एक वक्त था जब घर सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि मोहब्बत, शफकत, हिफाज़त और अपनापन का नाम हुआ करता था।
संयुक्त परिवारों में दादा-दादी, ताऊ-ताई, चाचा-चाची और बच्चे… सब एक साथ रहते थे।
खुशियां हों या ग़म, हर चीज़ मिल-बांटकर जी जाती थी।
बड़ों की डांट में भी शफकत होती थी, बड़ों का अदब किया जाता था और छोटों से प्यार से पेश आया जाता था।
लेकिन आज तस्वीर बदल गई है।
परिवार छोटे होते जा रहे हैं और रिश्तों के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं।
आखिर इसकी वजह क्या है?
इस्लामी और नैतिक तालीम की कमी, नस्लों के बीच बढ़ता फासला, सोशल मीडिया, बढ़ती खुदगर्जी, बे-बर्दाश्तगी, आर्थिक परेशानियां और बदलती हुई लाइफस्टाइल… ये तमाम वजहें परिवारों को प्रभावित कर रही हैं।
आज हम दूसरों को नसीहत तो खूब करते हैं, लेकिन खुद उन बातों पर अमल करने से पीछे रह जाते हैं।
सोशल मीडिया ने भी हमारी जिंदगी में बड़ी जगह बना ली है।
हम रील देखते हैं, शेयर करते हैं और समझते हैं कि जिम्मेदारी पूरी हो गई।
लेकिन सिर्फ मैसेज आगे बढ़ाने से समाज नहीं बदलता… अमल करने से बदलाव आता है।
और इसके लिए सिर्फ बच्चों को जिम्मेदार ठहराना भी सही नहीं होगा।
जब बड़े खुद मोबाइल और सोशल मीडिया में मसरूफ हैं, तो फिर बच्चों की तरबियत पर पूरी तवज्जो कैसे दी जाएगी?
दूसरी तरफ, पैसों की बढ़ती अहमियत, आर्थिक परेशानियां और आपसी मतभेद भी रिश्तों में दरार पैदा कर रहे हैं।
आज छोटी-छोटी बातों पर नाराजगी, जिद और बे-बर्दाश्तगी रिश्तों को कमजोर कर रही है।
लेकिन इन तमाम वजहों के बीच सबसे बड़ा सवाल हमसे ही है…
क्या हम खुद अपने अंदर झांकने के लिए तैयार हैं?
दूसरों की गलतियां निकालने और अपनों पर उंगली उठाने के बजाय, सुधार की शुरुआत खुद से और अपने घर से करनी होगी।
रिश्तों में सब्र रखना होगा, बातचीत से मसले हल करने होंगे और जो अपने भाई-बहन या रिश्तेदार हमसे नाराज़ हैं, उन्हें मनाने की कोशिश करनी होगी।
क्योंकि वक्त भले ही बहुत आगे निकल गया हो…
लेकिन थोड़ी सी मोहब्बत, तवज्जो, सब्र और कोशिश से रिश्तों को फिर से मजबूत किया जा सकता है।
क्योंकि परिवार सिर्फ एक छत के नीचे रहने का नाम नहीं…
बल्कि एक-दूसरे का साथ देने, इज्जत करने और मुश्किल वक्त में साथ खड़े रहने का नाम है।

