रोजगार के सपने, महंगाई की हकीकत और जनता की बढ़ती बेचैनी

खाली सरकारी पदों से लेकर रोजमर्रा की जरूरी चीजों की बढ़ती कीमतों तक, आम आदमी के आर्थिक भविष्य पर गंभीर सवाल।

आज देश कई समस्याओं से जूझ रहा है। समाज के लगभग सभी वर्ग किसी न किसी परेशानी का सामना कर रहे हैं। आए दिन नई समस्याएं सामने आ रही हैं, जबकि कई पुराने मुद्दों का समाधान अब तक नजर नहीं आ रहा है। आज देश में नौजवानों के बीच सबसे ज्यादा बेचैनी और नाराजगी दिखाई दे रही है।

शिक्षा का क्षेत्र गंभीर समस्याओं से घिरा हुआ है। शिक्षा समाज की बुनियादी जरूरत और बेहतर भविष्य के निर्माण का जरिया है, लेकिन इसके बावजूद शिक्षा के बजट में पर्याप्त बढ़ोतरी नहीं की जा रही है। बल्कि कई मामलों में शिक्षा से जुड़े फंड में कटौती की जा रही है। इस बुनियादी मुद्दे से ध्यान हटाकर सियासत किए जाने की कोशिशें भी दिखाई देती हैं।

विद्यार्थियों को परीक्षाएं देने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि लगातार पेपर लीक होने की घटनाएं सामने आती रहती हैं। परीक्षा देने के बाद भी इस बात का भरोसा नहीं रहता कि परिणाम समय पर आएंगे या नहीं और परिणाम निष्पक्ष तथा बेहतर होंगे या नहीं। यह स्थिति बेहद अफसोसनाक है।

इसी तरह रोजगार का संकट भी लगातार गंभीर होता जा रहा है। देश में बेरोजगार नौजवानों की संख्या और रोजगार हासिल करने की मुश्किलें चिंता का विषय बनी हुई हैं। किसी तरह शिक्षा पूरी करके डिग्री हासिल कर लेने के बावजूद नौकरी की कोई गारंटी नहीं है। सरकारी भर्तियों पर अनिश्चितता बनी हुई है, जबकि प्राइवेट सेक्टर में भी कई जगह नौकरियों में कटौती हो रही है। नई भर्तियां और नियुक्तियां ठप पड़ती दिखाई दे रही हैं।

शिक्षा और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों को लेकर समाज में बेचैनी बढ़ गई है। नौजवानों को इन समस्याओं के खिलाफ विरोध और आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ रहा है।

दूसरी तरफ महंगाई लगातार बढ़ रही है। रोजमर्रा इस्तेमाल की चीजें महंगी होती जा रही हैं। आम आदमी के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना मुश्किल हो गया है। दाल, चावल, आटा, दूध और दवाइयों समेत लगभग हर जरूरी चीज की कीमतें बढ़ रही हैं।

महंगाई का बढ़ता बोझ और बिगड़ता घरेलू बजट

देश में बढ़ती महंगाई ने आम आदमी की जिंदगी पर आर्थिक बोझ और बढ़ा दिया है। जुलाई 2026 के कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, राज्यों के बीच महंगाई की दर में अंतर दर्ज किया गया। लेख में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, तेलंगाना में महंगाई की दर 6.32 प्रतिशत रही, जबकि आंध्र प्रदेश में यह 5.72 प्रतिशत दर्ज की गई। तमिलनाडु और पुडुचेरी में महंगाई की दर 5.44 प्रतिशत बताई गई। कर्नाटक, ओडिशा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में भी महंगाई की दर चार प्रतिशत से अधिक रहने का उल्लेख किया गया है।

राज्यों में महंगाई की दर में इस अंतर का असर स्थानीय स्तर पर आम लोगों की जिंदगी और उनके घरेलू बजट पर पड़ रहा है।

पिछले दस वर्षों के दौरान महंगाई पर काबू पाने के लिए केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल उठते रहे हैं। चुनाव से पहले सत्ताधारी पार्टी ने महंगाई पर नियंत्रण को अपने अहम वादों में शामिल किया था, लेकिन आलोचकों का कहना है कि जमीनी स्तर पर अपेक्षित नतीजे नहीं दिखाई दिए। जरूरी चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी का सिलसिला जारी रहने से आम लोगों की मुश्किलें बढ़ रही हैं।

आर्थिक विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि आने वाले समय में महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है। ऐसे में लोगों को अपनी आमदनी, खर्च और कर्ज की किस्तों की समीक्षा करनी चाहिए।

देश के विदेशी मुद्रा भंडार में कमी और रुपये की कीमत पर पड़ने वाले दबाव को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। आर्थिक हालात को बेहतर बनाने के लिए रुपये को स्थिर रखना महत्वपूर्ण माना जाता है। भारतीय रिजर्व बैंक रुपये को स्थिर रखने के लिए कई कदम उठाता रहा है, लेकिन इन चुनौतियों के बीच आर्थिक दबाव पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं है।

विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में कर्ज महंगे होने और विदेश में पढ़ाई का खर्च बढ़ने की आशंका भी हो सकती है। इसके अलावा जरूरी वस्तुओं, इलेक्ट्रॉनिक्स, कच्चे माल, आयातित सामान और परिवहन की लागत में बढ़ोतरी का असर भी आम जनता पर पड़ सकता है।

यदि खर्च बढ़ने की रफ्तार आमदनी में होने वाली बढ़ोतरी से ज्यादा रही, तो देशभर में परिवारों का घरेलू बजट बिगड़ सकता है। ऐसे हालात में लोगों की खरीदने की क्षमता कमजोर होगी और इसका असर दूसरे कारोबारी क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है।

लेख में दिए गए विवरण के मुताबिक, चालू सप्ताह के दौरान भारत को 6.3 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार में कमी का सामना करना पड़ा। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और रुपये पर दबाव के बीच रिजर्व बैंक के विदेशी मुद्रा भंडार के इस्तेमाल को लेकर भी चर्चा की गई है।

हालांकि, विदेशी मुद्रा भंडार के आंकड़ों और उनमें आई कमी के बारे में संबंधित आधिकारिक आंकड़ों से पुष्टि करना जरूरी है। आम लोगों, खासकर मध्यम वर्ग को अपनी आमदनी और खर्च पर ध्यान देने तथा कर्ज की अदायगी की बेहतर योजना बनाने की जरूरत है। अगर कोई व्यक्ति होम लोन चुका रहा है, तो उसे ब्याज दर और मासिक किस्त में संभावित बदलाव पर नजर रखनी चाहिए।

सब्जियों की बढ़ती कीमतों ने रसोई का बजट बिगाड़ा

देशभर में महंगाई का दबाव आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रहा है। अल नीनो के संभावित प्रभाव, बेमौसम बारिश, मानसून की अनियमितता और सप्लाई चेन में रुकावटों के कारण फसलों की पैदावार प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। इसका असर सब्जियों की उपलब्धता और कीमतों पर भी पड़ सकता है।

सब्जियों के आसमान छूते दामों ने मध्यम और कम आमदनी वाले परिवारों की रसोई का बजट बिगाड़ दिया है। लेख में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, प्याज की कीमतों में 68.27 प्रतिशत और आलू की कीमतों में 11.05 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

जुलाई में कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स पर आधारित खाद्य महंगाई में बढ़ोतरी का जिक्र करते हुए कहा गया है कि गरीब और मध्यम वर्ग के परिवार अपनी आमदनी का बड़ा हिस्सा रोजमर्रा के भोजन और सब्जियों पर खर्च करने के लिए मजबूर हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक ने महंगाई को चार प्रतिशत के लक्ष्य के आसपास रखने का उद्देश्य निर्धारित किया है। लेकिन खाद्य पदार्थों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से आर्थिक स्थिरता और आम लोगों की खरीदने की क्षमता पर दबाव पड़ता है।

आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर खाद्य महंगाई पर जल्द काबू नहीं पाया गया, तो आम जनता की क्रय शक्ति और कमजोर हो सकती है। इसका नकारात्मक असर दूसरे कारोबारी क्षेत्रों पर भी पड़ने की आशंका है।

कांग्रेस का मोदी सरकार पर निशाना

कांग्रेस ने केंद्र की मोदी सरकार पर देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने और निवेशकों का भरोसा कमजोर करने का आरोप लगाया है। पार्टी का कहना है कि कमजोर होते रुपये और विदेशी निवेशकों की बिकवाली पर काबू पाने में सरकार नाकाम रही है, जिससे शेयर बाजार में आम निवेशकों को नुकसान उठाना पड़ रहा है।

कांग्रेस प्रवक्ता शक्ति सिंह गोहिल ने मीडिया से बातचीत में कहा कि मोदी सरकार के दौर में देश का हर वर्ग परेशान है। उनके मुताबिक, नौजवान, किसान और छोटे कारोबारी आर्थिक मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि कर्ज से परेशान किसान और नौजवान आत्महत्या कर रहे हैं तथा लाखों सरकारी पद खाली पड़े हैं, लेकिन भर्तियां नहीं हो रही हैं।

गोहिल ने कहा कि जहां सरकारी भर्ती की प्रक्रिया शुरू होती है, वहां कई बार पेपर लीक होने की घटनाएं सामने आती हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इससे योग्य उम्मीदवारों के साथ अन्याय होता है।

1991 के आर्थिक संकट का जिक्र करते हुए गोहिल ने कहा कि उस समय देश की अर्थव्यवस्था गंभीर दबाव में थी और भारत को अपना सोना विदेशों में गिरवी रखना पड़ा था। उस समय डॉ. मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे। उन्होंने आर्थिक सुधारों की शुरुआत की और विदेशी संस्थागत निवेशकों के लिए भारतीय बाजार में निवेश के रास्ते खोले।

गोहिल के मुताबिक, उस दौर में विदेशी निवेश के जरिए भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली थी, जबकि आज विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से अपना पैसा निकाल रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसा क्यों हो रहा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस पर जवाब क्यों नहीं दे रहे हैं।

उन्होंने शेयर बाजार के प्रदर्शन का हवाला देते हुए दावा किया कि जब सरकार बाजार में तेजी की बात कर रही थी, तब सेंसेक्स 85,836 के स्तर पर था, जबकि 29 सितंबर 2026 को यह लगभग 72,500 पर आ गया। गोहिल ने कहा कि इससे निवेशकों की पूंजी का मूल्य घटा और आम निवेशकों को नुकसान उठाना पड़ा।

उन्होंने यह भी कहा कि डॉ. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहने के दौरान वैश्विक आर्थिक मंदी के बावजूद भारतीय शेयर बाजार में तेजी दर्ज की गई थी। उनके दावे के मुताबिक, यूपीए सरकार के दौर में सेंसेक्स में लगभग 398 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी।

यहां ध्यान देना जरूरी है कि ये आंकड़े और निष्कर्ष कांग्रेस नेता के दावे हैं। शेयर बाजार के प्रदर्शन का आकलन करते समय संबंधित तारीखों, सूचकांक के स्तर और निवेश की अवधि की स्वतंत्र पुष्टि भी जरूरी है।

केंद्र सरकार के 8.23 लाख से ज्यादा पद खाली

एक ऐसे समय में, जब बेरोजगारी और सरकारी नौकरी के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा देशभर में चिंता का विषय बनी हुई है, एक आरटीआई के जवाब से केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में कर्मचारियों की भारी कमी का खुलासा हुआ है।

आरटीआई के जवाब के मुताबिक, केंद्र सरकार के सिविल प्रतिष्ठानों में 8.23 लाख से ज्यादा पद खाली थे। इन आंकड़ों में बैंकों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों यानी पीएसयू की रिक्तियां शामिल नहीं हैं।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, रेलवे, रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय, कैबिनेट सचिवालय और प्रधानमंत्री कार्यालय समेत कई विभागों में स्वीकृत पदों और वास्तविक कर्मचारियों की संख्या के बीच बड़ा अंतर था।

आंकड़ों के मुताबिक, 1 मार्च 2024 को केंद्र सरकार के सिविल प्रतिष्ठानों में कुल 39,23,212 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 30,99,556 कर्मचारी कार्यरत थे। इस तरह कुल 8,23,656 पद खाली थे, जो स्वीकृत सिविल कर्मचारियों की संख्या का लगभग 21 प्रतिशत था।

दूसरे शब्दों में कहें तो केंद्र सरकार के हर पांच स्वीकृत पदों में से लगभग एक पद खाली था।

ये जानकारियां चंद्रशेखर गौर की ओर से दाखिल आरटीआई आवेदन के जवाब में सामने आईं। गौर ने कहा कि बढ़ती बेरोजगारी के दौर में ये आंकड़े चिंताजनक हैं। सरकारी नौकरियां युवाओं के लिए रोजगार का महत्वपूर्ण माध्यम हैं और सरकार को खाली पदों को प्राथमिकता के आधार पर भरने के लिए मिशन मोड में काम करना चाहिए। इससे नौजवानों को रोजगार मिलने के साथ सरकारी विभागों की कार्यक्षमता में भी सुधार हो सकता है।

आरटीआई के आंकड़ों के अनुसार, राष्ट्रपति सचिवालय में 803 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 516 कर्मचारी कार्यरत थे। इस तरह वहां 287 पद खाली थे, जो कुल स्वीकृत पदों का 35.74 प्रतिशत था।

इससे यह भी सामने आया कि राष्ट्रपति सचिवालय और प्रधानमंत्री कार्यालय जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों में भी स्वीकृत कर्मचारियों की संख्या और वास्तविक उपलब्ध कर्मचारियों के बीच अंतर मौजूद था।

19 अगस्त को दिए गए जवाब में व्यय विभाग की पे रिसर्च यूनिट ने बताया कि नियमित केंद्रीय सरकारी सिविल कर्मचारियों की समूहवार और स्थिति के अनुसार उपलब्ध नवीनतम अनुमानित संख्या 1 मार्च 2024 तक की थी। जवाब में मंत्रालय और विभाग के अनुसार स्वीकृत पदों तथा उन पर कार्यरत कर्मचारियों की संख्या भी दी गई थी।

सबसे बड़ा अंतर रक्षा मंत्रालय के सिविल प्रतिष्ठानों में दिखाई दिया। यहां 5,56,248 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 3,14,005 कर्मचारी कार्यरत थे। इस तरह 2,42,243 पद खाली थे, जो स्वीकृत सिविल कर्मचारियों की संख्या का लगभग 43.5 प्रतिशत था।

यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ये आंकड़े रक्षा मंत्रालय के सिविल कर्मचारियों से संबंधित हैं। इन्हें थल सेना, नौसेना या वायुसेना में खाली सैन्य पदों के आंकड़ों के साथ नहीं मिलाया जाना चाहिए।

8.7 करोड़ नौजवान शिक्षा, रोजगार और प्रशिक्षण से बाहर?

कांग्रेस महासचिव और सांसद रणदीप सिंह सुरजेवाला ने भी देश में रोजगार की स्थिति को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने नीति आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि भाजपा सरकार के दौरान लाखों सरकारी पद खाली पड़े हैं, जबकि करोड़ों नौजवान रोजगार, शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण से वंचित हैं।

सुरजेवाला ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी पोस्ट में इसे भाजपा सरकार के कार्यकाल की एक गंभीर समस्या बताया। उनके अनुसार, देश में लाखों सरकारी नौकरियां खाली हैं और 8.7 करोड़ नौजवान ऐसे हैं, जो न तो पढ़ाई कर रहे हैं, न नौकरी में हैं और न ही किसी प्रशिक्षण कार्यक्रम का हिस्सा हैं।

उन्होंने कहा कि ये आंकड़े विपक्ष की ओर से तैयार नहीं किए गए, बल्कि सरकार से संबंधित संस्था नीति आयोग की रिपोर्ट में सामने आए हैं।

सुरजेवाला के मुताबिक, 15 से 29 वर्ष की उम्र के 8.7 करोड़ नौजवान शिक्षा, रोजगार और प्रशिक्षण से बाहर हैं। उन्होंने इसके लिए आर्थिक मुश्किलों, महंगी ट्यूशन फीस और बढ़ती महंगाई को भी जिम्मेदार ठहराया।

उन्होंने यह दावा भी किया कि देश में केवल 8.25 प्रतिशत ग्रेजुएट्स ही ऐसे काम कर रहे हैं, जो उनकी शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप हैं। उनका कहना है कि बड़ी रकम खर्च करके डिग्री हासिल करने के बावजूद नौजवानों को अपनी योग्यता के अनुसार नौकरी नहीं मिल रही है।

सुरजेवाला ने स्किल इंडिया और कौशल विकास से जुड़ी सरकारी योजनाओं पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार बड़े कार्यक्रमों और प्रचार अभियानों के जरिए अपनी उपलब्धियां गिनाती है, लेकिन जमीनी स्तर पर कई नौजवान महंगे प्रशिक्षण कोर्स की फीस तक नहीं भर पाते।

उन्होंने कहा कि यदि देश की इतनी बड़ी युवा आबादी शिक्षा, रोजगार और कौशल प्रशिक्षण से दूर रहती है, तो विकसित भारत का सपना केवल नारा बनकर रह जाने का खतरा है।

युवाओं को नारों से नहीं, अवसरों से मतलब है

सुरजेवाला ने कहा कि देश के युवाओं को खोखले नारों के बजाय स्थायी रोजगार, गुणवत्तापूर्ण और सस्ती शिक्षा तथा कौशल प्रशिक्षण के बेहतर अवसरों की जरूरत है।

उन्होंने अपनी पोस्ट के साथ दो अखबारी खबरों के स्क्रीनशॉट भी साझा किए। इनमें से एक खबर में नीति आयोग की रिपोर्ट के हवाले से 8.7 करोड़ युवाओं के शिक्षा, रोजगार और प्रशिक्षण से बाहर होने तथा केवल 8.25 प्रतिशत ग्रेजुएट्स को उनकी योग्यता के अनुरूप रोजगार मिलने का उल्लेख था।

दूसरी खबर में केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में खाली पदों की संख्या बढ़ने की बात कही गई थी। इसके अनुसार, सरकारी रिक्तियां एक दशक में 4.2 लाख से बढ़कर लगभग 8.24 लाख हो गई थीं।

इन आंकड़ों के आधार पर सुरजेवाला ने केंद्र सरकार की रोजगार नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि देश के युवाओं को बड़े-बड़े दावों और नारों के बजाय वास्तविक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की जरूरत है।

हालांकि, इन आंकड़ों की सटीकता और उनके संदर्भ को समझने के लिए संबंधित सरकारी रिपोर्टों तथा आधिकारिक दस्तावेजों की जांच आवश्यक है।

सवाल वही है: अच्छे दिन जनता के कब आएंगे?

देश में महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता का मुद्दा लगातार गंभीर होता जा रहा है। एक तरफ नौजवान डिग्रियां हासिल करने के बाद नौकरी की तलाश में भटक रहे हैं, तो दूसरी तरफ सरकारी विभागों में लाखों पद खाली होने की जानकारी सामने आती है।

दूसरी ओर, आम परिवारों के लिए दाल, चावल, आटा, दूध, सब्जियां और दवाइयां खरीदना भी आर्थिक चुनौती बनता जा रहा है। मध्यम वर्ग अपनी आमदनी और खर्च के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है, जबकि कम आय वाले परिवारों के लिए बुनियादी जरूरतों को पूरा करना और मुश्किल होता जा रहा है।

ऐसे हालात में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह रोजगार के अवसर बढ़ाने, सरकारी रिक्तियों को भरने, शिक्षा को सस्ता और गुणवत्तापूर्ण बनाने तथा जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण के लिए प्रभावी कदम उठाए।

आखिर सवाल यह है कि देश में महंगाई और बेरोजगारी के मामले में अच्छे दिन तो आ गए, लेकिन आम जनता के अच्छे दिन आखिर कब आएंगे?

लेखक: सरफराज अहमद कासमी

संपादकीय नोट: यह लेख मूल उर्दू आलेख का हिंदी-उर्दू मिश्रित समाचार-शैली में रूपांतरण है। इसमें शामिल आर्थिक आंकड़ों, सरकारी रिपोर्टों और राजनीतिक नेताओं के दावों को प्रकाशन से पहले संबंधित आधिकारिक स्रोतों से सत्यापित करना उचित होगा।