हिंदुस्तानी मुसलमान और मुनासिब हिकमत-ए-अमली की ज़रूरत

हिंदुस्तान के मौजूदा हालात में मुसलमानों को जज़्बाती सियासत के बजाय हिकमत, सब्र और दूरअंदेशी से काम लेने की ज़रूरत है। मुल्क में बड़े जानवरों की कुर्बानी और ज़बीहा को लेकर बढ़ती पाबंदियों, गोरक्षा के नाम पर हो रही गुंडागर्दी और कानून हाथ में लेने वाली ताकतों के बीच अब मुस्लिम समाज को नई सोच और मुनासिब स्ट्रैटेजी अपनानी होगी।

मज़मून में कहा गया है कि इस्लाम सिर्फ जज़्बात नहीं, बल्कि हिकमत, अमन और मस्लहत का भी दीन है। कुरआन और सीरत-ए-नबी ﷺ में ऐसे कई वाक़ियात मौजूद हैं जहाँ हालात के मुताबिक समझदारी और सुलह की राह अपनाकर बड़ी कामयाबी हासिल की गई। सुलह हुदैबिया, हिल्फुल फुज़ूल और मदीना मुआहिदा जैसी मिसालें आज भी उम्मत के लिए मशअल-ए-राह हैं।

लेख में दावा किया गया है कि अगर मुल्कभर में बड़े जानवरों के ज़बीहा पर मुकम्मल पाबंदी लगाई जाती है तो इससे सिर्फ मुसलमान ही नहीं बल्कि किसानों, चमड़ा उद्योग, मीट एक्सपोर्ट और लाखों रोज़गारों पर भी गहरा असर पड़ेगा। इससे हिंदुस्तानी इकॉनमी को भारी नुकसान होने की आशंका जताई गई है।

मज़मून में बंगाल की मिसाल देते हुए कहा गया कि वहाँ मुसलमानों ने बड़े जानवरों की खरीद से दूरी बनाकर एक “खामोश मआशी हिकमत-ए-अमली” अपनाई, जिसके बाद पशुपालकों और कारोबारियों में खुद नाराज़गी बढ़ने लगी। लेखक का कहना है कि अगर मुसलमान जज़्बाती रिएक्शन से बचकर सोच-समझकर फैसले लें तो हालात को बेहतर तरीके से बदला जा सकता है।

लेखक ने उलमा, बुद्धिजीवियों और मुस्लिम रहनुमाओं से अपील की है कि वे हालात की नज़ाकत को समझें और समाज को सब्र, अमन और मुनासिब रणनीति की तरफ रहनुमाई करें।

अज़ : सर्फराज अहमद क़ासमी (हैदराबाद)

Source: Haqeeqat Times