असम वाले शर्मा जी ज्ञानेश बाबू को भारत रत्न दिलाना चाहते हैं, पर बंगाल वाले भट्टाचार्य जी पद्मभूषण से आगे बढ़ना ही नहीं चाहते हैं. यानी इस पर दोनों सहमत हैं कि ज्ञानेश जी की सेवा इतनी बड़ी है कि उसके सामने, सारे पुरस्कार छोटे हैं- चाहे भारत रत्न दिया जाए या पद्मभूषण. उसपे विरोधी इसमें एक और ऑप्शन जोड़ने के लिए चले आए- चाहे तो पीएम बना दो!

 

देखी, देखी, इन मोदी जी के विरोधियों की चालूपंती देखी. जब यह दिखाई दे गया कि पब्लिक डिमांड पर डेमोक्रेसी की सेवाओं के लिए ज्ञानेश कुमार को कोई चमकता-दमकता मैडल देना ही पड़ेगा, तो उल्टे हाथ से विरोध करने लगे. कहते हैं कि ज्ञानेश बाबू को मोदी जी कोई भी पुरस्कार दें, हमें क्यों दिक्कत होगी. उन्हें पद्म पुरस्कार दें, उन्हें रत्न बनाएं, हमारा क्या जाता है?

पर मोदी जी पहले अपने कुनबे में तो राय-बात करके इसका झगड़ा निपटा लें कि ज्ञानेश बाबू की सेवाओं के लिए पुरस्कार कौन-सा देना है? उनके कुनबे में तो अगल-बगल में असम और बंगाल तक, अलग-अलग पुरस्कारों की डिमांड कर रहे हैं. कुनबे के लगातार दूसरी बार बने के असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा किसी तरह भारत रत्न से कम पर तैयार नहीं हैं.

दूसरी तरफ, भगवा पार्टी के बंगाल के अध्यक्ष, शमिक भट्टाचार्य को इतनी उदारता मंजूर नहीं है. उन्हें लगता है कि ज्ञानेश कुमार की सेवाओं को सिर्फ पद्मभूषण में ही निपटाया जा सकता है. कुनबे की सारी मगज धुलाई के बाद भी, बंगाली में कहीं न कहीं, कल्चर कॉम्प्लेक्स का कुछ न कुछ अंश रह ही जाता है. रत्न के लिए पहले ही उनके पास नामों की लंबी सूची है, जिसमें बेचारे बंकिम और श्यामा प्रसाद को जुड़वाने के लिए ही परेशान हैं. ज्ञानेश गुप्ता और भारत रत्न, ना ना; पद्मभूषण ही काफी है.

लेकिन, ये सब विरोधियों का झूठा प्रचार है. मोदी जी के कुनबे में ज्ञानेश कुमार के पुरस्कार पर कोई मतभेद नहीं है. और असम-बंगाल वालों में थोड़ा बहुत मतभेद हुआ भी तो क्या, मनभेद हर्गिज नहीं हैं. और मनभेद होगा भी क्यों? कुनबे वाले असम के हों या बंगाल के, बिहार के या दिल्ली के, हरियाणा के या महाराष्ट्र के, सब इस पर एक राय हैं कि ज्ञानेश गुप्ता और उनसे पहले राजीव कुमार नहीं होते तो, मदर ऑफ डेमोक्रेसी को तो भूल ही जाओ, इस देश में डेमोक्रेसी के बचने का भी कोई चांस ही नहीं था. ये मोदी जी के एंटी-नेशनल विरोधी तो डेमोक्रेसी की हत्या ही कर देने वाले थे. प्लान बहुत ही सिंपल था- चुनाव में पब्लिक को बरगलाकर, भारत को मोदी जी के दैवीय नेतृत्व से वंचित कर दो.

उसके बाद चुनाव-चुनाव तो बचता, पर क्या डेमोक्रेसी भी बचती? गोमाता खून के आंसू रोती रह जाती. और देश मुगलों के जमाने में चला जाता. भारत माता के शत्रुओं ने एक तरह से सारे इंतजाम कर भी लिए थे. वह तो राजीव कुमार ने वक्त रहते खतरा भांप लिया और देश पर मोदी जी की कृपा बनाए रखने में भिड़ गए. वोट काटने पड़े तो काटे, वोट बढ़ाने पड़े तो बढ़ाए, वोट गलत गिनने पड़े तो गिने, पर मोदी जी को आसान से उठने नहीं दिया. भले ही बैसाखियां फिर भी लगानी पड़ीं, पर सहारा लेकर ही सही, आया तो मोदी ही! डेमोक्रेसी बस बाल-बाल बची.

राजीव कुमार की सेवा छोटी नहीं थी. पर तात्कालिक थी, एक बार के लिए ही थी. डेमोक्रेसी तो बच गई, पर सिर्फ एक चुनाव से. पर वह जाते-जाते डेमोक्रेसी की परमानेंट हिफाजत का इंतजाम शुरू भी कराते गए, वोटर लिस्टों में ही कतर ब्योंत के जरिए. वोटर वही जो मोदी मन भाए. पर उस शुरुआत को अंजाम तक पहुंचाया, ज्ञानेश कुमार ने. ऐसा इंतजाम कर दिया कि विरोधी तो विरोधी, खुद पब्लिक भी कितना ही जोर लगा ले, मोदी जी के आसन को हिला तक नहीं पाए. जिसके मन में बिना मोदी की डेमोक्रेसी का विचार भी आए, वह वोटरों की लाइन से बाहर धकेल दिया जाए- खुद ब खुद डेमोक्रेसी की हिफाजत हो जाए. डेमोक्रेसी की हिफाजत के लिए भला और क्या चाहिए?

ऐसे ज्ञानेश कुमार को पुरस्कार देने में, कुनबे में कोई मतभेद क्यों होने लगे. सब विरोधियों की फैलाई अफवाहें हैं. ऐसा हर्गिज नहीं है कि असम वाले शर्मा जी तो ज्ञानेश बाबू को भारत रत्न दिलाना चाहते हैं, पर बंगाल वाले भट्टाचार्य जी पद्मभूषण से आगे बढ़ना ही नहीं चाहते हैं. उल्टे सच तो यह है कि शर्मा जी को अगर ज्ञानेश बाबू के लिए भारत रत्न भी कम लगता है, तो भट्टाचार्य मोशाय भी उन्हें कम से कम पद्मभूषण तो दिलाना ही चाहते हैं. यानी इस पर दोनों सहमत हैं कि ज्ञानेश जी की सेवा इतनी बड़ी है कि उसके सामने, सारे पुरस्कार छोटे हैं- चाहे भारत रत्न दिया जाए या पद्मभूषण.

वैसे भी तय करने का डिपार्टमेंट तो मोदी जी के पास है. शर्माजी, भट्टाचार्य जी को तो वाह-वाह करनी है- ज्ञानेश कुमार भारत रत्न हो जाएं तब भी वही वाह-वाह, पद्मभूषण ही रह जाएं, तब भी वही वाह-वाह!

पर विरोधियों की साजिश बेनकाब हो ही गई. बहस हो रही है कि ज्ञानेश कुमार को भारत रत्न बनाएं या पद्मभूषण और विरोधी इसमें एक और ऑप्शन जोड़ने के लिए चले आए- चाहे तो पीएम बना दो! अब इसमें पीएम की बात कहां से आ गई. अव्वल तो पीएम की जगह पर वैकेंसी ही नहीं है. वैसे भी ज्ञानेश कुमार को पुरस्कार तो मोदी युक्त डेमोक्रेसी को बचाने के लिए मिलना है. पर डेमोक्रेसी तभी तो बचेगी, जब पीएम की गद्दी मोदी जी के पास होगी. जब मोदी जी ही गद्दी पर नहीं होंगे, तो ज्ञानेश कुमार की डेमोक्रेसी का कुनबे वाले क्या करेंगे?

और ये कौन सी पब्लिक है जो ज्ञानेश कुमार को पुरस्कृत करने की जगह उनका इस्तीफा मांग रही है? क्या अब भी इनके वोट हैं? तेरह करोड़ कटने के बाद भी? लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी में करोड़ों को हटाने के बाद भी. लगता है, और कड़ी लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी लगानी पड़ेगी. दिमागी नक्सल वाली. दिमाग चलाए, सो वोटर लिस्ट से बाहर जाए. यह प्लेन डेमोक्रेसी नहीं है कि हर कोई ऐरा-गैरा वोट डाल जाएगा. डेमोक्रेसी की मम्मी है- वोट वही माना जाएगा, जो मोदी जी के काम आएगा!

(राजेंद्र शर्मा लोकलहर साप्ताहिक के संपादक हैं.)

Source: The Wire