विश्व हिंदू परिषद ने छठ पूजा के मौके पर ‘जिहादी-मुक्त दिल्ली’ अभियान के तहत ‘सनातन प्रतिष्ठा’ स्टिकर जारी किया है. संगठन का दावा है कि यह ‘शुद्ध पूजा सामग्री’ के लिए है, लेकिन यह मुसलमान व्यापारियों के आर्थिक बहिष्कार की एक और रणनीति दिखाई देती है.

 

नई दिल्ली: विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने छठ पूजा के अवसर पर दिल्ली में एक नया अभियान शुरू किया है, जिसमें ‘जिहादी-मुक्त दिल्ली’ के संकल्प के साथ ‘सनातन प्रतिष्ठा’ स्टिकर वितरित किए जा रहे हैं.

संगठन का दावा है कि यह पहल भक्तों को ‘शुद्ध और प्रमाणित’ पूजा सामग्री उपलब्ध कराने के लिए है. लेकिन बुद्धिजीवी इसे हिंदुत्ववादी संगठन द्वारा मुस्लिम व्यापारियों के व्यवस्थित आर्थिक बहिष्कार का एक और प्रयास मान रहे हैं.

‘सनातन प्रतिष्ठा’ स्टिकर: प्रमाणन या बहिष्कार का हथियार?

विहिप इंद्रप्रस्थ के प्रांत मंत्री सुरेंद्र गुप्ता ने गुरुवार (23 अक्टूबर) को घोषणा की कि दिल्ली के सभी 30 जिलों में अलग-अलग स्थलों पर संगठन के स्टॉल लगाए जाएंगे, जहां से ‘प्रमाणित, शुद्ध और उपयोगी’ पूजा सामग्री उपलब्ध कराई जाएगी. साथ ही, हिंदू दुकानदारों, ठेलेवालों और रेहड़ी-पटरी वालों को ‘सत्यापन के पश्चात’ ‘सनातन प्रतिष्ठा’ का आधिकारिक स्टिकर प्रदान किया जाएगा.

यह ‘सत्यापन’ किस आधार पर होगा? गुप्ता ने बताया कि यह ‘दुकान/स्टॉल का पंजीकरण, पहचान और दस्तावेजों की जांच, फिर स्थानीय प्रतिनिधि द्वारा निरीक्षण’ के जरिये निर्धारित होगा. संगठन का दावा है कि यह ‘गुणवत्ता एवं शुद्धता’ सुनिश्चित करने के लिए है.

विहिप यही स्टिकर दुकानदारों को प्रदान करने वाली है.

विहिप का बचाव: ‘किसी के विरुद्ध नहीं’

गुप्ता ने दावा किया कि यह पहल ‘किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और सनातन मान्यताओं की रक्षा के लिए है.’ उन्होंने कहा कि संगठन ‘शांतिपूर्ण, कानूनी और पारदर्शी ढंग से’ काम कर रहा है और ‘सभी समुदायों के प्रति सम्मान’ रखता है.

हालांकि, विहिप का इतिहास बताता है कि इस तरह के अभियानों का असली उद्देश्य धार्मिक पहचान के आधार पर व्यापारियों को अलग करना होता है. जुलाई 2025 में कांवड़ यात्रा के दौरान संगठन ने इसी तरह का ‘सनातनी प्रमाणन’ अभियान चलाया था, जिसमें केवल हिंदू-स्वामित्व वाली दुकानों पर स्टिकर लगाए गए थे.

क्या है ‘जिहादी-मुक्त दिल्ली’ योजना?

द वायर हिंदी से बातचीत में ‘जिहादी-मुक्त दिल्ली’ की व्याख्या करते हुए सुरेंद्र गुप्ता बताते हैं, ‘जो जिहाद की नीयत से हिंदू बहन-बेटियों के साथ प्रेम का ढोंग रचते हैं, हिंदू देवी-देवताओं के नामों से ढाबे चलाते हैं, थूक जिहाद करते हैं, इस प्रकार की जितनी भी गतिविधियां हैं, जो जिहाद की श्रेणी में आती हैं, उन सब गतिविधियों को हम रोकेंगे.’

लेकिन छठ पूजा का सामान बेचना जिहाद कैसे है, और इसे मुसलमानों का आर्थिक बहिष्कार की कोशिश क्यों न माना जाए? तो गुप्ता ने कहा, ‘आप इसे जो भी नाम दे. हमारी सीधी सी बात हैं, जिसको हमारी देवी-देवताओं में आस्था नहीं है, जिसको हमारे धर्म में आस्था नहीं, जिसको हमारी मूर्तियों में आस्था नहीं, हमारे जय श्रीराम के नारे में आस्था नहीं, उसे हमारे त्योहार में सामान बेचने में क्या आस्था है? कहीं और बेच ले. हमसे लाभ कमाने के लिए तो उनको सब स्वीकार है. वैसे उसका मजहब इन बातों के खिलाफ है. यह दोहरा मापदंड कैसे चलेगा.’

विहिप द्वारा जारी पोस्टर.

विहिप अपने इस अभियान को त्योहारों की खरीदारी तक सीमित नहीं कर रहा, उनकी योजना वृहद है. गुप्ता कहते हैं, ‘यह केवल त्योहारों के लिए नहीं है. हमेशा के लिए है. अपने धार्मिक स्थलों के बाहर भी हम इस तरह के अभियान चलाएंगे. हम ग्राहकों को जागरूक करेंगे कि वह स्टिकर देखकर ही सामान ले.​’

गुप्ता ने बताया कि धीरे-धीरे हिंदू रोजमर्रा के सामान भी यही स्टिकर देखकर खरीदेंगे और जिन्हें भी हिंदुओं को सामान बेचना है, उन्हें ‘सनातन प्रतिष्ठान’ का सर्टिफिकेट लेना ही होगा

‘जिहादी-मुक्त दिल्ली’ जैसे शब्दों का उपयोग नया नहीं है. हिंदुत्ववादी संगठन अक्सर ‘जिहादी’ शब्द का इस्तेमाल पूरे मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने के लिए करते हैं.

सितंबर 2025 में इंदौर में विहिप और भाजपा से जुड़े नेताओं ने खुलेआम ‘जिहादी-मुक्त बाजार’ के बैनर लगवाए और मुस्लिम व्यापारियों व कर्मचारियों को कपड़ा बाजारों से बाहर निकाल दिया.

भाजपा नेता और इंदौर की विधायक मालिनी गौड़ के बेटे, एकलव्य सिंह गौड़ ने हिंदू व्यापारियों से मुस्लिम कर्मचारियों को नौकरी से निकालने का आह्वान किया, और बाजार संघों ने तुरंत उसका पालन किया.​

व्यवस्थित आर्थिक बहिष्कार का इतिहास

पिछले कुछ वर्षों में, हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा मुस्लिम व्यापारियों के आर्थिक बहिष्कार के कई मामले सामने आए हैं:

अक्टूबर 2022: भाजपा सांसद परवेश साहिब सिंह वर्मा ने दिल्ली के दिलशाद गार्डन में विहिप की सभा में मुसलमानों के ‘संपूर्ण बहिष्कार’ का आह्वान किया था. उन्होंने कहा था, ‘उनकी दुकानों से सामान मत खरीदो, उन्हें मजदूरी मत दो.’

अगस्त 2023: हरियाणा में हिंसा के बाद, विहिप और बजरंग दल ने मुस्लिम व्यापारों के आर्थिक बहिष्कार और गांवों से मुसलमानों को बाहर निकालने का अभियान चलाया था. बजरंग दल के कृष्णा गुर्जर ने चेतावनी दी थी, ‘जो दुकानदार मुस्लिम कर्मचारी रखेगा, उसकी दुकान के बाहर बहिष्कार के पोस्टर लगाए जाएंगे.’

अक्टूबर 2024: हिमाचल प्रदेश में विहिप के नेतृत्व में संजौली मस्जिद को लेकर हिंसा के बाद, पूरे राज्य में मुस्लिम व्यापारियों के बहिष्कार, उन्हें नौकरी न देने और संपत्ति किराए पर न देने के आह्वान किए गए. कई मुस्लिम प्रवासी मजदूरों को राज्य छोड़ने के लिए मजबूर किया गया.

जुलाई 2025: कांवड़ यात्रा के दौरान विहिप ने दिल्ली में 5,000 दुकानों पर ‘सनातनी’ स्टिकर लगाने का अभियान चलाया. रिपोर्ट्स के अनुसार, मुस्लिम-स्वामित्व वाली दुकानों को जानबूझकर छोड़ दिया गया था.

जून 2025: मुरादाबाद के मंगुपुरा में विहिप नेता स्वामी विज्ञानानंद ने ‘हलाल अर्थव्यवस्था को कमजोर करने’ के लिए मुस्लिम नाई, फल विक्रेताओं और अन्य छोटे व्यवसायियों के बहिष्कार का आह्वान किया था.​

जुलाई 2025: महाराष्ट्र के पुणे के पाउड़ और पिरंगुत गांवों में हिंदुत्ववादी समूहों ने मुस्लिम-स्वामित्व वाली बेकरी, स्क्रैप की दुकानों, सैलून और चिकन की दुकानों को बंद करवा दिया. रोशन बेकरी के मालिक ने बताया था, ‘हमारा परिवार यहां 40 वर्षों से रहता है, फिर भी हमें बाहरी कहा जाता है क्योंकि मेरे पिता का गांव उत्तर प्रदेश में है.’

कानून का उल्लंघन?

अप्रैल 2023 में, सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि भारत के राज्यों को औपचारिक शिकायत की प्रतीक्षा किए बिना घृणास्पद भाषण के मामलों को दर्ज करना चाहिए. जुलाई 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकारों के उस आदेश पर रोक लगा दी थी जिसमें कांवड़ यात्रा मार्ग पर ढाबों और रेस्तरां को मालिकों और कर्मचारियों के नाम प्रदर्शित करने को कहा गया था, यह स्पष्ट रूप से मुस्लिम-स्वामित्व वाले प्रतिष्ठानों की पहचान करने का प्रयास था.​

लेकिन हिंदुत्ववादी संगठनों द्वारा मुसलमानों के बहिष्कार के खुले आह्वानों के बावजूद उन पर क़ानूनी कार्रवाई कम ही हुई है.​

ऐसे अभियानों का असर हिंदुओं पर भी पड़ता है. पुणे में, बेकरियों को बंद करवाने से लगभग 400 मजदूर बेरोजगार हो गए, इनमें हिंदू और मुस्लिम दोनों शामिल थे. भारत बेकरी के मालिक ने कहा था, ‘पांच हिंदू विक्रेता जो हमारी रोटी घर-घर बेचते थे, अब बेरोजगार हैं… यह सिर्फ धर्म के बारे में नहीं है; यह हमारे जीवन यापन के साधन को नष्ट करने के बारे में है.’​

नाजी जर्मनी से समानताएं

कई विश्लेषकों ने इस तरह के आर्थिक बहिष्कार की तुलना 1930 के दशक में नाजी जर्मनी में यहूदी व्यापारों के बहिष्कार से की है. मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने लिखा है, ‘जर्मनी में नाजियों ने यहूदी दुकानों पर ‘जुड’ (यहूदी) शब्द के साथ पीले सितारे लगवाए थे ताकि जर्मन उन्हें पहचान सकें और उनका बहिष्कार कर सकें. भारत में, नाम धर्म और अक्सर जाति के संकेतक हैं, इसलिए यह स्पष्ट रूप से मुस्लिम-स्वामित्व वाले प्रतिष्ठानों की पहचान करने का एक उपकरण है.’

द वायर हिंदी से बातचीत में दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. शम्सुल इस्लाम जोड़ते हैं, ‘जर्मनी में नाजियों द्वारा यहूदी दुकानों के बहिष्कार और भारत में हिंदुत्ववादियों द्वारा मुस्लिम दुकानदारों के बहिष्कार में बहुत समानता होते हुए भी थोड़ा फर्क है. जर्मनी में तो यहूदियों बिजनेस पर अच्छा खासा कंट्रोल था. लेकिन यहां तो बहिष्कार केवल गरीब मुसलमानों का हो रहा है. वह मुसलमान जो फल, सब्जी, टॉफी, चूरन और पुराना कपड़ा आदि बेचता है. इन लोगों (हिंदुत्ववादियों) का झगड़ा ईरान, कुवैत, सऊदी अरब और यूएई से भारत में तेल बेचने वाले मुसलमानों से नहीं है. खुद यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ‘लूलू ग्रुप’ के मॉल का उद्घाटन किया था, जो यूएई में रहने वाले अरबपति मुस्लिम व्यापारी एम. ए. यूसुफ अली का है.’

 

Source: The Wire