कर्नाटक में वोटर लिस्ट की Special Intensive Revision यानी SIR के तहत 2002 की वोटर लिस्ट को मौजूदा वोटर लिस्ट से लिंक करने और रिकॉर्ड की जांच का बड़ा प्रोसेस जारी है। इस दौरान ऐसे लाखों वोटरों को नोटिस जारी किए जा रहे हैं, जिनके नाम 2002 की लिस्ट से मैच नहीं हो पा रहे हैं या जिनके रिकॉर्ड में नाम, उम्र, पता और दूसरी डिटेल्स में फर्क पाया जा रहा है।

लेकिन इस पूरे प्रोसेस पर अब यह सवाल भी उठ रहा है कि अगर बेस रिकॉर्ड ही पुराने दौर की गलतियों से पूरी तरह सही नहीं था, तो मौजूदा वोटरों को उन्हीं गलतियों की बुनियाद पर दोबारा जांच के कटघरे में खड़ा करना कितना जायज़ है?

एक एनालिसिस आर्टिकल में रघुवींद्र डी.एल. ने लिखा है कि Election Commission इस प्रक्रिया को वोटर लिस्ट की सफाई और तमाम अनियमितताओं को दूर करने की कोशिश के तौर पर पेश कर रहा है। लेकिन 2002 की वोटर लिस्ट को बेसलाइन बनाना खुद कई सवाल खड़े करता है।

आर्टिकल के मुताबिक, 2002 में वोटर लिस्ट काफी हद तक मैन्युअली तैयार की गई थी, जिसमें नामों की स्पेलिंग, उम्र और पते से जुड़ी गलतियां मौजूद थीं। बाद में जब इन जानकारियों को डिजिटल सिस्टम में ट्रांसफर किया गया या अंग्रेज़ी में दर्ज किया गया, तो कथित तौर पर और भी गलतियां हुईं।

मिसाल के तौर पर आर्टिकल में दावा किया गया है कि एक रिकॉर्ड में ‘राजमा’ नाम सही होने के बावजूद डिजिटल एंट्री के दौरान गलती से उसे ‘गोरमा’ दर्ज कर दिया गया। अगर इस तरह की गलतियां सरकारी रिकॉर्ड में मौजूद थीं, तो उन्हीं रिकॉर्ड्स को आज के वोटर की पहचान का बेसिक क्राइटेरिया बनाना कई सवाल पैदा करता है।

2002 के बाद हुए चुनावों पर भी सवाल

आर्टिकल में यह भी सवाल उठाया गया है कि अगर 2002 की वोटर लिस्ट में इतनी बड़ी संख्या में गलतियां या अधूरे रिकॉर्ड मौजूद थे, तो 2002 के बाद हुए चुनावों की पारदर्शिता और उनके रिजल्ट की कानूनी और लोकतांत्रिक हैसियत पर इसका क्या असर पड़ा?

अगर पिछले दो दशकों में वोटर लिस्ट लगातार रिवीजन और करेक्शन के दौर से गुजरती रही है, तो आज अचानक इतनी बड़ी तादाद में वोटरों के रिकॉर्ड में discrepancies क्यों सामने आ रही हैं?

इस एनालिसिस में यह सवाल भी उठाया गया है कि 2002 से अब तक वोटर लिस्ट तैयार करने, रिवीजन और करेक्शन पर सरकारी खजाने से खर्च हुई रकम और इस पूरे प्रोसेस में हुई संभावित administrative mistakes की जवाबदेही किसकी होगी?

लेखक का कहना है कि अगर मौजूदा समस्या पुराने रिकॉर्ड की गलतियों का नतीजा है, तो संबंधित सिस्टम और जिम्मेदार अधिकारियों की accountability भी तय होनी चाहिए।

गलती सिस्टम की, परेशानी वोटर की

आर्टिकल में SIR के दौरान सामने आए कुछ मामलों का हवाला देते हुए कहा गया है कि कई वोटरों को ऐसे कारणों से नोटिस दिए गए, जिनका ताल्लुक उनकी अपनी किसी गलती से नहीं, बल्कि रिकॉर्ड या डिजिटल एंट्री में मौजूद फर्क से हो सकता है।

ब्यातरायणपुरा की अन्नपूर्णा के मामले का हवाला देते हुए कहा गया है कि तमाम जरूरी दस्तावेज पेश करने के बावजूद उन्हें परिवार के बुजुर्ग की उम्र से जुड़े फर्क की वजह से नोटिस मिला।

जयनगर में जुड़वां बच्चों की उम्र के बीच नौ महीने का अंतर न होने को भी कथित तौर पर objection का कारण बनाया गया। वहीं कुक टाउन में translation या नाम की spelling में कथित गलती की वजह से एक वोटर को नोटिस मिलने का जिक्र किया गया है।

आर्टिकल में पत्रकार रोहिणी मोहन के मामले का भी हवाला दिया गया है। दावा किया गया है कि पिता का नाम surname के तौर पर इस्तेमाल करने की वजह से उनके रिकॉर्ड में फर्क पैदा हुआ और उन्हें भी नोटिस जारी किया गया।

लेखक का बुनियादी सवाल है कि अगर नाम, उम्र, translation या दूसरी details में फर्क Election Commission के रिकॉर्ड को डिजिटल सिस्टम में ट्रांसफर करने के दौरान पैदा हुआ है, तो उसकी correction की जिम्मेदारी भी संबंधित सिस्टम की होनी चाहिए।

आम वोटर, खासकर मजदूर और कम आमदनी वाले लोग, अपनी रोजमर्रा की जिंदगी छोड़कर सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाएं और बार-बार दस्तावेज पेश करें—आखिर क्यों?

‘Logical Contradiction’ के Automated System पर सवाल

आर्टिकल में SIR के दौरान इस्तेमाल किए जा रहे ‘Logical Contradiction’ के automated system पर भी सवाल उठाया गया है।

लेखक के मुताबिक, नाम, उम्र या translation में मामूली फर्क को भी इस तरह देखा जा रहा है जैसे वोटर की तरफ से कोई गंभीर गलती की गई हो।

मिसाल के तौर पर अगर सरकारी regional language की लिस्ट में किसी वोटर का नाम सही दर्ज है, लेकिन उसी नाम की English entry में गलती हो जाए, तो मौजूदा सिस्टम उसे mismatch के तौर पर दिखा सकता है।

ऐसे में सवाल उठता है कि सरकारी कर्मचारी या digital system की गलती का खामियाजा वोटर क्यों भुगते?

आर्टिकल में खास तौर पर कहा गया है कि language और translation से जुड़े मामूली differences को वोटर के right to vote पर सवाल उठाने की बुनियाद नहीं बनाया जाना चाहिए।

दस्तावेज नहीं होने पर Citizenship पर सवाल?

आर्टिकल में SIR के दौरान documents मांगे जाने के तरीके पर भी चिंता जताई गई है।

सवाल उठाया गया है कि अगर कोई नागरिक किसी खास document को तय समय पर पेश नहीं कर पाता, तो क्या सिर्फ इसी आधार पर उसका नाम voter list से हटाना सही होगा?

लेखक के मुताबिक, भारत जैसे देश में हर आम नागरिक के पास हर मामले से जुड़े एक जैसे और complete documents मौजूद नहीं होते।

ऐसे में प्रशासन को उपलब्ध दूसरे valid evidence और ground realities को भी उचित अहमियत देनी चाहिए। सिर्फ किसी specific document की गैर-मौजूदगी को नागरिक या वोटर के खिलाफ final conclusion का आधार बनाना लोगों की परेशानियां बढ़ा सकता है।

Technology के साथ Human Approach भी जरूरी

आर्टिकल में कहा गया है कि 21वीं सदी में technology के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के बावजूद voter list revision का प्रोसेस ऐसा होना चाहिए, जिसमें आम नागरिक को कम से कम परेशानी हो।

अगर automated system मामूली differences की बुनियाद पर बड़े पैमाने पर notices जारी करे और हर मामले में वोटर को personally explanation देने के लिए सरकारी दफ्तरों का रुख करना पड़े, तो इस पूरी प्रक्रिया के people-friendly होने पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

लेखक का कहना है कि electoral roll की accuracy democratic system के लिए बेहद जरूरी है, लेकिन इसके साथ voter का right to vote, human circumstances और सरकारी रिकॉर्ड की पुरानी गलतियों को भी बराबर अहमियत मिलनी चाहिए।

SIR का बुनियादी मकसद अगर voter list को ज्यादा accurate और transparent बनाना है, तो इस प्रोसेस में गलत entries की responsibility तय करना, नागरिकों को proper opportunity देना, आसान procedure अपनाना और किसी भी वोटर के खिलाफ action लेने से पहले उसका पक्ष सुनना जरूरी होगा।

यही तरीका electoral roll की accuracy और नागरिक के right to vote, दोनों के बीच एक balanced रास्ता तैयार कर सकता है।