नाम हटाने की वजह दर्ज नहीं, तय तारीख के बाद भी हुई कार्रवाई; ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट में खुलासा
कर्नाटक में वोटर लिस्ट की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान कई अहम सवाल सामने आए हैं। अंग्रेजी अखबार ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में वोटर लिस्ट से नाम हटाने के लिए चुनावी अधिकारियों ने खुद कम से कम 61,059 फॉर्म नंबर-7 दाखिल किए, लेकिन इन आवेदनों में किसी भी वोटर का नाम हटाने की वजह दर्ज नहीं की गई।
वोटर रजिस्ट्रेशन रूल्स, 1960 के मुताबिक, किसी भी वोटर का नाम वोटर लिस्ट से हटाने के लिए फॉर्म में इसकी वजह बताना जरूरी है।
रिपोर्ट के मुताबिक, इन आवेदनों में इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (ERO) और असिस्टेंट इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (AERO) के नाम आपत्तिकर्ता के तौर पर दर्ज हैं।
अधिकारियों का कहना है कि जब वोटरों से संपर्क नहीं हो पाया, उनकी जानकारी का मिलान नहीं हुआ या रिकॉर्ड में तार्किक गड़बड़ियां पाई गईं, तो नोटिस की सुनवाई के दौरान संबंधित वोटरों तक पहुंचना मुश्किल हो गया। इसके बाद सिस्टम ने अधिकारियों के डिजिटल सिग्नेचर के साथ आवेदन ऑटोमैटिक तरीके से तैयार कर दिए।
इन आवेदनों के जरिए संबंधित वोटरों के नाम हटाने की कार्रवाई की गई। इस मामले ने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और कानूनी नियमों के पालन पर सवाल खड़े कर दिए हैं। नियमों के मुताबिक, जरूरी जानकारी के बिना या तय प्रक्रिया का पालन किए बगैर दाखिल किए गए आवेदनों को खारिज किया जाना चाहिए।
किन वोटरों के नाम हटाने के लिए भरे गए फॉर्म?
अधिकारियों के मुताबिक, उन्हें ऐसे वोटरों के नाम हटाने के लिए फॉर्म नंबर-7 दाखिल करने की हिदायत दी गई थी, जो दूसरी जगह शिफ्ट हो चुके हैं, जिनके नाम एक से ज्यादा जगह दर्ज हैं, जो नाबालिग हैं, जिनका इंतकाल हो चुका है या जो भारतीय नागरिक नहीं हैं।
हालांकि, आवेदन ऑटोमैटिक तरीके से तैयार होने की वजह से नाम हटाने की वजह वाला कॉलम खाली रह गया। इससे प्रभावित वोटरों के लिए यह जानना मुश्किल हो गया कि उनका नाम हटाने की सिफारिश किस बुनियाद पर की गई।
रिपोर्ट में बताया गया है कि गैरहाजिर, स्थायी रूप से दूसरी जगह शिफ्ट हो चुके, डबल एंट्री वाले और मरहूम वोटरों समेत दूसरी श्रेणियों के वोटरों की जांच SIR के शुरुआती मरहले में ही की जा चुकी थी।
इसी प्रक्रिया के दौरान कर्नाटक की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से एक करोड़ सात लाख से ज्यादा नाम हटाए गए थे। इनमें बड़ी तादाद उन वोटरों की थी, जिन्हें स्थायी रूप से दूसरी जगह शिफ्ट होने की बुनियाद पर लिस्ट से बाहर किया गया। इसके बाद गैरहाजिर वोटरों का नंबर था।
आखिरी तारीख के बाद फॉर्म दाखिल करने में अचानक तेजी
‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के मुताबिक, 23 सितंबर 2026 को दावे और एतराज दाखिल करने की आखिरी तारीख खत्म होने तक चुनावी अधिकारियों ने सिर्फ 192 फॉर्म नंबर-7 दाखिल किए थे।
लेकिन 24 सितंबर से 22 अक्टूबर के बीच अधिकारियों की तरफ से 60,800 से ज्यादा आवेदन दाखिल किए गए।
आखिरी दिनों में इन आवेदनों की तादाद में अचानक बढ़ोतरी दर्ज की गई।
- 17 अक्टूबर: 11,132 आवेदन
- 19 अक्टूबर: 11,760 आवेदन
- 21 अक्टूबर: 10,314 आवेदन
- 22 अक्टूबर: 10,105 आवेदन
गौरतलब है कि 22 अक्टूबर दावों और एतराज के निपटारे की आखिरी तारीख थी।
रिपोर्ट के मुताबिक, ‘द हिंदू’ ने चुनाव आयोग के पोर्टल पर कुछ आवेदनों में दर्ज वोटर आईडी कार्ड नंबरों की जांच की। इस जांच में सामने आया कि 23 सितंबर के बाद दाखिल किए गए कुछ आवेदनों से जुड़े वोटरों के नाम भी वोटर लिस्ट से हटाए जा चुके थे।
यह मामला वोटर रजिस्ट्रेशन रूल्स, 1960 के नियम 17 के लिहाज से भी अहम है। इस नियम के तहत तय समयसीमा के बाद या निर्धारित प्रक्रिया के मुताबिक दाखिल नहीं किए गए दावों और एतराज को खारिज किया जाना चाहिए।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुछ मामलों में नाम हटाने से पहले जरूरी नोटिस जारी किए जाने या कार्रवाई की बुनियाद के बारे में साफ जानकारी मौजूद नहीं थी, क्योंकि संबंधित आवेदनों में वजह का कॉलम खाली था।
बेंगलुरु दक्षिण जिले में अफसरों ने दाखिल किए सबसे ज्यादा आवेदन
बेंगलुरु के बृहद बेंगलुरु महानगर पालिका (BBMP) दक्षिण जिले में चुनावी अधिकारियों की तरफ से दाखिल आवेदनों की तादाद आम वोटरों या तीसरे पक्ष की तरफ से दाखिल आवेदनों से ज्यादा रही।
इस जिले में कुल 17,491 आवेदन मिले, जिनमें से 10,374 आवेदन खुद चुनावी अधिकारियों ने दाखिल किए।
बोम्मनहल्ली विधानसभा क्षेत्र में भी ऐसा ही रुझान सामने आया। यहां कुल 5,757 आवेदनों में से 4,095 आवेदन चुनावी अधिकारियों की तरफ से दाखिल किए गए।
रिपोर्ट के मुताबिक, कर्नाटक के कम से कम 26 विधानसभा क्षेत्रों में इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स और असिस्टेंट ऑफिसर्स की तरफ से दाखिल आवेदनों की तादाद वोटरों या दूसरे लोगों की तरफ से दाखिल आवेदनों से ज्यादा रही।
कर्नाटक की फाइनल वोटर लिस्ट 27 अक्टूबर को प्रकाशित होने वाली है। तय व्यवस्था के मुताबिक, 23 सितंबर तक मिले दावों और एतराज पर ही फाइनल लिस्ट तैयार करते वक्त विचार किया जाना था। इसके बाद दाखिल आवेदनों को SIR के बाद प्रकाशित होने वाली सप्लीमेंट्री लिस्ट में शामिल किया जाना था।
हालांकि, ‘द हिंदू’ की नमूना जांच में सामने आया कि तय समयसीमा के बाद दाखिल कुछ आवेदनों से जुड़े वोटरों के नाम भी पहले ही लिस्ट से हटाए जा चुके थे।
आवेदनों के सरकारी आंकड़ों में भी अंतर
रिपोर्ट में चुनाव आयोग की वेबसाइट और कर्नाटक के चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर (CEO) के दफ्तर के आंकड़ों में भी फर्क बताया गया है।
चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर के दफ्तर के मुताबिक, 24 सितंबर से 22 अक्टूबर के बीच राज्य में फॉर्म नंबर-7 के कुल 1,70,442 आवेदन मिले।
वहीं, चुनाव आयोग की वेबसाइट पर मौजूद फॉर्म नंबर-10 के कुल रिकॉर्ड में सिर्फ 1,56,634 आवेदन दर्ज थे।
इस तरह दोनों आंकड़ों के बीच 13,808 आवेदनों का फर्क सामने आया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, आंकड़ों में इस अंतर और नाम हटाने के तरीके से जुड़े सवालों की वजह से यह साफ नहीं है कि नियमों की खिलाफवर्जी करते हुए कितने वोटरों के नाम लिस्ट से हटाए गए।
चुनावी अधिकारियों की तरफ से बड़ी तादाद में आवेदन दाखिल किए जाने, उनमें नाम हटाने की वजह दर्ज नहीं होने और तय समयसीमा के बाद भी नाम हटाए जाने के खुलासे ने कर्नाटक में वोटर लिस्ट की जांच और संशोधन की प्रक्रिया में शفافियत, जवाबदेही और कानूनी नियमों के पालन को लेकर अहम सवाल खड़े कर दिए हैं।
Source: Haqeeqat Times

