फासीवादी विचार हर देश में किसी न किसी रूप में मौजूद रहते हैं। लेकिन वे तभी ताकतवर बनते हैं जब उन्हें बड़ी पूंजी (कॉर्पोरेट कंपनियों) और मीडिया का समर्थन मिलता है। आज पूरी दुनिया में फासीवादी ताकतें फिर से उभर रही हैं — जैसे अमेरिका में ट्रंप, इटली में मेलोनी, तुर्की में एर्दुआन और भारत में नरेंद्र मोदी।
भारत में हिंदुत्ववादी ताकतों का उभार सिर्फ धार्मिक या सांस्कृतिक कारणों से नहीं हुआ। यह असल में आर्थिक संकट और पूंजीवादी व्यवस्था की नाकामी का नतीजा है।
हिंदुत्व की जड़ें और सीमाएँ
अक्सर कहा जाता है कि हिंदुत्व का उभार आरएसएस की शिक्षा संस्थाओं, बाबरी मस्जिद आंदोलन या सांप्रदायिक राजनीति से जुड़ा है। ये बातें सही हैं, लेकिन पूरी सच्चाई नहीं बतातीं। असली कारण यह है कि इन ताकतों को बड़ी पूंजी और अमीर वर्ग का समर्थन मिला।
फासीवाद और बड़ी पूंजी का रिश्ता
फासीवादी आंदोलन असल में बड़ी कंपनियों और पूंजीपतियों के हितों की रक्षा के लिए काम करते हैं। जब अर्थव्यवस्था में संकट आता है और बेरोजगारी बढ़ती है, तब जनता का ध्यान असली समस्याओं से हटाने के लिए धर्म, जाति और राष्ट्रवाद के नाम पर नफरत फैलायी जाती है।
1930 के दशक में जब दुनिया में मंदी आई थी, तब यूरोप में फासीवाद बढ़ा। आज भी ऐसा ही हो रहा है — 2008 के आर्थिक संकट के बाद से दुनिया भर में ऐसे आंदोलन बढ़े हैं।
भारत में पूंजी और हिंदुत्व का गठजोड़
आरएसएस भले ही सौ साल पुराना संगठन है, लेकिन बीजेपी को असली ताकत 2014 में तब मिली जब देश की बड़ी पूंजी ने उसे खुला समर्थन दिया। नरेंद्र मोदी इस गठजोड़ का चेहरा बने। गुजरात में हुए इन्वेस्टर्स समिट में उद्योगपतियों ने पहली बार उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए सुझाया था।
फासीवाद के खिलाफ क्या करना होगा
फासीवादी ताकतों को हराने के लिए सिर्फ चुनाव या राजनीतिक एकता काफी नहीं है। जब तक नवउदारवादी आर्थिक व्यवस्था (जिसमें अमीर और अमीर होते हैं, गरीब और गरीब) को बदला नहीं जाएगा, तब तक फासीवाद बार-बार लौट सकता है।
इसलिए जरूरत है कि लोकतांत्रिक और प्रगतिशील ताकतें मिलकर एक नया आर्थिक और सामाजिक रास्ता पेश करें, जो सबके लिए न्याय और समानता पर आधारित हो।
निष्कर्ष:
फासीवाद कोई पुराना विचार नहीं, बल्कि आधुनिक पूंजीवाद की उपज है। यह अमीर वर्ग की ताकत बचाने का तरीका है, जो समाज में धर्म और जाति के नाम पर नफरत फैलाता है।
भारत में इससे लड़ाई तभी जीती जा सकती है, जब राजनीति के साथ-साथ आर्थिक न्याय की लड़ाई भी साथ लड़ी जाए।
लेखक: प्रोफेसर (एमेरिटस), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
(यह लेख NewsClick पेज से लिया गया है)







