मणिपुर के ज़ख्म, इंसाफ़ का इंतज़ार
मणिपुर जल रहा है, और दिल्ली ने लाशें गिनना सीख लिया है
तीन साल बाद भी अमन के दावों के बीच पीड़ित इंसाफ़ के इंतज़ार में
कुछ हादसों के साथ हुकूमतों का रवैया वक्त के साथ बदल जाता है। शुरुआत में यक़ीन दिलाए जाते हैं। फिर मज़म्मत होती है। फिर कमेटियाँ बनती हैं, मुआवज़े का ऐलान होता है, अमन की अपीलें की जाती हैं और ज़्यादा सिक्योरिटी फोर्स भेजी जाती हैं।
फिर धीरे-धीरे वक्त गुज़रता है। ख़बरें कम हो जाती हैं। टेलीविज़न की ब्रेकिंग न्यूज़ बदल जाती हैं। और एक दिन पूरा हादसा कुछ आँकड़ों में सिमट जाता है।
306 हलाक। 49 लापता।
ये आँकड़े गृह मंत्री ने मणिपुर विधानसभा में पेश किए हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या ये सिर्फ़ आँकड़े हैं?
नहीं।
306 का मतलब सिर्फ़ 306 नहीं होता।
इनमें से हर शख़्स का एक नाम था। एक घर था। एक माँ, एक पिता, बीवी, शौहर, बच्चे या भाई-बहन थे। किसी के इंतज़ार में शायद आज भी किसी घर का दरवाज़ा देर तक खुला रहता होगा। किसी की तस्वीर आज भी दीवार पर लगी होगी। किसी बच्चे ने शायद अब तक यह मानने से इनकार किया होगा कि उसका अपना कभी वापस नहीं आएगा।
और फिर 49 लोग लापता हैं।
मौत, कितनी भी दर्दनाक क्यों न हो, कभी-कभी एक आख़िरी हक़ीक़त बन जाती है। लेकिन लापता होना? वह मौत से भी ज़्यादा बेरहम इंतज़ार है।
किसी को नहीं मालूम कि वह ज़िंदा है या मर चुका है। किसी को यह भी नहीं मालूम कि किस चीज़ का इंतज़ार किया जाए—एक फ़ोन कॉल का, किसी सरकारी इत्तिला का, किसी लाश के मिलने का या किसी ऐसे मोज़िज़े का जिस पर अक़्ल यक़ीन नहीं करती, मगर दिल फिर भी उम्मीद लगाए बैठा रहता है।
यह सिर्फ़ मणिपुर का सवाल नहीं
यह सवाल पूरे हिंदुस्तान से है।
आख़िर एक जम्हूरी और आईनी मुल्क में यह सब इतने लंबे अरसे तक कैसे चलता रहा?
मई 2023 में हुआ ‘ट्राइबल सॉलिडैरिटी मार्च’ मौजूदा हिंसा का फ़ौरी सबब बना। यह मार्च मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति यानी Scheduled Tribe का दर्जा दिए जाने की मांग के ख़िलाफ़ निकाला गया था।
लेकिन यह कहना कि मणिपुर का संकट उसी दिन शुरू हुआ, हक़ीक़त से नज़रें चुराना होगा।
मणिपुर की जुग़राफ़ियाई और सियासी बनावट हमेशा से पेचीदा रही है। मैतेई समुदाय राज्य की लगभग 53 प्रतिशत आबादी है और मुख्य रूप से इम्फाल घाटी में आबाद है। दूसरी तरफ़ नगा और कुकी समेत आदिवासी समुदाय लगभग 40 प्रतिशत आबादी का हिस्सा हैं और ज़्यादातर पहाड़ी इलाक़ों में रहते हैं।
लेकिन ये सिर्फ़ आबादी के आँकड़े नहीं हैं।
इनके पीछे ज़मीन के झगड़े हैं। पहचान का सवाल है। सियासी नुमाइंदगी का मसला है। जंगल और ज़मीन के हक़ हैं। पलायन का डर है। वसाइल की तक़सीम का सवाल है और एक-दूसरे पर बरसों से कायम बे-एतमादी है।
आग उस दिन लगी, लेकिन बारूद पहले से जमा था
मई 2023 में हिंसा शुरू हुई, लेकिन उसके लिए ज़मीन बहुत पहले तैयार हो चुकी थी।
यह कहना ज़्यादा सही होगा कि आग उस दिन लगी, मगर सवाल यह भी है कि बारूद वहाँ किसने और कब से जमा होने दिया था?
इतिहास को समझना ज़रूरी है, लेकिन इतिहास को हुकूमत की नाकामी का बहाना नहीं बनाया जा सकता।
रियासत का काम यह नहीं कि वह इंतज़ार करे कि सियासी इख़्तिलाफ़ एक दिन बंदूकों, लाशों और जलते हुए घरों में बदल जाए। रियासत का काम इससे पहले हरकत में आना होता है।
मणिपुर में यही नहीं हुआ।
हिंसा के शुरुआती महीनों में ऐसा लगता था जैसे मणिपुर में दो अलग-अलग दुनिया आबाद हैं।
एक वह दुनिया जो सरकारी बयानों में दिखाई देती थी—सिक्योरिटी ऑपरेशन, अमन की कोशिशें, हालात पर नज़र और प्रशासन की सरगर्मियाँ।
और दूसरी वह मणिपुर थी जिसे आम लोग देख रहे थे—राहत कैंप, जले हुए घर, खाली बस्तियाँ, हथियारबंद गुट, बंद रास्ते और ख़ौफ़ज़दा बच्चे।
असली त्रासदी यह थी कि हिंसा ख़त्म नहीं हुई
हिंदुस्तान ने पहले भी फ़िर्कावाराना और नस्ली हिंसा देखी है।
मणिपुर का अलमिया सिर्फ़ यह नहीं था कि वहाँ हिंसा हुई। असली त्रासदी यह थी कि हिंसा ख़त्म नहीं हुई।
शुरुआती कुछ दिनों में कोई भी सरकार हैरत का इज़हार कर सकती है। कुछ हफ़्तों तक प्रशासनिक मुश्किलों का हवाला दिया जा सकता है। लेकिन जब हफ़्ते महीनों में और महीने बरसों में बदल जाएँ, तो मामला सिर्फ़ हालात की पेचीदगी का नहीं रहता।
फिर सवाल हुकूमत की सलाहियत और उसके इरादे का होता है।
फ़रवरी में राष्ट्रपति शासन लागू होना इस बात का इशारा था कि पहले वाला प्रशासनिक ढाँचा हालात पर काबू पाने में नाकाम हो चुका था। बाद में राष्ट्रपति शासन ख़त्म हुआ और नई सरकार बनी। आईनी निज़ाम बहाल हो गया।
लेकिन लोगों का भरोसा बहाल हुआ या नहीं?
यह सवाल कहीं ज़्यादा अहम है।
हुकूमतें बदलना आसान है। लोगों के दिलों से डर निकालना मुश्किल।
काग़ज़ों पर अमन बहाल किया जा सकता है। यादों में नहीं।
इंसान सिर्फ़ आँकड़े नहीं होते
मणिपुर पर बहस करते हुए सबसे आसान काम आबादी के आँकड़े गिनाना है।
मैतेई 53 प्रतिशत। आदिवासी लगभग 40 प्रतिशत।
लेकिन इंसान सिर्फ़ आबादी के आँकड़े नहीं होते।
किसी मुल्क का संविधान इसलिए नहीं बनाया जाता कि बहुसंख्यक जो चाहे, उसे अपने-आप सही मान लिया जाए। और अल्पसंख्यकों के हक़ इसलिए नहीं होते कि बहुसंख्यक उन पर कोई एहसान कर रहे हैं।
हक़, हक़ होते हैं।
उनका फ़ैसला सिर्फ़ आबादी की तादाद से नहीं होना चाहिए।
लेकिन यहाँ एक और सच्चाई भी है।
किसी बड़ी बिरादरी के ख़दशात को सिर्फ़ इसलिए नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि वह तादाद में ज़्यादा है।
मणिपुर के मसले का हल यह नहीं कि एक तरफ़ को सही और दूसरी को ग़लत क़रार दे दिया जाए।
क्योंकि हिंसा के बाद सबसे पहला काम किसी एक कम्युनिटी को जिताना नहीं होता।
सबसे पहला काम यह होता है कि रियासत ख़ुद को दोबारा ग़ैर-जानिबदार साबित करे।
जब किसी नागरिक को यह यक़ीन न रहे कि क़ानून उसे बराबर हिफ़ाज़त देगा, तो पुलिस भी संदिग्ध लगने लगती है। तहक़ीक़ात भी संदिग्ध हो जाती हैं। गिरफ़्तारियाँ भी संदिग्ध। ख़ामोशियाँ भी संदिग्ध।
और फिर रियासत सिर्फ़ अमन नहीं खोती।
वह अपनी साख खोने लगती है।
दिल्ली को जवाब देना होगा
दिल्ली में एक अजीब-सी आदत है।
जो संकट टीवी स्क्रीन से उतर जाए, वह धीरे-धीरे क़ौमी बहस से भी उतरने लगता है।
लेकिन किसी मसले का ख़बरों से ग़ायब हो जाना, उसके ख़त्म हो जाने का सबूत नहीं है।
मणिपुर इसका सबसे बड़ा सबूत है।
306 मौतों के बाद कुछ सवाल पूछे जाने चाहिए।
कौन नाकाम हुआ?
ख़तरे को किसने कम करके आँका?
क्या पहले से कोई चेतावनियाँ मौजूद थीं?
हिंसा को शुरुआत में क्यों नहीं रोका जा सका?
कितने लोग अब भी बेघर हैं?
कितने घर जले?
कितनी इबादतगाहें तबाह हुईं?
कितने हथियार आज भी घूम रहे हैं?
और क़त्ल, आगज़नी और जिन्सी हिंसा के कितने मुल्ज़िम वाक़ई क़ानून के कटघरे तक पहुँचे?
ये सवाल सिर्फ़ सरकार पर तनक़ीद के लिए नहीं हैं।
ये उन ख़ानदानों का हक़ हैं जिन्होंने अपना सब कुछ खो दिया।
और एक सवाल शायद सबसे मुश्किल है:
तीन साल की नफ़रत और ख़ौफ़ के बाद अमन की शक्ल क्या होगी?
यह सवाल किसी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में हल नहीं होगा। न ही कुछ सिक्योरिटी ब्रीफ़िंग्स से।
क्योंकि अमन सिर्फ़ फ़ायरिंग रुक जाने का नाम नहीं है।
अमन वह है जब एक कुकी ख़ानदान और एक मैतेई ख़ानदान—दोनों को यह यक़ीन हो कि एक ही क़ानून उनकी हिफ़ाज़त करेगा।
क्या मणिपुर को भुला दिया गया?
दिल्ली को एक सवाल का जवाब अभी भी देना है:
मणिपुर को इतने लंबे अरसे तक इस हद तक नज़रअंदाज़ क्यों होने दिया गया?
यह सवाल इसलिए तकलीफ़देह है क्योंकि इससे हिंदुस्तानी सियासत की एक तल्ख़ हक़ीक़त सामने आती है।
हर मौत एक जैसी क़ौमी तवज्जो हासिल नहीं करती।
हर हादसे की एक जैसी सियासी अहमियत नहीं होती।
कुछ हादसों पर पूरा मुल्क रुक जाता है।
कुछ अलमिए सिर्फ़ स्थानीय ख़बर बनकर रह जाते हैं।
और कुछ, वक़्त गुज़रने के बाद, मामूल बन जाते हैं।
मणिपुर के साथ शायद सबसे बड़ा ज़ुल्म यही हुआ।
लोगों ने उसके बारे में सुनना छोड़ दिया, जबकि वहाँ के लोग आज भी उसके नतीजों के साथ ज़िंदा हैं।
हिंसा ने सिर्फ़ लोगों को नहीं मारा।
उसने मणिपुर की सामूहिक ज़ेहनियत को बदल दिया।
बस्तियों के बीच फ़ासला बढ़ा। लोगों के बीच डर बढ़ा।
सड़कें दोबारा खुल सकती हैं। बाज़ार दोबारा आबाद हो सकते हैं। हुकूमतें दोबारा बन सकती हैं। फ़ोर्सेज़ वापस जा सकती हैं।
लेकिन जिन लोगों ने अपना घर जलते देखा हो, उनसे यह नहीं कहा जा सकता कि अब सब कुछ मामूल पर आ गया है।
यादें सरकारी नोटिफ़िकेशन से नहीं मिटतीं।
जम्हूरियत का असली इम्तिहान
हिंदुस्तान ख़ुद को दुनिया की सबसे बड़ी जम्हूरियत कहता है।
मणिपुर एक ज़्यादा मुश्किल सवाल पूछता है:
जब किसी नागरिक को रियासत की सबसे ज़्यादा ज़रूरत हो, तो उस वक़्त जम्हूरियत उसके लिए क्या करती है?
जम्हूरियत का इम्तिहान सिर्फ़ चुनावों में नहीं होता।
उसका इम्तिहान उस वक़्त होता है जब लोग ख़ौफ़ज़दा हों, इदारे दबाव में हों और हुकूमत को यह तय करना हो कि सच का सामना करना है या सिर्फ़ संकट को सियासी तौर पर मैनेज करना है।
मणिपुर ऐसा ही एक इम्तिहान है।
और यह मान लेने में कोई फ़ायदा नहीं कि सब कुछ ठीक हो गया है।
अभी बहुत कुछ बाक़ी है
अभी बहुत कुछ बाक़ी है।
306 हलाक और 49 लापता सिर्फ़ एक तनाज़े का हिसाब नहीं हैं।
ये उस ताख़ीर का हिसाब भी हैं जिसने हालात को बिगड़ने दिया।
ये सियासी हिचकिचाहट का हिसाब हैं।
ये प्रशासनिक नाकामी का हिसाब हैं।
और ये उस सवाल का हिसाब हैं कि आख़िर एक रियासत के लोगों को कितनी देर तक जलना पड़ेगा ताकि बाक़ी मुल्क उनकी तरफ़ संजीदगी से देखे।
मणिपुर को अब और वादों की ज़रूरत नहीं।
उसे जवाब चाहिए।
ज़िम्मेदारी तय होनी चाहिए।
इंसाफ़ होना चाहिए—और ऐसा इंसाफ़ जिस पर हर बिरादरी को भरोसा हो।
लापता लोगों के ख़ानदानों को जवाब मिलना चाहिए।
बेघर लोगों को अपने घरों में इज़्ज़त और तहफ़्फ़ुज़ के साथ वापस जाने का हक़ मिलना चाहिए।
और एक ऐसा सियासी हल तलाश करना होगा जिसमें किसी भी बिरादरी से यह न कहा जाए कि हमेशा ख़ौफ़ में रहो और उसे अमन समझ लो।
तब तक ये आँकड़े हमारे सामने रहेंगे।
306 हलाक।
49 लापता।
सरकारी फ़ाइलों में शायद ये सिर्फ़ आँकड़े हों।
लेकिन हक़ीक़त में ये खाली कुर्सियाँ हैं।
माओं का इंतज़ार हैं।
बच्चों के सवाल हैं।
वे फ़ोन कॉल हैं जो कभी वापस नहीं आईं।
वे घर हैं जिनकी राख में शायद अब भी किसी की ज़िंदगी दफ़्न है।
और वे 49 ख़ानदान हैं जो शायद हर दस्तक पर दरवाज़े की तरफ़ देखते होंगे।
दिल्ली ने मरने वालों को गिनना सीख लिया है।
अब उसे यह भी साबित करना होगा कि वह ज़िंदा लोगों को बचाना जानती है।
लेखक की राय से संस्थान का सहमत होना ज़रूरी नहीं है।
लेखक: जमील अहमद मिलनसार, बेंगलुरु
Source: Haqeeqat Times

