इंदौर के “जिहादी-मुक्त बाज़ार” इसका ताज़ा उदाहरण हैं। जहाँ एक रात में मुस्लिम व्यापारियों को निकाल दिया गया, उनके परिवारों की रोज़ी-रोटी छिन गई। मीडिया ने इसे “कानून-व्यवस्था का मामला” बताकर मानवीय त्रासदी को नज़रअंदाज़ कर दिया। हिंदुत्व संगठनों ने इसे सोशल मीडिया पर “विजय” की तरह मनाया। एक सामूहिक आर्थिक हत्या को वायरल मनोरंजन बना दिया गया।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस नफ़रत के तमाशे का प्रतीक हैं। उनके भाषणों में मुसलमानों को “घुसपैठिया” और “आतंकी समर्थक” कहा जाता है। यह अब हाशिये की आवाज़ नहीं रही — यह सत्ताधारी आवाज़ है। विपक्ष भी प्रतिक्रिया में असली प्रतिरोध नहीं दिखाता; बल्कि “नरम हिंदुत्व” की होड़ में मुसलमानों के दर्द पर चुप्पी साध लेता है। नतीजा: मुसलमान अब राजनीतिक विषय नहीं, बल्कि राजनीतिक “प्रॉप्स” बन चुके हैं। इसका असर सिर्फ़ शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और अस्तित्वगत है। आज मुसलमान होना मानो स्थायी शक़ के साये में जीना है — मस्जिद में, बाज़ार में, स्कूल में हर जगह निगरानी और शक़ की निगाहें। हर जुमे की नमाज़ एक जोखिम है। हर अज़ान कुछ लोगों को चुनौती लगती है। साहिर लुधियानवी ने पूछा था, “जिन्हें नाज़ है हिंद पर, वो कहाँ हैं?” आज वही सवाल गूंजता है — अगर यही “नए भारत” की महानता है, तो इसमें रोज़ मुसलमानों का अपमान क्यों शामिल है?
युगांडा मूल के मुस्लिम विचारक महमूद ममदानी ने अपनी किताब Good Muslim, Bad Muslim में बताया था कि कैसे समाज मुसलमानों को दो वर्गों में बाँटता है — “काबिल-ए-कबूल” जो चुप रहे, और “ख़तरनाक” जो अपने हक़ की बात करे। भारत में यही विभाजन हर दिन दोहराया जा रहा है। जो मुसलमान अपनी पहचान छिपा ले, वह “ठीक” है; जो अपने धर्म और अस्तित्व पर गर्व करे, वह “मुजरिम” है। यह धर्म नहीं, सत्ता की राजनीति है — तय करने का अधिकार किसके पास है, और शक़ की ज़िंदगी किसे दी जाती है। इसलिए lynching के वीडियो अब WhatsApp पर मीम बनकर घूमते हैं, एंकर मुसलमानों की जनसंख्या पर षड्यंत्र रचते हैं, और भीड़ मुसलमानों की दुकानों में आग लगाकर हंसती है। नफ़रत अब राजनीति नहीं, सामूहिक मनोरंजन बन चुकी है। जब निर्दयता हंसी बन जाए, तो लोकतंत्र और फासीवाद के बीच की रेखा मिट जाती है।
इतिहास गवाह है — जो समाज अल्पसंख्यक की पीड़ा पर मनोरंजन करता है, वह खुद भी नष्ट होता है। नाज़ी रैलियों में जर्मन उदारवादियों की चुप्पी, अमेरिका में अश्वेतों की lynching पर आम लोगों की उदासीनता, और ग़ज़ा में बमबारी पर भीड़ की तालियाँ — सब यह चेतावनी देती हैं कि नफ़रत पर बना मनोरंजन अंततः समाज को ही खा जाता है। भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा।
तो सवाल फिर वही: क्या हम मुसलमान हैं या मुजरिम? क्यों हमें रोज़ कटघरे में जीना पड़ता है जबकि हत्यारे खुले घूमते हैं? “अमृत काल” के उत्सव में हमारे बच्चों की मौतें क्यों अनदेखी हो जाती हैं? इसका जवाब सिर्फ़ मुसलमानों को नहीं, बल्कि भारत के बहुसंख्यक समाज को देना होगा — क्या वे नफ़रत को अपना पसंदीदा सीरियल बनाए रखेंगे या अब स्क्रीन बंद करेंगे? जिस दिन नफ़रत राष्ट्रीय मनोरंजन का एकमात्र रूप बन जाएगी, उस दिन परदे पर सिर्फ़ मुसलमानों की लाशें नहीं होंगी — वह भारत के गणराज्य की मृत्यु का शिलालेख होगा।
और इतिहास यह नहीं पूछेगा कि आप हिंदू थे या मुसलमान, दक्षिणपंथी थे या उदारवादी — वह बस यह पूछेगा कि सभ्यता पर गर्व करने वाले समाज ने क्रूरता को कॉमेडी और चुप्पी को सहमति में क्यों बदला। अगर आज आप मुसलमान को “मुजरिम” कहकर ताली बजा रहे हैं, तो कल वही राष्ट्र आपकी आज़ादी निगल जाएगा — और तब इस गणराज्य में नफ़रत की हँसी ही आख़िरी आवाज़ रह जाएगी।
– इस्माइल सलाहुद्दीन, लेखक और शोधकर्ता, दिल्ली और कोलकाता








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