एथेनॉल फ्यूल पॉलिसी ने उपभोक्ताओं के अधिकार और पसंद पर नए सवाल खड़े किए
कभी सरकारें जनता को सुविधाएं देती थीं, अब तजुर्बे देती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले लैबोरेटरी में चूहों पर एक्सपेरिमेंट होते थे, अब सड़कों पर गाड़ी चलाने वाले आम नागरिकों पर। एथेनॉल मिश्रित ईंधन (E20) भी शायद उसी सिलसिले की एक कड़ी है। इसे “ग्रीन रिवोल्यूशन”, “एनर्जी में आत्मनिर्भरता” और “रोशन मुस्तकबिल” जैसे आकर्षक नारों के साथ पेश किया जा रहा है। ऐसा माहौल बनाया गया है कि अगर कोई सवाल पूछे तो उसे पर्यावरण का दुश्मन, तरक्की का विरोधी और शायद देशहित के खिलाफ मान लिया जाए।
हैरानी इस बात की नहीं कि सरकार एथेनॉल को बढ़ावा दे रही है, बल्कि इस बात की है कि इसे इस तरह लागू किया जा रहा है जैसे जनता की गाड़ियां नहीं, सरकारी फाइलें हों—आज आदेश जारी हुआ और कल से सब कुछ बदल गया।
असल सवाल यह नहीं कि एथेनॉल अच्छा है या बुरा। सवाल यह है कि क्या हर गाड़ी इसके लिए तैयार है? क्या लाखों पुरानी बाइक, कार और कमर्शियल वाहन इस बदलाव को आसानी से झेल पाएंगे? जब ऑटोमोबाइल इंजीनियर, विशेषज्ञ और खुद वाहन निर्माता कंपनियां कुछ तकनीकी चिंताएं जता रही हैं, तो क्या उनकी आवाज़ को भी “तरक्की विरोधी” कहकर नजरअंदाज कर दिया जाए?
सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि उपभोक्ता से उसकी पसंद का अधिकार ही छीन लिया गया है। अगर कोई व्यक्ति E0 या E10 ईंधन इस्तेमाल करना चाहता है तो उसके पास विकल्प कहां है? यह कैसा मुक्त बाजार है, जहां ग्राहक अपनी जरूरत और पसंद के मुताबिक ईंधन ही नहीं चुन सकता? यह ऐसा ही है जैसे किसी रेस्टोरेंट के बाहर लिख दिया जाए कि “आज वही खाना मिलेगा जो सरकार को पसंद है, आपकी पसंद बाद में देखी जाएगी।”
सरकारी दावे कहते हैं कि यह सब देशहित में किया जा रहा है। लेकिन आम लोग पूछ रहे हैं कि अगर सब कुछ इतना ही फायदेमंद है तो माइलेज कम होने की शिकायतें क्यों सामने आ रही हैं? गाड़ियों की कम्पैटिबिलिटी (अनुकूलता) पर बहस क्यों हो रही है? और उपभोक्ताओं को पूरी वैज्ञानिक जानकारी देने में हिचकिचाहट क्यों दिखाई जा रही है? पारदर्शिता भरोसा पैदा करती है, लेकिन जब सवालों के जवाब विज्ञापनों से दिए जाएं तो शक पैदा होना स्वाभाविक है।
विडंबना यह है कि हर नई परेशानी को “राष्ट्रीय सेवा” का नाम दे दिया जाता है। अगर गाड़ी कम चले तो देशभक्ति, अगर इंजन प्रभावित हो तो पर्यावरण संरक्षण, और अगर उपभोक्ता सवाल पूछे तो उसे सब्र करने की सलाह! ऐसा लगता है कि अब गाड़ी के इंजन से ज्यादा नागरिकों के धैर्य की परीक्षा ली जा रही है।
पर्यावरण की सुरक्षा निश्चित रूप से समय की जरूरत है। लेकिन ग्रीन पॉलिसी का मतलब यह नहीं कि जनता को अंधेरे में रखा जाए। टिकाऊ विकास (Sustainable Development) भरोसे से हासिल होता है, जबरदस्ती से नहीं। अगर सरकार को अपनी नीति पर पूरा विश्वास है, तो फिर E0, E10 और E20—तीनों विकल्प जनता के सामने रखे जाएं, पूरी वैज्ञानिक जानकारी साझा की जाए और अंतिम फैसला उपभोक्ता पर छोड़ा जाए। आखिर लोकतंत्र में भरोसा बनाया जाता है, थोपा नहीं जाता।
यह मामला सिर्फ ईंधन का नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं के बुनियादी अधिकारों का भी है। जब करोड़ों वाहन मालिकों को उनकी पसंद के बिना एक नए ईंधन की ओर धकेला जाता है, तो यह सिर्फ एक नीति नहीं बल्कि दबाव महसूस होने लगता है।
अब समय आ गया है कि सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे का गंभीरता से संज्ञान ले। अगर E20 वास्तव में बेहतर विकल्प है, तो उसे तथ्यों, वैज्ञानिक प्रमाणों और तर्कों के आधार पर स्वीकार कराया जाए, न कि मजबूरी के जरिए। वरना इतिहास इसे “ग्रीन रिवोल्यूशन” से ज्यादा “हरे रंग में लिपटी मजबूरी” के रूप में याद कर सकता है।
लेखक: जमी़ल अहमद मिलनसार, बेंगलुरु

