भारतीय मुसलमानों के खिलाफ ज़हर उगलना

हमारे प्यारे वतन भारत में मुसलमानों को “ग़ैर” और हिंदू “दुश्मन” बताने की साज़िशें लगातार हिंदूवाद के समर्थकों की ओर से की जाती रही हैं। असल में, हिंदू-मुस्लिम विवाद को समय-समय पर भड़काने में स्वार्थी तत्व हमेशा सक्रिय रहे हैं। संघ परिवार और भाजपा के नेता अक्सर ऐसे मौक़े की तलाश में रहते हैं कि किसी न किसी बहाने से मुसलमानों की दिलआज़ारी की जाए या उनके ख़िलाफ़ उकसाने वाले बयान दिए जाएं।

मोदी सरकार के मंत्री गिरिराज सिंह, जो कई बार मुसलमानों के ख़िलाफ़ भड़काऊ बयान दे चुके हैं, ने हाल ही में बिहार विधानसभा चुनाव की एक रैली में कहा कि “मुसलमान नमक हराम हैं” और उनके वोट की कोई ज़रूरत नहीं। उन्होंने दावा किया कि सरकार सबके लिए समान विकास योजनाएँ लागू करती है, लेकिन मुसलमान कभी भाजपा को वोट नहीं देते। गिरिराज सिंह के इस बयान का जेडीयू के प्रवक्ता नीरज कुमार ने भी समर्थन किया।

इस बयान की देशभर में निंदा हुई। राजद प्रवक्ता मृतेन्जय तिवारी ने कहा कि भाजपा और सांप्रदायिक ताक़तें हर बार “हिंदू-मुस्लिम” मुद्दे उछालकर बेरोज़गारी, शिक्षा, महंगाई और स्वास्थ्य जैसी असली समस्याओं से जनता का ध्यान भटकाती हैं। सांसद पप्पू यादव ने गिरिराज सिंह पर पलटवार करते हुए कहा कि जो अंग्रेज़ों के साथ थे और देश से ग़द्दारी की, वही असली “नमक हराम” हैं।

भाजपा और संघ परिवार के कई मंत्री खुलेआम मुसलमानों के ख़िलाफ़ भड़काऊ बातें करते हैं, मगर प्रधानमंत्री मोदी या पार्टी अध्यक्ष नड्डा इनमें से किसी पर कार्रवाई नहीं करते। उल्टा, जो नेता संघ के छिपे एजेंडे को आगे बढ़ाते हैं, वही पार्टी में सराहे जाते हैं।

हाल ही में दिल्ली में छठ पूजा के दौरान विश्व हिंदू परिषद ने “जहाद मुक्त दिल्ली” और “सनातन प्रतिष्ठा” नाम से एक नई मुहिम चलाई। इसके तहत केवल “हिंदू व्यापारियों” से पूजा का सामान ख़रीदने की अपील की गई। दुकानों पर “सनातन प्रतिष्ठा” स्टिकर लगाए गए ताकि लोग मुस्लिम दुकानों से सामान न खरीदें। यही काम यूपी में 2025 की कांवड़ यात्रा के दौरान भी हुआ था।

सुप्रीम कोर्ट कई बार “घृणास्पद भाषणों” पर रोक लगाने का आदेश दे चुका है, लेकिन नफ़रत भरे बयान लगातार दिए जा रहे हैं — कभी “लव जिहाद” के नाम पर, कभी गोमांस, कभी अज़ान, या कपड़ों, दाढ़ी-टोपी पर। आज हालत यह है कि कई शहरों में मुसलमानों को किराये पर मकान या दुकान नहीं दी जाती और उनके साथ कारोबार न करने की बातें खुलकर कही जाती हैं।

ऐसा लगता है कि भाजपा और संघ परिवार के कुछ लोग इस दौड़ में हैं कि कौन मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़्यादा ज़हर उगले और अपने नेताओं की नज़र में ज़्यादा वफ़ादार साबित हो। एक तरफ़ खुलेआम नफ़रत फैलाने का सिलसिला जारी है, दूसरी तरफ़ सरकार और जिम्मेदार लोग चुप्पी साधे हुए हैं — यही अब राजनीति का रोज़मर्रा का हिस्सा बन गया है।

लेखक: मोहम्मद आज़म शाहिद

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Source: Haqeeqat Time ( Translate in hindi)