तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल के दाम में 90 पैसे प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी की है. एक हफ्ते से कम समय में यह दूसरी वृद्धि है. दिल्ली में पेट्रोल 98.64 रुपये और डीजल 91.58 रुपये प्रति लीटर पहुंच गया है. बढ़ती ईंधन कीमतों से महंगाई बढ़ने की आशंका जताई जा रही है.

 

नई दिल्ली: पेट्रोल और डीजल की कीमतों में मंगलवार (19 मई 2026) को एक बार फिर बढ़ोतरी कर दी गई. तेल कंपनियों ने दोनों ईंधनों के दाम में 90 पैसे प्रति लीटर तक की वृद्धि की है. एक हफ्ते से भी कम समय में यह दूसरी बढ़ोतरी है. इससे पहले 15 मई को पेट्रोल और डीजल के दाम में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई थी.

नई दरों के बाद राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पेट्रोल 98.64 रुपये प्रति लीटर हो गया है, जो पहले 97.77 रुपये था. वहीं डीजल की कीमत 90.67 रुपये से बढ़कर 91.58 रुपये प्रति लीटर पहुंच गई है.

मुंबई में पेट्रोल 91 पैसे महंगा होकर 107.59 रुपये प्रति लीटर पर पहुंच गया, जबकि डीजल 94 पैसे बढ़कर 94.08 रुपये प्रति लीटर हो गया.

कोलकाता में पेट्रोल की कीमत में सबसे अधिक 96 पैसे की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिसके बाद वहां पेट्रोल 109.70 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है. डीजल की कीमत 94 पैसे बढ़कर 96.07 रुपये प्रति लीटर हो गई है.

चेन्नई में पेट्रोल 82 पैसे महंगा होकर 104.49 रुपये प्रति लीटर पहुंच गया, जबकि डीजल 86 पैसे बढ़कर 96.11 रुपये प्रति लीटर हो गया. राज्यों में स्थानीय करों के अंतर के कारण ईंधन कीमतें अलग-अलग हैं.

तेल कंपनियों की ओर से लगातार दूसरी बार कीमत बढ़ाए जाने के बाद आम लोगों पर महंगाई का दबाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है. पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि का असर परिवहन लागत के जरिए रोजमर्रा के सामानों और सेवाओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है.

सरकार का क्या तर्क है?

पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, शुक्रवार को हुई 3 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि से ओएमसी को कुछ राहत मिली थी. पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की बिक्री पर कंपनियों को हो रहा संयुक्त दैनिक घाटा करीब एक चौथाई घटकर लगभग 750 करोड़ रुपये प्रतिदिन रह गया था. इससे पहले यह घाटा करीब 1,000 करोड़ रुपये प्रतिदिन था.

मंगलवार की बढ़ोतरी से कंपनियों को कुछ और राहत मिलने की संभावना है. ध्यान रहे कि पश्चिम एशिया युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने के बाद वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, भारतीय कच्चे तेल का औसत मूल्य पिछले वर्ष लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल था. अप्रैल में यह बढ़कर 114 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया, जबकि मई में अब तक औसत कीमत लगभग 107 डॉलर प्रति बैरल रही है. रिफाइनरियों को स्पॉट मार्केट से आपात खरीद, बढ़े हुए शिपिंग चार्ज और बीमा दरों के कारण अतिरिक्त लागत उठानी पड़ रही है.

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का तेल आयात बिल लगभग 135 अरब डॉलर रहा है. यदि चालू वित्त वर्ष में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रहती हैं और आयात मात्रा में कमी नहीं आती, तो देश का तेल आयात बिल 200 अरब डॉलर से ऊपर जा सकता है.

चरणबद्ध तरीके से कीमत बढ़ाने की तैयारी

सरकार के भीतर पिछले कुछ समय से पेट्रोल-डीजल कीमतों में बढ़ोतरी पर चर्चा तेज हो गई थी. एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है, इस बात पर सहमति थी कि मूल्य वृद्धि जरूरी है, लेकिन सवाल यह था कि बढ़ोतरी एकमुश्त की जाए या चरणबद्ध तरीके से. अंततः सरकार ने चरणबद्ध रणनीति अपनाई.

उद्योग सूत्रों का कहना है कि एकमुश्त बड़ी बढ़ोतरी राजनीतिक रूप से स्वीकार्य नहीं होती और इससे जनता पर झटका पड़ता. चरणबद्ध वृद्धि से सरकार को कीमतें धीरे-धीरे उपभोक्ताओं पर डालने, साथ ही जन प्रतिक्रिया और महंगाई के असर पर नजर रखने का मौका मिलता है.

ऊर्जा कीमतों में वैश्विक उछाल ऐसे समय आया, जब कई राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे थे. ऐसे माहौल में ईंधन कीमतें बढ़ाना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा माना जा रहा था. चुनाव खत्म होने के बाद मूल्य वृद्धि लगभग तय मानी जा रही थी.

तकनीकी रूप से पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें नियंत्रणमुक्त हैं, लेकिन व्यवहार में 90 प्रतिशत बाजार हिस्सेदारी रखने वाली सरकारी तेल कंपनियां सरकार से परामर्श के बाद ही कीमतें तय करती रही हैं. अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ने पर कंपनियों को घाटा उठाना पड़ता है, जबकि कीमतें घटने पर उन्हें लाभ होता है.