टीवी रेटिंग्स पर TRAI की निगरानी खत्म, अब सरकार के पास पूरा नियंत्रण
केंद्र सरकार ने टेलीविजन रेटिंग्स पर भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (TRAI) की निगरानी समाप्त कर दी है और इस प्रणाली का पूरा नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया है। लाइवमिंट की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले सप्ताह जारी 2026 की नई नीति के तहत पूर्ण निगरानी अधिकार सूचना और प्रसारण मंत्रालय (MIB) को सौंप दिए गए हैं।
अब तक इस पर TRAI और मंत्रालय दोनों की साझा निगरानी थी। हालांकि, TRAI प्रसारण और केबल टीवी क्षेत्र के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं—जैसे चैनल मूल्य निर्धारण, विज्ञापन सीमा, इंटरकनेक्शन और वितरण नियम, सेवा गुणवत्ता और अनुपालन मानकों—को नियंत्रित करता रहेगा।
नई नीति में टीवी रेटिंग सेवाएं प्रदान करने वाली सभी संस्थाओं के पंजीकरण, संचालन, ऑडिट और निगरानी के लिए दिशा-निर्देश तय किए गए हैं। टीवी रेटिंग्स रोज़ाना लाखों दर्शकों की पसंद को ट्रैक करती हैं और विज्ञापन खर्च की दिशा तय करती हैं।
मार्च में जारी EY-FICCI रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय कंपनियों ने 2025 में टीवी विज्ञापनों (कनेक्टेड टीवी सहित) पर ₹36,200 करोड़ खर्च किए। हालांकि, रेटिंग्स को लेकर विवाद भी सामने आते रहे हैं। 2020 में मुंबई पुलिस ने ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) के खिलाफ कथित TRP हेरफेर मामले की जांच की थी।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि TRAI को निगरानी ढांचे से हटाकर सभी अधिकार मंत्रालय में केंद्रित करने से स्वतंत्र नियामक जांच की कमी को लेकर चिंताएं बढ़ सकती हैं। किंग स्टब एंड कसीवा एडवोकेट्स एंड अटॉर्नीज के पार्टनर राहुल मेहता के अनुसार, पारदर्शिता और उद्योग के भरोसे को बनाए रखने के लिए स्वतंत्र निगरानी बेहद जरूरी है, क्योंकि टीवी रेटिंग्स सीधे विज्ञापन राजस्व, प्रतिस्पर्धा और बाजार की विश्वसनीयता को प्रभावित करती हैं।
प्रसारकों और नियामकों के बीच अक्सर टकराव देखने को मिला है। प्रसारकों का कहना है कि सख्त मूल्य नियंत्रण और चैनल नियम उनकी व्यावसायिक स्वतंत्रता को सीमित करते हैं और आय पर असर डालते हैं। उद्योग ने प्रति घंटे 12 मिनट के विज्ञापन सीमा लागू करने के प्रयास का भी विरोध किया है, इसे अव्यावहारिक बताया गया है।
इतिहास में TRAI ने टीवी रेटिंग ढांचे को आकार देने में अहम भूमिका निभाई है। 2012 में सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने रेटिंग एजेंसियों के लिए दिशा-निर्देश और मान्यता तंत्र तैयार करने हेतु TRAI से सिफारिशें मांगी थीं, जिसके आधार पर 2014 में नीति लागू की गई।
उस समय रेटिंग एजेंसियों को TRAI अधिनियम, 1997 के तहत लाया गया था, जिससे नियामक को ऑडिट और बिना पूर्व सूचना निरीक्षण का अधिकार मिला। एजेंसियों के लिए डेटा और रिपोर्ट देना अनिवार्य किया गया था।
लेकिन 2026 की नई नीति में TRAI अधिनियम का उल्लेख नहीं है और सभी शक्तियां मंत्रालय के पास केंद्रित कर दी गई हैं। साथ ही, पहले टेलीकॉम विवाद निपटान और अपीलीय न्यायाधिकरण (TDSAT) द्वारा संभाले जाने वाले विवाद अब नई दिल्ली की अदालतों को स्थानांतरित कर दिए गए हैं।
TRAI के पूर्व प्रमुख सलाहकार सत्येंद्र गुप्ता ने इसे “पीछे की ओर कदम” बताया है और कहा कि स्वतंत्र नियामक को हटाना व्यवस्था को कमजोर करता है।
वहीं, पूर्व प्रसार भारती सीईओ शशि शेखर वेम्पति ने स्पष्ट किया कि मंत्रालय हमेशा से दिशानिर्देशों और लाइसेंसिंग के माध्यम से रेटिंग एजेंसियों की निगरानी करता रहा है, जबकि TRAI की भूमिका सलाहकार की रही है और आगे भी रह सकती है।
उद्योग के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, नई नीति मंत्रालय के तहत अधिक स्थिर और पूर्वानुमेय नियामक वातावरण प्रदान कर सकती है और अत्यधिक सख्त नियमों के जोखिम को कम कर सकती है, जिसके लिए TRAI की आलोचना होती रही है।
हालांकि, उद्योग में कई चिंताएं बनी हुई हैं।
► उद्योग की चिंताएं
फिलहाल, BARC भारत की एकमात्र लाइसेंस प्राप्त रेटिंग एजेंसी है, जो प्रसारकों और विज्ञापनदाताओं के संयुक्त स्वामित्व में है। नई नीति में जहां अधिक एजेंसियों के प्रवेश को आसान बनाया गया है, वहीं यह भी अनिवार्य किया गया है कि बोर्ड के कम से कम 50% सदस्य स्वतंत्र निदेशक हों, जिनका प्रसारकों या विज्ञापनदाताओं से कोई संबंध न हो।
सरकार ने टीवी रेटिंग मापन ढांचे के विस्तार का भी निर्देश दिया है। एजेंसियों को 18 महीनों में TRP मीटर की संख्या 80,000 तक बढ़ानी होगी और हर साल कम से कम 10,000 नए मीटर जोड़कर इसे 1.2 लाख तक पहुंचाना होगा।
भारत में लगभग 23 करोड़ टीवी घर हैं, लेकिन जुलाई 2025 तक केवल करीब 58,000 मीटर ही उपयोग में थे, जो कुल घरों का मात्र 0.025% है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े और विविध देश के लिए यह नमूना बहुत छोटा है। क्रोम डेटा एनालिटिक्स एंड मीडिया के संस्थापक पंकज कृष्णा के अनुसार, कुछ हजार अतिरिक्त मीटर 1.44 अरब की आबादी का सटीक प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते।
उन्होंने यह भी बताया कि मौजूदा प्रणाली में गंभीर खामियां हैं, जैसे पैनल घरों के पते लीक होने से डेटा में हेरफेर की संभावना। इससे वास्तविक दर्शक डेटा की जगह कृत्रिम रेटिंग्स बन जाती हैं।
समाधान के रूप में, विशेषज्ञों ने ऐप्स और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म के जरिए डिजिटल ट्रैकिंग अपनाने की सलाह दी है। यह तरीका अधिक सस्ता, सुरक्षित और स्केलेबल है तथा वास्तविक समय में दर्शकों के व्यवहार की अधिक सटीक जानकारी दे सकता है।
Source: Vartha Bharathi (Translated In English)







