधान किसी भी व्यक्ति, पार्टी या संगठन से बड़ा है। भारत का भविष्य धार्मिक राष्ट्रवाद में नहीं, बल्कि समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक मूल्यों की रक्षा में निहित है।
इसलिए आरएसएस सहित देश की हर प्रभावशाली संस्था से पारदर्शिता, जवाबदेही और सार्वजनिक निरीक्षण की अपेक्षा करना लोकतंत्र विरोधी नहीं, बल्कि लोकतंत्र की स्वाभाविक और न्यायसंगत मांग है। क्योंकि लोकतंत्र में कोई भी कानून से ऊपर नहीं होता और न ही कोई संस्था सार्वजनिक जवाबदेही से मुक्त हो सकती है।
Source: Vartha Bharathi (Translated in hindi)

