तीन साल से जारी जंग, हज़ारों मौतें, लाखों बेघर और भुखमरी का बढ़ता संकट
गाज़ा: 7 अक्टूबर 2023 को हमास के इज़राइल पर हमले के बाद शुरू हुई जंग ने ग़ज़ा को तबाही के ऐसे दौर में पहुँचा दिया, जहाँ ज़िंदगी गुज़ारना भी एक बड़ी चुनौती बन गया है। बार-बार सीज़फ़ायर यानी जंगबंदी के ऐलान और अमन की अपीलों के बावजूद ग़ज़ा में हिंसा, बेघर होने और इंसानी संकट की परेशानियाँ बरक़रार हैं। आम नागरिकों की मौत, खाने-पीने की चीज़ों की कमी, अस्पतालों पर बढ़ता दबाव और बुनियादी सहूलतों की कमी ने पूरी दुनिया के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—आख़िर इंसानियत कहाँ है?
मूल लेख में दिए गए आँकड़ों के मुताबिक, पिछले तीन वर्षों में 74,400 से ज़्यादा फ़िलिस्तीनियों की मौत और 1 लाख 75 हज़ार 600 से अधिक लोगों के ज़ख़्मी होने का दावा किया गया है। इन आँकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि ज़रूरी है। जंग के दौरान आम नागरिकों की हिफ़ाज़त, अंतरराष्ट्रीय क़ानून की पाबंदी और राहत सामग्री की बेरोकटोक सप्लाई को लेकर लगातार चिंता जताई जाती रही है।
मलबे में तब्दील हुआ ग़ज़ा, लाखों लोग बेघर
लगातार फ़ौजी हमलों ने ग़ज़ा के बड़े हिस्से को तबाह कर दिया है। मकान, अस्पताल और दूसरी बुनियादी इमारतें भारी नुक़सान का सामना कर चुकी हैं। बड़ी तादाद में फ़िलिस्तीनी अपने घरों को छोड़कर अस्थायी कैंपों और राहत शिविरों में रहने पर मजबूर हैं।
बेघर परिवारों के सामने महफ़ूज़ छत, साफ़ पीने का पानी, खाना और इलाज जैसी बुनियादी ज़रूरतें पूरी करना मुश्किल हो गया है। सर्दियों का मौसम नज़दीक आने के साथ खुले मैदानों और अस्थायी तंबुओं में रहने वाले लोगों की परेशानियाँ और बढ़ने का ख़तरा है। बच्चों, बुज़ुर्गों, बीमारों और ज़ख़्मियों के लिए हालात ख़ासतौर पर चिंताजनक हैं।
ग़ज़ा में भुखमरी का संकट गहराया
ग़ज़ा में खाने-पीने की चीज़ों, ईंधन, साफ़ पानी और दवाइयों की सप्लाई को लेकर गंभीर मुश्किलें सामने आती रही हैं। राहत सामग्री पहुँचाने में रुकावटों और उसके वितरण में आने वाली परेशानियों ने आम लोगों की तकलीफ़ों को और बढ़ा दिया है। खाने की कमी से कुपोषण और भुखमरी का ख़तरा भी लगातार बढ़ रहा है।
संयुक्त राष्ट्र की राहत एजेंसियों और दूसरी इंसानी मदद करने वाली संस्थाओं के सामने ज़रूरतमंद लोगों तक पर्याप्त मदद पहुँचाने की बड़ी चुनौती है। वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम (WFP) समेत कई संस्थाएँ खाद्य संकट से निपटने की कोशिश कर रही हैं। वहीं, अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में दवाइयों, मेडिकल उपकरणों और दूसरी ज़रूरी सुविधाओं की कमी मरीज़ों के लिए मुश्किलें पैदा कर रही है।
राहत संगठनों के सामने भी बड़ी मुश्किलें
संयुक्त राष्ट्र की फ़िलिस्तीनी शरणार्थियों के लिए राहत एजेंसी UNRWA और अंतरराष्ट्रीय मेडिकल संगठन डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स समेत कई संस्थाएँ ग़ज़ा में राहत और चिकित्सा सेवाएँ पहुँचाने में जुटी हुई हैं।
लेकिन राहत सामग्री की सप्लाई, कर्मचारियों की आवाजाही और मेडिकल मदद पहुँचाने में आने वाली रुकावटें इन कोशिशों को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे हालात में अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से यह माँग लगातार अहम होती जा रही है कि ग़ज़ा तक इंसानी मदद सुरक्षित और बिना किसी रुकावट के पहुँचाई जाए।
ग़ज़ा की मौजूदा सूरत-ए-हाल ने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका और जंग रोकने की वैश्विक कोशिशों पर भी सवाल खड़े किए हैं। सिर्फ़ सीज़फ़ायर की अपील करना काफ़ी नहीं है, बल्कि आम नागरिकों की हिफ़ाज़त और अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून पर अमल को यक़ीनी बनाना भी ज़रूरी है।
नेतन्याहू की नीतियाँ और इज़राइल की सियासत
इज़राइल की अंदरूनी सियासत का असर फ़िलिस्तीन और पूरे मध्य-पूर्व के भविष्य पर पड़ सकता है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार को हमास के हमले के दौरान सुरक्षा व्यवस्था में नाकामी और जंग की रणनीति को लेकर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है। इज़राइल के अंदर भी सरकार की नीतियों और जंग के भविष्य को लेकर अलग-अलग राय सामने आती रही हैं।
फ़िलिस्तीनी रियासत का क़याम, ग़ज़ा का भविष्य और ईरान के साथ इज़राइल का तनाव इस वक़्त क्षेत्रीय सियासत के अहम मुद्दे हैं। इन मामलों में होने वाले फ़ैसले सिर्फ़ इज़राइल और फ़िलिस्तीन ही नहीं, बल्कि पूरे मध्य-पूर्व के अमन और स्थिरता पर असर डाल सकते हैं।
मुस्लिम देशों की भूमिका पर भी सवाल
ग़ज़ा में जारी इंसानी संकट के बीच मुस्लिम देशों की भूमिका और उनके सामूहिक प्रयासों को लेकर भी बहस जारी है। फ़िलिस्तीन के समर्थन में बयान और कूटनीतिक अपीलें तो सामने आती रही हैं, लेकिन जंगबंदी, राहत सामग्री की सप्लाई और स्थायी अमन के लिए और प्रभावी क़दम उठाने की माँग भी की जा रही है।
ग़ज़ा के लोगों को इस वक़्त खाना, पानी, महफ़ूज़ पनाहगाह और इलाज जैसी बुनियादी सहूलतों की सख़्त ज़रूरत है। ऐसे वक़्त में अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की पहली ज़िम्मेदारी आम नागरिकों की जान बचाना, राहत सामग्री की सप्लाई को यक़ीनी बनाना और हिंसा रोकने के लिए प्रभावी कोशिशें करना होनी चाहिए।
ग़ज़ा की तबाही महज़ एक क्षेत्रीय जंग का मामला नहीं है, बल्कि यह इंसानी हुक़ूक़, अंतरराष्ट्रीय क़ानून और पूरी दुनिया की ज़िम्मेदारी से जुड़ा सवाल है। जब लाखों लोग बेघर होने, भूख और ख़ौफ़ के साये में ज़िंदगी गुज़ारने पर मजबूर हों, तो दुनिया की ख़ामोशी और भी ज़्यादा तकलीफ़देह महसूस होती है।
ग़ज़ा की राख से उठती चीख़ें आज भी दुनिया से सवाल कर रही हैं—जब इंसानियत ख़ुद संकट में हो, तो दुनिया का ज़मीर कब जागेगा?
लेखक: मोहम्मद आज़म शाहिद, बेंगलुरु
Source: Haqeeqat Times

