दावणगेरे का खामोश सियासी संकट
रिवायत, नुमाइंदगी और बिखरती हुई क़ियादत का अलमिया

दावणगेरे और बागलकोट के ज़िमनी इंतिख़ाबात के बाद कर्नाटक की सियासत में जो सबसे अहम और ताज़ा तस्वीर सामने आई है, वो मुस्लिम क़ियादत के अंदर उभरते इख़्तिलाफ़ात, गिरोहबंदी और आपसी इल्ज़ाम तराशी की है। इस पहलू ने पूरे इंतिख़ाबी अमल को एक नए ज़ाविये से देखने पर मजबूर कर दिया है। वोटिंग के फ़ौरन बाद जिस तरह के बयانات सामने आए, उससे ये साफ हो गया कि मामला सिर्फ़ इंतिख़ाबी मुक़ाबले का नहीं, बल्कि अंदरूनी सतह पर गहरे इख़्तिलाफ़ात का भी है, जो अब पर्दे के पीछे रहने के बजाय खुलकर सामने आ रहे हैं।

कर्नाटक के दावणगेरे और बागलकोट में हुए ये ज़िमनी इंतिख़ाबात बेशक एक मामूली जम्हूरी अमल लगते हैं, मगर इनके पीछे जो हालात, फ़ैसले और रद्दे-अमल सामने आए हैं, वो एक गहरे सियासी और समाजी संकट की निशानदेही करते हैं। ये सिर्फ़ एक सीट का सवाल नहीं, बल्कि एक ऐसी कड़ी है जिसमें रिवायत, नुमाइंदगी, क़ियादत और एतिमाद—सब एक-दूसरे में उलझते हुए नज़र आते हैं।

कुछ हल्के सिर्फ़ इंतिख़ाबी मैदान नहीं होते, बल्कि वो सियासी सोच, समाजी तवाज़ुन और ताक़त की अंदरूनी कशमकश का अक्स होते हैं। दावणगेरे भी ऐसा ही एक हल्का है—जहाँ ज़ाहिर में सब कुछ मामूल के मुताबिक़ दिखता है, मगर अंदरूनी तौर पर हालात कहीं ज़्यादा पेचीदा और मानीख़ेज़ हैं। हालिया ज़िमनी इंतिख़ाब के बाद जो फ़िज़ा बनी है, वो नताइज से पहले ही कई इशारे दे रही है। एक ख़ामोशी ज़रूर है, मगर इस ख़ामोशी में बेचैनी साफ महसूस की जा सकती है—ऐसी बेचैनी जिसे खुलकर बयान नहीं किया जा रहा, मगर उसके असरात हर तरफ़ दिखाई दे रहे हैं।

दावणगेरे दक्षिण हल्का लंबे अरसे से एक ख़ास सियासी असर का मरकज़ रहा है, और इस बार भी वही रिवायत दोहराई गई जिसमें किसी मरहूम रहनुमा के बाद उसी के ख़ानदान को टिकट देना एक फितरी इंतिख़ाब समझा जाता है। ज़ाहिर तौर पर इसे वफ़ादारी और तसल्सुल की निशानी के तौर पर पेश किया जाता है, मगर इसके अंदर एक अहम सवाल छिपा रहता है—क्या इस रिवायत की वजह से दूसरे मज़बूत और असरदार तबक़ात, ख़ुसूसन वो तबक़ा जो वोट के लिहाज़ से फ़ैसला कुन है, खुद को नज़रअंदाज़ महसूस नहीं करता?

इस हल्के में मुस्लिम वोटरों की अच्छी-ख़ासी तादाद हमेशा से एक हक़ीक़त रही है। यही वजह है कि हर इंतिख़ाब में उनकी अहमियत को तस्लीम किया गया, मगर इस बार लिए गए फ़ैसले ने एक नई बहस को जन्म दिया। नुमाइंदगी के सवाल को पीछे रखकर रिवायत को तरजीह देना भले ही एक अंदरूनी फ़ैसला रहा हो, मगर इसके असरात काफ़ी वसीअ तौर पर महसूस किए गए। कहीं ख़ामोश नाराज़गी, कहीं फ़ासला, और कहीं महदूद सरगर्मियाँ—इन सबने मिलकर एक ऐसी फ़िज़ा पैदा की जिसे अल्फ़ाज़ में बयान करना मुश्किल है, मगर उसे महसूस किया जा सकता है।

ये इंतिख़ाब एक आईना साबित हुए हैं—जिसमें न सिर्फ़ सियासी जमाअतों का असली चेहरा सामने आया, बल्कि मुस्लिम वोटरों की बदलती सोच और बढ़ती हुई सियासी शऊर की झलक भी साफ़ तौर पर दिखाई दी। इस बार “ख़ामोश ताईद” की जगह “सोच-समझकर फ़ैसला” करने का रुझान सामने आया है। बरसों से एक ख़ास सियासी जमाअत को अपना फितरी हलीफ़ समझने वाले मुसलमान अब सवाल उठाने लगे हैं—और यही सवालात पूरे सियासी मंज़रनामे को बदलने की सलाहियत रखते हैं।

वोटिंग के बाद सामने आने वाले बयانات ने इस तास्सुर को और मज़बूत किया कि इख़्तिलाफ़ सिर्फ़ सतही नहीं बल्कि गहरा है। इशारों और किनायों में ये बात सामने आई कि अंदरूनी सतह पर मुकम्मल हमआहंगी मौजूद नहीं थी, और कुछ फ़ैसले ऐसे रहे जिन्होंने एतिमाद के फ़क़दान को और बढ़ा दिया। कहा जाता है कि कुछ फ़ैसले हालात के दबाव में लिए जाते हैं—और फिर उन्हीं फ़ैसलों की क़ीमत पूरी क़ियादत को चुकानी पड़ती है।

मुस्लिम क़ियादत के अंदर इख़्तिलाफ़ात और गिरोहबंदी इस पूरे अमल में एक मरकज़ी हैसियत इख़्तियार कर चुके हैं। ये इख़्तिलाफ़ नए नहीं हैं, मगर दावणगेरे में जिस शिद्दत के साथ सामने आए, उन्होंने पूरे इंतिख़ाबी माहौल को मुतास्सिर किया। टिकट तक़सीम से लेकर इंतिख़ाबी मुहिम और वोटिंग के बाद के बयानों तक हर मरहले पर ये एहसास रहा कि क़ियादत एक सफ़्हे पर नहीं है।

सियासत में इख़्तिलाफ़-ए-राय एक फितरी अमल है, मगर जब यही इख़्तिलाफ़ गिरोहबंदी में तब्दील हो जाए तो उसके असरात न सिर्फ़ पार्टी बल्कि उस तबक़े पर भी पड़ते हैं जिसकी नुमाइंदगी का दावा किया जाता है। इस इंतिख़ाब में यही मंजर साफ़ तौर पर सामने आया—कहीं ख़ामोशी, कहीं बेरुख़ी, और कहीं गैर-एइलानी फ़ासले ने पूरे माहौल को मुतास्सिर किया।

इस पूरी सूरत-ए-हाल का सबसे अहम पहलू ये है कि नतीजा कुछ भी हो, नुकसान एक ही सिम्त में जाता नज़र आता है। अगर नताइज मनफ़ी आते हैं तो ज़िम्मेदारी मुस्लिम क़ियादत के इख़्तिलाफ़ात पर डाली जाएगी, और अगर नताइज मुस्बत भी हों तो कामयाबी का सेहरा दूसरे असबाब के सर बाँधा जाएगा, जबकि मुस्लिम क़ियादत का किरदार पीछे रह जाएगा।

मुसलमानों के दरमियान भी अब ये एहसास मज़बूत हो रहा है कि क़ियादत के अंदर हमआहंगी का फ़क़दान उनके मुश्तरका मफ़ाद को नुकसान पहुँचा रहा है। अगर ये रवैया जारी रहा तो मुमकिन है कि कोई नया सियासी प्लेटफ़ॉर्म या बयानिया भी सामने आए।

आख़िर में यही कहा जा सकता है कि दावणगेरे का ये पूरा मामला एक ख़ामोश सबक़ अपने अंदर समेटे हुए है—सियासी ताक़त सिर्फ़ तादाद से नहीं, बल्कि इत्तेहाद, एतिमाद और दियानत से भी क़ायम रहती है।

“हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,
दिल के खुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है।”

लेखक: अब्दुल हलीम मंसूर