तलबा की आवाज़, हुकूमत का इम्तिहान – अब देखना ये है कि मुज़ाहिरीन नौजवानों के मुतालिबात का क्या होगा?

हज़ारों-लाखों अरमान और उम्मीदों के साथ नौजवान तलबा इम्तिहानों में शामिल होते हैं। अपनी कामयाबी के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं और सरकारी इम्तिहानी निज़ाम पर भरोसा रखते हैं कि उनकी मेहनत का इंसाफ़ होगा। लेकिन बार-बार पेपर लीक होने की वजह से उनका ये एतिमाद बुरी तरह टूट रहा है।

हर बार इम्तिहान रद्द होना, दोबारा तैयारी करना और फिर नए सिरे से परीक्षा देना तलबा के लिए बेहद मुश्किल और ज़ेहनी तौर पर थका देने वाला मरहला बन जाता है। कई मामलों में मायूस तलबा ने अपनी ज़िंदगी तक खत्म कर ली, जिससे उनके ख़्वाब भी उनके साथ दफ़्न हो गए। ऐसे हालात में वालिदैन और ख़ानदान सिर्फ़ अफ़सोस कर सकते हैं, क्योंकि सरकारी लापरवाही का जवाब उन्हें कहीं नहीं मिलता।

इस साल 3 मई 2026 को NEET-UG का इम्तिहान मुल्क भर में कराया गया। लेकिन 12 मई को सरकार ने ऐलान किया कि पेपर लीक होने की वजह से इम्तिहान रद्द किया जाता है। इसके बाद 21 जून 2026 को दोबारा परीक्षा हुई, जिसमें लगभग 20 लाख तलबा ने हिस्सा लिया। लेकिन इस दौरान कई राज्यों में इम्तिहान रद्द होने और दोबारा परीक्षा की वजह से मायूस होकर कुछ तलबा ने ख़ुदकुशी कर ली।

इस पूरे मामले के बाद तलबा और वालिदैन ने इम्तिहानी निज़ाम में इस्लाह (सुधार) और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग की। हालांकि सरकार ने न तो नैतिक ज़िम्मेदारी स्वीकार की और न ही किसी बड़े सुधार का ऐलान किया।

इसी बीच दो महीने पहले बनी नौजवान तंजीम Cockroach Janata Party (CJP) ने 6 जून 2026 से दिल्ली में विरोध प्रदर्शन शुरू किया। 20 जून से जंतर-मंतर पर शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की मांग को लेकर लगातार धरना शुरू हुआ। फिर 28 जून से CJP के बानी अभिजीत डपके की क़ियादत में कई छात्र संगठनों ने ग़ैर-मुद्दती भूख हड़ताल शुरू कर दी।

करीब तीन हफ्ते गुज़र जाने के बावजूद न प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और न ही उनकी कैबिनेट का कोई वज़ीर प्रदर्शन कर रहे तलबा से मिलने पहुँचा। इस दौरान शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आंदोलनकारियों पर गंभीर आरोप लगाते हुए उन्हें “आतंकवादियों की बी-टीम” तक कह दिया।

विपक्ष के कई नेताओं ने जंतर-मंतर पहुँचकर तलबा का समर्थन किया और संसद में NEET पेपर लीक, इम्तिहानी सुधार और शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े का मुद्दा उठाने का भरोसा दिया।

आंदोलन को नई ताकत तब मिली जब लद्दाख के मशहूर शिक्षा सुधारक और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भूख हड़ताल में शामिल हो गए। उन्होंने कहा कि जब तक तलबा की मांगें पूरी नहीं होतीं, वह गांधीजी के उसूलों पर ग़ैर-मुद्दती भूख हड़ताल जारी रखेंगे।

करीब 20 दिन की भूख हड़ताल के बाद उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। दिल्ली हाई कोर्ट की दख़ल के बाद 19 जुलाई को दिल्ली पुलिस उन्हें ज़बरदस्ती अस्पताल ले गई ताकि इलाज कराया जा सके।

इसके अगले दिन 20 जुलाई को संसद के संयुक्त शीतकालीन सत्र की शुरुआत के साथ CJP ने “संसद चलो” मार्च का ऐलान किया। लगभग 20 हज़ार नौजवान और तलबा जंतर-मंतर से संसद की ओर बढ़े। पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए लाठीचार्ज और आँसू गैस का इस्तेमाल किया, लेकिन प्रदर्शन जारी रहा।

अस्पताल से सोनम वांगचुक ने अपने ख़त में तलबा से अपील की कि वह अपना मिशन जारी रखें। उन्होंने कहा कि वह अस्पताल में भी भूख हड़ताल तब तक जारी रखेंगे, जब तक सरकार तलबा की मांगें मान नहीं लेती या कोई ज़िम्मेदार मंत्री आकर भरोसा नहीं देता।

19, 20 और 21 जुलाई को देशभर में CJP और दूसरे छात्र संगठनों की तरफ़ से प्रदर्शन हुए। बेंगलुरु के प्रदर्शन में एक छात्रा की तख्ती ने सबका ध्यान खींचा, जिस पर लिखा था:

“We asked for Make in India, You gave us LEAK in India.”
“हमने ‘Make in India’ मांगा था, आपने हमें ‘Leak in India’ दे दिया।”

उधर संसद के पहले ही दिन विपक्ष ने NEET पेपर लीक, इम्तिहानी गड़बड़ियों और शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े का मुद्दा ज़ोरदार तरीके से उठाया, जिससे दोनों सदनों की कार्यवाही कई बार स्थगित करनी पड़ी। इसी दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के बीच भी लंबी बैठक हुई, जिससे यह संकेत मिला कि सरकार इस मुद्दे पर अंदरूनी स्तर पर विचार-विमर्श कर रही है।

हर साल लगभग 20 लाख तलबा NEET परीक्षा देते हैं, लेकिन पूरे देश में सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों को मिलाकर सिर्फ़ 1.30 लाख MBBS सीटें उपलब्ध हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि NEET की तैयारी पर होने वाला खर्च देश के केंद्रीय शिक्षा बजट से भी ज़्यादा हो चुका है और कोचिंग इंडस्ट्री एक बड़े मुनाफ़े का कारोबार बन गई है।

NEET शुरू होने के बाद अब तक चार बार पेपर लीक और दोबारा परीक्षा जैसी घटनाएँ सामने आ चुकी हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार तलबा की आवाज़ वाक़ई सुनी जाएगी, या फिर यह आंदोलन भी सिर्फ़ एक और विरोध बनकर रह जाएगा?

रिपोर्ट: मोहम्मद आज़म शाहिद
Source: Haqeeqat Times