मैदान में उतरने का वक़्त, हाशिए पर रहने का नहीं

नौजवानों की जद्दोजहद के साथ मुस्लिम इदारे की शिरकत और इत्तेहाद का सवाल

मुल्क की फ़िज़ा में एक नई आवाज़ गूंज रही है। यह आवाज़ किसी पुरानी सियासी जमात की नहीं और न ही किसी मंझे हुए क़ायद की है। यह Gen Z की आवाज़ है—उन नौजवानों की, जिनके हाथ में मोबाइल है, आंखों में सवाल हैं और दिल में यह चुभन है कि उनका मुस्तकबिल उनकी आंखों के सामने गिरवी रखा जा रहा है।

ये नौजवान किसी के बुलावे पर नहीं निकले, बल्कि अपने ज़मीर की पुकार पर सड़कों पर उतरे हैं। उनके हाथ में किसी सियासी जमात का झंडा नहीं, न किसी सरपरस्त का साया है। लेकिन उनके पास वह चीज़ है जो बड़ी-बड़ी तंजीमों के पास भी अक्सर नहीं होती—बे-लौस जज़्बा और बेखौफ़ ज़बान।

जब ज़मीर सड़कों पर उतरता है तो सत्ता के ऐवानों में बेचैनी पैदा होती है, तख़्त की चूलें हिलती हैं और मसलहत के पर्दे सरकने लगते हैं।

आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि मुसलमान कहां हैं? इस तहरीक में उनकी शिरकत और हिस्सेदारी कितनी है? और अगर नहीं है तो क्यों नहीं है?

यह बात नज़रअंदाज़ नहीं की जा सकती कि मुसलमान ख़ामोश नहीं रहे। मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहफ़्फ़ुज़ के लिए आवाज़ उठाई गई, उलमा ने बयान दिए, मिली तंजीमों ने याददाश्तें पेश कीं और अवाम ने दस्तख़ती मुहिमें चलाईं।

वक़्फ़ की अमलाक के दिफ़ा में भी एहतिजाज हुआ। मसाजिद, मदरसों, क़ब्रिस्तानों और दरगाहों की ज़मीनों को बचाने के लिए आवाज़ उठाई गई। वोटर लिस्ट की ख़ास नज़र-ए-सानी यानी SIR को लेकर पैदा होने वाले अंदेशों पर भी बेचैनी का इज़हार हुआ।

लेकिन अलमिया यह है कि ये तमाम आवाज़ें अलग-अलग दायरों में गूंजती रहीं। हर एहतिजाज अपने ही दायरे तक महदूद रहा, हर तंजीम ने अपने प्लेटफ़ॉर्म से अपनी बात कही। इस तरह बहुत सी नदियां बहती रहीं, लेकिन कोई दरिया नहीं बन सका।

मुंतशिर आवाज़ें ऐवानों तक पहुंचते-पहुंचते शोर बन जाती हैं, जबकि मुत्तहिद आवाज़ एक मुतालबा बन जाती है। हमने शोर बहुत किया, लेकिन मुतालबा बनने की मंज़िल तक कम ही पहुंच सके।

हमें यह हक़ीक़त तस्लीम करनी होगी कि हमारा मसला मौजूदा हुकूमत की नीतियों और फैसलों से जुड़ा हुआ है। यह बात किसी तअस्सुब की बुनियाद पर नहीं, बल्कि वाक़ियात की बुनियाद पर कही जा रही है।

मौजूदा दौर में मुसलमानों के फ़र्दी और इज्तिमाई मसाइल को लेकर जो चिंताएं पैदा हुई हैं, वे किसी से पोशीदा नहीं हैं। तीन तलाक़ पर क़ानूनसाज़ी हुई और इसके ज़रिए मुस्लिम घरानों के दीन और ख़ानदानी मामलों में रियासती मुदाख़लत का रास्ता खुला। नागरिकता संशोधन क़ानून यानी CAA ने भी नागरिकता को लेकर सवाल और आशंकाएं पैदा कीं, जबकि NRC के साए ने लाखों घरानों को परेशान किया।

मॉब लिंचिंग के वाक़ियात ने कई घर उजाड़ दिए। कई बूढ़े बापों से उनके जवान बेटे छिन गए और अफ़सोस की बात यह रही कि कई मामलों में इंसाफ़ की रफ़्तार ज़ुल्म की रफ़्तार से बहुत पीछे रही।

बुलडोज़र कार्रवाई को लेकर भी गंभीर सवाल उठे और कई जगहों पर मकान गिराने की कार्रवाई को सज़ा के तौर पर इस्तेमाल किए जाने के आरोप लगे। वक़्फ़ संशोधन क़ानून ने भी मुस्लिम दीनि और मिली अमलाक के तहफ़्फ़ुज़ को लेकर नई चिंताएं पैदा की हैं।

यह फ़ेहरिस्त लंबी है और हर नाम के पीछे एक ज़ख़्म है।

जब हमारे मसाइल ही इस निज़ाम की नीतियों से जुड़े हुए हैं तो फिर इस निज़ाम के ख़िलाफ़ उठने वाली हर आवाज़ से हम लाताल्लुक़ कैसे रह सकते हैं?

यही वह मुक़ाम है जहां हमें अपनी रविश पर नज़र-ए-सानी करनी होगी।

हमने एक अरसे से यह रवैया अपना रखा है कि नतीजे की उम्मीद तो पूरी रखते हैं, लेकिन मैदान में उतरने की ज़हमत नहीं करते। हम चाहते हैं कि हालात बदल जाएं, मगर हालात बदलने वालों की सफ़ में खड़े होने से कतराते हैं।

दूर से ताईद कर देना, बयान जारी कर देना, सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लगा देना और दिल ही दिल में दुआ मांग लेना—यह हिमायत ज़रूर है, लेकिन ऐसी हिमायत दिखाई नहीं देती। और जो हिमायत दिखाई न दे, वह तारीख़ के हिसाब में कितनी जगह बना पाएगी, यह सवाल अपनी जगह है।

सत्ता के ऐवान अक्सर उन्हीं चेहरों को गिनते हैं जो सामने नज़र आते हैं। इसलिए किसी भी ज़ालिम ताक़त के ख़िलाफ़ असल तक़ाज़ा यह होना चाहिए कि हम ख़ुद पहल करें और क़यादत करें।

जिस क़ौम के पास सब्र, सिद्क़ और क़ुर्बानी की इतनी रोशन तारीख़ हो, उसे दूसरों के पीछे चलना ज़ेब नहीं देता।

लेकिन जब दूसरे लोग मैदान में उतर चुके हैं तो कम से कम उनके शाना-ब-शाना खड़ा होना हमारा फ़र्ज़ बनता है। जो मैदान में उतरा हो, उसके साथ मैदान में उतरकर ही काम किया जाता है। बाहर बैठकर सिर्फ़ हौसला-अफ़ज़ाई करने से न जंगें जीती जाती हैं और न तहरीकें कामयाब होती हैं।

मुस्लिम इदारों की शिरकत क्यों ज़रूरी?

Gen Z के नौजवानों, समाजी कारकुनों और दूसरी उठती हुई आवाज़ों के साथ मुस्लिम इदारों की शिरकत अब ज़रूरी हो चुकी है।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमाअत-ए-इस्लामी हिंद और जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसे इदारे मिल्लत में अपनी पहचान और असर रखते हैं।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पास इल्मी वक़ार और मुख़्तलिफ़ मसालिक की नुमाइंदगी है। जमाअत-ए-इस्लामी के पास मुनज़्ज़म फ़िक्र और तरबियतयाफ़्ता कारकुन हैं, जबकि जमीयत उलेमा-ए-हिंद के पास एक बड़ा और मुनज़्ज़म कैडर मौजूद है, जो गांव-गांव और क़स्बे-क़स्बे तक फैला हुआ है।

अगर यह कैडर मुनज़्ज़म तरीके से एहतिजाज का हिस्सा बनता है तो बे-सिम्त जोश को सिम्त मिल सकती है। नौजवानों के वलवले को तजुर्बे का सहारा मिल सकता है और एहतिजाज की तादाद ही नहीं बल्कि उसका वज़न भी बढ़ सकता है।

जमीयत का कैडर अपनी तंजीमी सलाहियत के साथ जब सड़कों पर आएगा तो उसकी मौजूदगी महज़ एक ग्रुप की मौजूदगी नहीं होगी, बल्कि यह एक पैग़ाम होगा कि:

यह मुल्क हमारा है, इसका आईन हमारा है और इसके मुस्तकबिल के फैसलों में हम तमाशाई नहीं, बल्कि शरीक हैं।

यह ताक़त मसाजिद और मदरसों की चारदीवारी तक महदूद रखने की नहीं, बल्कि इसे आईन के दायरे में रहकर पुरअमन और मुनज़्ज़म तरीके से सामने लाने की ज़रूरत है।

इत्तेहाद का मौक़ा

इत्तेहाद का ऐसा मौक़ा शायद हमें दोबारा न मिले। हम अक्सर मस्लकी और जमाअती इख़्तिलाफ़ात की दीवारें खड़ी किए रहते हैं, जबकि ज़रूरत ने बड़ी-बड़ी दूरियों को भी क़रीब आने पर मजबूर कर दिया है।

ईरान की मिसाल हमारे सामने है कि अपने नज़रियाती तहफ़्फ़ुज़ात के बावजूद उसने बड़ी ताक़तों के सामने सफ़बंदी की, क्योंकि बक़ा का तक़ाज़ा अक्सर अनाओं से बड़ा होता है।

सियासत की दुनिया में न कोई दोस्ती हमेशा रहती है और न कोई दुश्मनी। सिर्फ़ मुफ़ाद हमेशा रहता है।

जो क़ौमें अपने मुफ़ाद को पहचानती हैं, वे ज़रूरत के वक़्त अपने इख़्तिलाफ़ात को कुछ समय के लिए पीछे रख देती हैं।

जब एक रियासत अपने मुफ़ाद के लिए इख़्तिलाफ़ात को पस-ए-पुश्त डाल सकती है तो एक मिल्लत अपने वजूद और मुस्तकबिल के लिए ऐसा क्यों नहीं कर सकती?

हमारे यहां तो अक्सर इख़्तिलाफ़ अक़ीदों का नहीं, बल्कि तरजीहात और तरीक़ा-ए-कार का होता है। ऐसे इख़्तिलाफ़ को बक़ा के बड़े सवाल पर कुछ समय के लिए पीछे रखना कोई बड़ी क़ुर्बानी नहीं होनी चाहिए।

अगर आज मौक़ा गंवा दिया तो?

यह भी सोचना होगा कि अगर आज हमने यह मौक़ा गंवा दिया तो कल हम किस मुंह से शिकायत करेंगे?

जो तहरीक आज नौजवान उठा रहे हैं, अगर वह हमारी शिरकत के बग़ैर कामयाब हुई तो हमारे हिस्से में शुक्रगुज़ारी भी नहीं आएगी। और अगर वह नाकाम हुई तो हम पर यह इल्ज़ाम आएगा कि हमने साथ नहीं दिया।

दोनों सूरतों में नुक़सान हमारा है।

लेकिन अगर हम इसमें शरीक होते हैं तो कामयाबी में हमारा हिस्सा भी होगा और हमारी आवाज़ भी।

अब क्या किया जाना चाहिए?

पहला: मुस्लिम क़यादत और इदारे ऐलान करें कि वे जम्हूरी और आईनी मुतालिबात के लिए उठने वाली हर पुरअमन तहरीक के साथ खुले तौर पर खड़े हैं। यह सिर्फ़ एक मुबहम बयान न हो, बल्कि साफ़ लाएहा-ए-अमल के साथ हो।

दूसरा: पर्सनल लॉ, वक़्फ़ और वोटर लिस्ट जैसे मसाइल को अलग-अलग लड़ने के बजाय एक मुश्तरका मुतालिबातनामा पेश किया जाए। जब तमाम तंजीमें एक ज़बान में बोलेंगी तो उनकी आवाज़ को नज़रअंदाज़ करना आसान नहीं होगा।

तीसरा: जमीयत उलेमा-ए-हिंद और दूसरी तंजीमें अपने कैडर को मुनज़्ज़म, बा-वक़ार और पुरअमन शिरकत की हिदायत दें। हर ज़िले और क़स्बे में ज़िम्मेदार अफ़राद मुक़र्रर किए जाएं, जो नज़्म-ओ-ज़ब्त की निगरानी करें।

चौथा: नौजवानों की क़यादत को दबाने के बजाय उनके साथ मुकालमा किया जाए। हमारे बुज़ुर्गों को समझना होगा कि आज के एहतिजाज की ज़बान वही है जो नौजवान बोलते हैं। उनके अंदाज़ पर ऐतराज़ करने के बजाय उनके जज़्बे को सही सिम्त देना ज़्यादा दानिशमंदी होगी।

पांचवां: हर क़दम में नज़्म-ओ-ज़ब्त और आईनी दायरे को मद्देनज़र रखा जाए, ताकि हमारी शिरकत हमारी ताक़त बने, किसी के लिए बहाना न बने। हमारी असल ताक़त सिर्फ़ हमारी तादाद नहीं, बल्कि हमारा किरदार भी होना चाहिए।

छठा: इस शिरकत को महज़ वक़्ती जोश न बनने दिया जाए। एक दिन का मुज़ाहरा ख़बर बनता है, लेकिन लगातार और मुनज़्ज़म जद्दोजहद तारीख़ बनाती है।

हमें अपनी शिरकत को क़ानूनी चाराजोई, अवामी बेदारी और सियासी मुकालमे के साथ जोड़कर एक मुस्तक़िल हिकमत-ए-अमली की शक्ल देनी होगी।

फैसला हमारे हाथ में है

तारीख़ का फ़ैसला हमेशा एक ही होता है:

जो मैदान में थे, उनका नाम लिखा जाता है और जो दूर से देखते रहे, उनका ज़िक्र सिर्फ़ हाशिए में आता है।

अब फैसला हमें करना है—

हम तारीख़ के मत्न में होंगे या हाशिए पर?

लेखक: जमील अहमद मिलनसार

SOURCE: HAQEEQAT TIMES