मुसलमानों के हक़ और एहतजाज की रणनीति

तहरीकें इजाज़त से नहीं, अज़्म से आगे बढ़ती हैं

एहतजाज के हक़ पर इजाज़त की शर्त, मुस्लिम तंजीमों की रणनीति और क़यादत की ज़िम्मेदारी पर सवाल

 

एहतजाज, एहतजाज होता है। इसके लिए इजाज़त की शर्त नहीं होनी चाहिए। जलसों के लिए इजाज़त का तसव्वुर समझ में आता है, लेकिन जब किसी फैसले, क़ानून या नाइंसाफी के खिलाफ़ अवाम अपने जम्हूरी हक़ के तौर पर आवाज़ बुलंद करना चाहे, तो उसे महज़ इजाज़त-नामे से जोड़ देना एक संजीदा सवाल खड़ा करता है।

यह सवाल मुल्क की मुस्लिम नुमाइंदा तंजीम ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से पूछना ज़रूरी है। बोर्ड ने UCC के खिलाफ़ दिल्ली के जंतर-मंतर पर एहतजाज करने का ऐलान किया था, लेकिन आख़िरी वक़्त में यह कहते हुए एहतजाज मुल्तवी कर दिया गया कि उन्हें इजाज़त नहीं मिली।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की तरफ़ से एहतजाज का ऐलान करके फिर उसे मुल्तवी करने का मामला कोई नया नहीं है। इससे पहले भी बोर्ड ने कई एहतजाजों को मुल्तवी किया है और इसकी वजह यह बताई गई कि उन्हें प्रशासन से इजाज़त नहीं मिली।

ज़रा 1947 से पहले के हिंदुस्तान का तसव्वुर कीजिए। अगर हमारे बुज़ुर्ग जंगे-आज़ादी के दौरान हर एहतजाज और हर तहरीक के लिए अंग्रेज़ सरकार से इजाज़त मांगते रहते, तो शायद आज़ादी की जद्दोजहद उस मुकाम तक नहीं पहुंच पाती और न ही मुल्क आज़ाद होता।

तहरीकें इजाज़त से नहीं, अज़्म से आगे बढ़ती हैं।

आज सूरतेहाल यह है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का एहतजाज बार-बार इजाज़त न मिलने की वजह से मुल्तवी किया जा रहा है। सवाल यह है कि आखिर कब तक?

बार-बार इजाज़त न मिलने को बुनियाद बनाकर एहतजाज मुल्तवी करते रहने से अवाम के बीच यह तास्सुर पैदा हो सकता है कि एक बड़ी नुमाइंदा तंजीम भी अपने बुनियादी एहतजाजी हक़ के इस्तेमाल के लिए प्रशासन की इजाज़त की मोहताज हो गई है।

यह कैफ़ियत उस बच्चे जैसी महसूस होती है, जो रोता रहा और आखिरकार उसे लॉलीपॉप देकर खामोश करा दिया गया।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जिसे मुल्क के मुसलमानों की नुमाइंदा तंजीम कहा जाता है और जिसके पीछे करोड़ों मुसलमानों की हिमायत होने का दावा किया जाता है, उसके सदस्य और ओहदेदार खुद कई तंजीमों से जुड़े हुए हैं। ऐसे में इस तरह का हवाला देना मुनासिब नहीं लगता।

अगर शाहीन बाग़ की मिसाल लें, तो वहां महिलाओं ने पुलिस के दबाव और मुश्किलात के बावजूद एहतजाज जारी रखा और अपनी आवाज़ बुलंद रखी।

इसके बाद हालिया मिसाल दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के एहतजाज की भी दी जा सकती है। इन छात्रों ने अपने मुतालिबात को लेकर एहतजाज किया और दबाव के बावजूद अपने मुतालिबात से पीछे नहीं हटे। उन्होंने अपने मुतालिबात की मंज़ूरी तक एहतजाज जारी रखा।

अफ़सोस की बात यह है कि मुसलमानों की नुमाइंदा तंजीम एहतजाज के लिए इजाज़त मांग रही है। यहां सवाल यह भी है कि अगर एहतजाज के लिए इजाज़त नहीं मिलती, तो क्या संवैधानिक और क़ानूनी दायरे में दूसरे रास्ते नहीं अपनाए जा सकते?

अगर प्रशासन इजाज़त नहीं देता, तो क़ानूनी रास्ते मौजूद हैं। अदालत का दरवाज़ा खटखटाया जा सकता है, इजाज़त न देने के फैसले को क़ानूनी तौर पर चुनौती दी जा सकती है और संवैधानिक व जम्हूरी हक़ूक़ के तहफ़्फ़ुज़ के लिए असरदार रणनीति अपनाई जा सकती है।

लेकिन अगर हर बार जवाब यही हो कि “इजाज़त नहीं मिली, इसलिए एहतजाज मुल्तवी कर दिया गया”, तो फिर अवाम यह सवाल ज़रूर करेगी कि क्या एहतजाज वास्तव में एक हक़ है या इजाज़त मिलने तक सिर्फ़ एक दरख़्वास्त?

मुसलमानों की मुख़्तलिफ़ तंजीमों के सामने भी यही सवाल है। एहतजाज सिर्फ़ ऐलान करने का नाम नहीं, बल्कि अपने मौक़िफ़ और मुतालिबे के लिए संवैधानिक और क़ानूनी दायरे में असरदार जद्दोजहद करने का नाम है।

जम्हूरियत में सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “एहतजाज की इजाज़त मिली या नहीं?”

सवाल यह होना चाहिए कि “अपनी आवाज़ उठाने के हक़ को इस्तेमाल करने के लिए हमने क़ानूनी और जम्हूरी रास्तों में क्या क़दम उठाया?”

अगर ऐसा किया जाता है, तभी मुसलमान अपने हक़ूक़ और अपनी आवाज़ के लिए असरदार तरीके से सामने आ सकते हैं। वरना हमारी क़यादत सिर्फ़ बयानबाज़ी, मज़म्मती बयान और प्रेस कॉन्फ्रेंस तक महदूद रह जाएगी।

ये हालात सिर्फ़ मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के नहीं हैं, बल्कि मुल्क की मुख़्तलिफ़ मिल्ली और सामाजिक तंजीमों के भी हैं। अक्सर इन तंजीमों पर यह इल्ज़ाम लगाया जाता है कि वे हुकूमत या सियासी लीडरों के असर में काम करती हैं।

जब भी मुसलमानों के हक़ूक़ के लिए एहतजाज करने की बात आती है, कुछ लोग कमिश्नर और एसपी दफ़्तर पहुंच जाते हैं और इजाज़त लेने या देने का मुतालिबा करने लगते हैं।

इनमें से कुछ लोग पुलिस के दबाव में आकर एहतजाज के मंसूबे पर पानी फेर देते हैं और लोगों को यह कहकर मनाने की कोशिश करते हैं कि “एसपी साहब ने साथ देने का वादा किया है, लेकिन फिलहाल एहतजाज करने से रोका है।”

मानो मुसलमानों के असली क़ायद पुलिस अफ़सर और सियासतदान हों।

अगर मुस्लिम तंजीमें अब भी इसी तरह आओ-भगत और मसलहत में लगी रहेंगी, तो आने वाले दिनों में शायद उन्हें खाना खाने के लिए भी इजाज़त लेनी पड़े।

Source: Haqeeqat Times