“Cockroach Janata Party” — नई नस्ल का तंजिया एहतिजाज या खामोश इंकलाब की दस्तक?
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की मशहूर लाइन —
“ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शब-गज़ीदा सहर…”
— आज के हिंदुस्तान की सियासी और समाजी बेचैनी को फिर से ज़िंदा करती नज़र आ रही है।
“Cockroach Janata Party” अब सिर्फ एक सोशल मीडिया मीम या टेम्पररी ट्रेंड नहीं रहा। ये धीरे-धीरे एक ऐसे अवामी और नफ़्सियाती एहतिजाज की शक्ल लेता दिख रहा है, जिसने नई नस्ल के अंदर सिस्टम, मीडिया, अदालिया और सियासी इदारों के प्रति बढ़ते हुए बे-एतेमादी को सामने ला दिया है।
दिलचस्प बात ये है कि जिस लफ़्ज़ “cockroach” को तौहीन और मज़ाक के तौर पर इस्तेमाल किया गया था, वही आज एक resistance symbol बनता जा रहा है। सोशल मीडिया पर हज़ारों लोग खुद को तंजिया अंदाज़ में “cockroach” कहकर सिस्टम से सवाल पूछ रहे हैं।
Chief Justice Surya Kant के एक controversial remark के बाद शुरू हुई ये online लहर अब सिर्फ बेरोज़गारी या students के गुस्से तक महदूद नहीं रही। इसमें paper leak, exams में corruption, media bias, institutional neutrality, communal politics, unemployment और democratic accountability जैसे बड़े मुद्दे भी शामिल हो चुके हैं।
सियासी हलकों में इस movement को लेकर कई तरह के दावे किए गए। कुछ ruling party supporters ने इसे foreign conspiracy या opposition-backed campaign बताया, लेकिन अब तक किसी भी इल्ज़ाम का कोई मज़बूत सबूत सामने नहीं आया। दूसरी तरफ आम लोगों का कहना है कि ये movement असली public issues को आवाज़ दे रहा है।
Instagram और दूसरे social platforms पर “Cockroach Janata Party” के followers की तेज़ी से बढ़ती तादाद ने political observers को भी हैरान कर दिया। कई लोग इसे traditional politics के खिलाफ youth frustration का digital expression बता रहे हैं।
Experts का मानना है कि नई नस्ल अब conventional political language से मुतमइन नहीं। Meme, satire, reels और online campaigns अब नए दौर का protest tool बन चुके हैं।
“अगर सवाल पूछना जुर्म है, तो हम सब cockroach हैं” जैसे slogans सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं।
Movement से जुड़े लोगों का कहना है कि उनका मकसद सिर्फ अवामी मसाइल को highlight करना और fear environment में questioning culture को ज़िंदा रखना है। Founder Abhijeet Dipke को allegedly trolling और threats का सामना भी करना पड़ा, जिसने debate को और sensitive बना दिया।
इस movement की एक खास बात इसका non-communal narrative भी माना जा रहा है। Platform पर religious polarization और hate politics के खिलाफ openly posts की जा रही हैं। Muslim youth समेत अलग-अलग communities के लोग भी इस campaign से जुड़ते नज़र आ रहे हैं।
Political analysts का कहना है कि हो सकता है ये movement कुछ हफ्तों बाद सिर्फ एक meme बनकर रह जाए। लेकिन एक बात साफ है — हिंदुस्तान की नई नस्ल अब सिर्फ खामोश तमाशाई बनकर रहने को तैयार नहीं। वो सवाल पूछ रही है, protest कर रही है, और digital platforms को resistance की सड़क बना रही है।
सवाल अब ये नहीं कि youth satire क्यों कर रही है। असल सवाल ये है कि वो इतनी मायूस क्यों है?
By Abdul Haleem Mansoor
Source: Haqeeqat Times (Translated In Hindi)

