महाराष्ट्र–कर्नाटक सीमा विवाद से जुड़ी याचिका पर कल सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई होने जा रही है। यह याचिका वर्ष 2004 में महाराष्ट्र सरकार द्वारा दायर की गई थी, जिस पर लगभग 20 वर्षों के बाद अब सुनवाई हो रही है।
याचिका में मराठी भाषी बहुल बेलगावी सहित 865 सीमावर्ती क्षेत्रों को महाराष्ट्र में शामिल करने की मांग की गई है। इस मामले को लेकर कर्नाटक सरकार ने कड़ा रुख अपनाया है और याचिका पर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई हैं।
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने हाल ही में बेलगावी की धरती से महाराष्ट्र को सख्त संदेश देते हुए कहा कि सीमा रेखाओं की पहचान और निर्धारण का सर्वोच्च अधिकार संसद के पास है, न कि न्यायपालिका के पास। कर्नाटक सरकार का स्पष्ट तर्क है कि राज्य की सीमाओं का निर्धारण सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भरोसा जताया कि कर्नाटक की ओर से मजबूत और प्रभावी दलीलें पेश की जाएंगी। उन्होंने कहा कि राज्य के पास सक्षम और अनुभवी वकीलों की टीम है और महाराष्ट्र का यह मामला कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “देयर इज़ नो केस।”
उन्होंने यह भी कहा कि पहले यह तय किया जाना चाहिए कि यह याचिका सुनवाई योग्य है या नहीं, क्योंकि कर्नाटक का मानना है कि यह मामला न्यायिक दायरे से बाहर है। सुप्रीम कोर्ट में होने वाली इस सुनवाई को सीमा विवाद के मामले में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।







