ट्रम्प का 48 घंटे का अल्टीमेटम, क्षेत्र में तनाव चरम पर
हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर टकराव, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहराता खतरा

अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच जारी संघर्ष अब 23वें दिन में प्रवेश कर चुका है। लगातार चार हफ्तों की लड़ाई ने हालात को बेहद गंभीर बना दिया है। देर रात अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक कड़ा संदेश जारी करते हुए तेहरान को स्पष्ट चेतावनी दी कि हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को सभी जहाजों के लिए तुरंत खोल दिया जाए—न कोई धमकी, न कोई रुकावट। यदि 48 घंटों के भीतर ऐसा नहीं हुआ तो अमेरिका ईरान के पावर प्लांट्स पर हमला करेगा, जिसकी शुरुआत सबसे बड़े संयंत्र से की जाएगी। यह समयसीमा सोमवार रात लगभग 11:44 बजे समाप्त होगी।

यह कोई सुनियोजित रणनीति नहीं, बल्कि आक्रामक रुख है जो दृढ़ता के आवरण में दिखाई दे रहा है। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य कोई साधारण समुद्री मार्ग नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है। दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल इसी संकरे रास्ते से गुजरता है। ईरान के हालिया मिसाइल हमलों और इसके बाद लगाए गए प्रतिबंधों ने तेल टैंकरों की आवाजाही रोक दी है, जिससे ऊर्जा बाजार प्रभावित हुआ है। ब्रेंट क्रूड की कीमत 105 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई है। जापान जैसे देश, जो अपनी 90 प्रतिशत तेल जरूरत इसी मार्ग से पूरी करते हैं, अब आपूर्ति संकट और महंगाई का सामना कर रहे हैं।

ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड का कहना है कि जब तक उनके ऊर्जा संयंत्र बहाल नहीं होते, तब तक जलडमरूमध्य बंद रहेगा। यह केवल बयान नहीं, बल्कि एक गंभीर चेतावनी है, जो क्षेत्रीय संघर्ष को वैश्विक ऊर्जा संकट में बदल सकती है।

तेहरान की जिद और वाशिंगटन की जोखिम भरी नीति एक खतरनाक मोड़ पर मिल रही है। आम नागरिकों को अंधेरे में धकेलने की धमकी देना कूटनीति नहीं, बल्कि सामूहिक सजा है, जिसमें परमाणु जोखिम भी छिपा है। एक गलत मिसाइल या संकेत हालात को पारंपरिक युद्ध से आगे ले जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र के परमाणु प्रमुख राफेल ग्रोसी की शांति की अपील इस स्थिति की गंभीरता को दर्शाती है।

ट्रम्प द्वारा जुटाए गए सहयोगी—ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान और खाड़ी देश—सिर्फ दर्शक नहीं हैं। उनका संयुक्त बयान बढ़ती चिंता का संकेत है। जापान द्वारा माइन स्वीपर भेजने की तैयारी यह दिखाती है कि ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए अब सैन्य विकल्पों पर विचार हो रहा है।

वास्तविकता यह है कि न ट्रम्प और न ही ईरानी नेतृत्व पीछे हटने को तैयार दिखता है। दोनों अपने-अपने घरेलू दर्शकों के लिए राजनीतिक संदेश दे रहे हैं, जबकि पूरी दुनिया इसकी कीमत चुका रही है। इतिहास बताता है कि प्रतिबंध, हमले या दबाव कभी भी स्थायी समाधान नहीं लाते—बल्कि लंबे संघर्ष, अस्थिरता और विद्रोह को जन्म देते हैं।

समय तेजी से निकल रहा है। बाजार अस्थिर हैं, तेल टैंकर रुके हुए हैं, और यूरोप व एशिया में ऊर्जा की कीमतों का बोझ बढ़ने वाला है, जिसका सबसे अधिक असर गरीबों पर पड़ेगा। यह अब केवल क्षेत्रीय विवाद नहीं रहा, बल्कि वैश्विक स्थिरता का प्रश्न बन चुका है।

कूटनीति कमजोरी नहीं, बल्कि इस संकट में सबसे समझदारी भरा विकल्प है। अमेरिका के पास शक्ति है, ईरान के पास रणनीतिक भौगोलिक स्थिति—दोनों के पास जिम्मेदारी है कि वे टकराव से पीछे हटें। क्योंकि यदि यह संघर्ष बम धमाकों के साथ आगे बढ़ता है, तो जीत-हार का सवाल नहीं रहेगा, बल्कि तबाही की कीमत पूरी दुनिया को चुकानी पड़ेगी।

दुनिया कोई तमाशा नहीं देख रही, बल्कि एक खतरनाक स्थिति को वास्तविक समय में घटित होते देख रही है। अभी भी समय है कि इस आग को बुझाया जाए, इससे पहले कि इसका विस्फोट मानव जीवन और वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुंचाए।

लेखक: जमी़ल अहमद मिलनसार – बेंगलुरु

Source: Haqeeqat Times