बेलगाम, 30 अक्टूबर
बेलगाम शहर में इस समय राज्योत्सव की तैयारियाँ जोरों पर हैं। सड़कों और चौकों को सजाया जा रहा है, जगह-जगह लाल और पीले झंडे लगाए गए हैं। लेकिन इसी बीच महाराष्ट्र एकीकरण समिति (एमईएस) की तरफ से ‘काला दिन’ मनाने की बात ने माहौल को तनावपूर्ण बना दिया है।
हाल ही में कन्नड़ रक्षण वेदिके के नेता नारायण गौड़ा ने बयान दिया था कि अगर एमईएस के लोग राज्योत्सव में गड़बड़ी करेंगे तो उन पर हमला किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई जेल भी जाता है तो उसकी ज़िम्मेदारी वे खुद लेंगे। इस बयान के बाद एमईएस के शुभम शेलके ने नारायण गौड़ा के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी।
इस बयानबाज़ी के बाद शहर में हल्का तनाव देखा जा रहा है। पुलिस ने डीजे और लेज़र शो पर रोक लगाई है और कानून तोड़ने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की बात कही है।
बेलगाम का पुराना विवाद
बेलगाम में हर साल राज्योत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। लेकिन यह शहर मराठी और कन्नड़ विवाद के लिए भी जाना जाता है। यह विवाद आज से नहीं बल्कि बहुत पुराना है।
18वीं सदी में जब पेशवा मराठा शासन था, तब बेलगाम का इलाका दक्षिणी मराठा देश कहलाता था। यहाँ ज्यादातर लोग कन्नड़ बोलते थे, लेकिन मराठा शासन के कारण मराठी प्रभाव बढ़ा। अंग्रेज़ों के समय में बेलगाम बॉम्बे प्रेसीडेंसी का हिस्सा था।
आजादी के बाद बेलगाम बॉम्बे राज्य में रहा। लेकिन 1956 में राज्यों का पुनर्गठन हुआ और भाषाओं के आधार पर सीमाएं तय की गईं। बेलगाम को कन्नड़-बहुल इलाका मानकर कर्नाटक (तब मैसूर राज्य) में शामिल किया गया।
महाराष्ट्र ने इसका विरोध किया और कहा कि बेलगाम में मराठी लोग ज़्यादा हैं, इसलिए यह महाराष्ट्र में होना चाहिए। इसी मुद्दे को लेकर दोनों राज्यों में तनाव शुरू हुआ।
महाजन आयोग और कानूनी लड़ाई
1966 में महाजन आयोग बनाया गया। आयोग ने बेलगाम को कर्नाटक में ही रखने की सिफारिश की, लेकिन कुछ गाँव महाराष्ट्र को देने की बात कही। महाराष्ट्र ने यह रिपोर्ट मानने से इनकार कर दिया। मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया और आज तक वहीं लंबित है।
एमईएस की भूमिका
1948 में बनी महाराष्ट्र एकीकरण समिति (एमईएस) बेलगाम को महाराष्ट्र में मिलाने की मांग करती रही है। उनका नारा “बेलगाव महाराष्ट्र झालाच पाहिजे” (बेलगाम महाराष्ट्र में मिलना ही चाहिए) काफी प्रसिद्ध हुआ।
1980 और 1990 के दशक में बेलगाम में कई बार मराठी-कन्नड़ झगड़े हुए। 2005-06 में एमईएस ने फिर से विलय का प्रस्ताव पास किया, जिसके बाद कर्नाटक सरकार ने बेलगाम सिटी कॉरपोरेशन को भंग कर दिया।
आज की स्थिति
अब एमईएस का प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा। पहले उनके सात विधायक हुआ करते थे, लेकिन अब एक या दो पार्षद जीतना भी मुश्किल हो गया है। मराठी नेताओं के आपसी मतभेद और भाजपा की राजनीति ने भी इस आंदोलन को कमजोर कर दिया है।
अब नई पीढ़ी के लिए मराठी-कन्नड़ विवाद ज्यादा मायने नहीं रखता। लोग अब भाषा के बजाय धर्म और राजनीति के मुद्दों पर बंट रहे हैं।
नतीजा
आज बेलगाम में राज्योत्सव की रौनक है, लेकिन ‘काला दिन’ की आवाज़ें अब भी सुनाई देती हैं। यह विवाद अब कमजोर पड़ चुका है, लेकिन इतिहास की किताबों में यह हमेशा दर्ज रहेगा कि कैसे एक शहर दो भाषाओं और दो संस्कृतियों के बीच पहचान की लड़ाई का प्रतीक बन गया।
लेखक: इक़बाल अहमद जकाती (Iqbal Ahmed Jakati)







