अमेरिकी सैन्य हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत के बाद भारत सरकार की प्रतिक्रिया ने संप्रभुता, नागरिकों की सुरक्षा, भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी और विदेश नीति की स्वतंत्रता को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. आलोचकों का कहना है कि किसी भी देश की असली संप्रभुता इस बात से तय होती है कि वह अपने नागरिकों के खिलाफ हुई कार्रवाई पर कितनी दृढ़ता से आवाज उठाता है, चाहे जिम्मेदार पक्ष कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो.

 

पिछले एक सप्ताह के दौरान अमेरिकी सेना ने ओमान की खाड़ी में तीन वाणिज्यिक जहाज़ों पर हमले किए, जिनमें तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई. इन हमलों का निशाना पलाऊ के झंडे वाले तेल टैंकर एमटी सेटेबेलो समेत अन्य जहाज़ बने. स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह संभवतः पहला दर्ज मामला है, जब अमेरिकी सशस्त्र बलों की कार्रवाई में सीधे तौर पर भारतीय नागरिकों की जान गई हो.

भारत के विदेश मंत्रालय (एमईए) ने इस मामले पर अमेरिकी दूतावास के प्रभारी अधिकारी (Chargé d’Affaires) को दो बार तलब किया. मंत्रालय ने अपने औपचारिक संदेश में अमेरिकी पक्ष से कहा कि इन हमलों के कारण ‘तीन भारतीय नागरिकों की दुखद और टाली जा सकने वाली मौतें हो चुकी हैं.’

नागरिक मालवाहक जहाज़ों के खिलाफ सैन्य बल के इस्तेमाल पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए भारत ने कहा कि ऐसे कदम अस्वीकार्य हैं और एक संवेदनशील क्षेत्र में, जहां पहले से ही हालात चुनौतीपूर्ण हैं, अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार की सुरक्षा, स्थिरता और निर्बाध संचालन को कमजोर करते हैं.

हालांकि, भारत की ओर से की गई इन कूटनीतिक आपत्तियों और अनुरोधों का अब तक अमेरिकी पक्ष पर कोई स्पष्ट असर दिखाई नहीं दिया है.

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 12 जून को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से बातचीत की. जयशंकर ने एक्स पर इसकी जानकारी देते हुए लिखा, ‘आज शाम अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से बात हुई. मैंने ओमान की खाड़ी में अमेरिकी नौसेना के हमलों के खिलाफ भारत का कड़ा विरोध दोहराया, जिनमें तीन भारतीय नाविकों की मौत हुई. वाणिज्यिक जहाज़ों के खिलाफ इस तरह की घातक कार्रवाई को किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता.’

अमेरिकी विदेश विभाग ने भी इस बातचीत की पुष्टि की. हालांकि, रुबियो ने इन हमलों का बचाव करते हुए कहा कि अमेरिकी सैन्य बल ‘समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने और क्षेत्र में मौजूद शत्रुतापूर्ण खतरों का मुकाबला करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाना जारी रखेंगे.’

उन्होंने यह भी कहा कि ‘अमेरिकी हितों और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार की सुरक्षा की मांग है कि क्षेत्र की स्थिरता को खतरे में डालने वाली ताकतों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई की जाए.’

गौरतलब है कि रुबियो ने इस बातचीत में भारतीय नागरिकों की मौत पर कोई माफी नहीं मांगी, न ही इन मौतों पर खेद व्यक्त किया. उन्होंने सैन्य कार्रवाई के नियमों में किसी बदलाव का कोई संकेत नहीं दिया और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने का कोई आश्वासन भी नहीं दिया.

जैसे-जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 17 जून को फ्रांस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात की तैयारी कर रहे हैं, वैसे-वैसे इन भारतीय नागरिकों की मौतों और उसके बाद नई दिल्ली तथा वॉशिंगटन की प्रतिक्रियाओं ने कई गंभीर और अहम सवाल खड़े कर दिए हैं।

इन घटनाओं ने न केवल भारत-अमेरिका संबंधों की संवेदनशीलता को उजागर किया है, बल्कि यह सवाल भी पैदा किया है कि भारतीय नागरिकों की मौत पर भारत सरकार की कूटनीतिक प्रतिक्रिया कितनी प्रभावी रही, अमेरिका ने इस मामले को किस तरह लिया, और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए दोनों देशों के बीच क्या कदम उठाए जाएंगे।

ट्रंप प्रशासन की मोदी सरकार के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैया

रूबियो और जयशंकर के बीच हुई बातचीत ने अमेरिका के साथ संबंधों में भारत की वास्तविक प्रभाव-क्षमता (लेवरेज) की सीमाओं को उजागर कर दिया. रूबियो के सख्त रुख से साफ था कि अमेरिकी प्रशासन ने नागरिक हताहतों को लेकर नई दिल्ली की चिंताओं की तुलना में अपने सैन्य अभियानों की प्राथमिकताओं को अधिक महत्व दिया. नतीजतन, मोदी सरकार के कूटनीतिक प्रयासों को कोई ठोस रियायत नहीं मिल सकी.

एक ओर जयशंकर ने अपेक्षाकृत संयमित विरोध दर्ज कराया, वहीं दूसरी ओर रूबियो ने घातक सैन्य कार्रवाई जारी रखने के अमेरिकी फैसले का बिना किसी नरमी के बचाव किया. यह अंतर साफ दिखाता है कि वॉशिंगटन ने भारत की आपत्तियों को कितनी गंभीरता से लिया. भारत ने उच्च स्तर पर विरोध तो दर्ज कराया, लेकिन अपने नागरिकों की मौत के लिए न तो किसी जवाबदेही की मांग मनवा सका और न ही अमेरिकी सेना की कार्रवाई पर किसी प्रकार का संयम सुनिश्चित करा पाया.

यह पूरा घटनाक्रम उन हमलों के प्रति मोदी सरकार की व्यापक प्रतिक्रिया के अनुरूप ही दिखाई देता है, एक ऐसी प्रतिक्रिया, जो औपचारिक कूटनीतिक प्रक्रियाओं तक सीमित रही, लेकिन जिसमें राजनीतिक दबाव या प्रभाव का अभाव था. इससे यह भी स्पष्ट होता है कि ट्रंप प्रशासन के सामने हल्के विरोध और चुनिंदा सार्वजनिक बयानों का बहुत कम असर पड़ता है.

एक बार फिर नई दिल्ली की ‘रणनीतिक साझेदारी’ की भाषा और वास्तविकता के बीच का अंतर सामने आया है. यह घटना बताती है कि भारत के पास अपने कथित रणनीतिक साझेदार पर प्रभाव डालने के पर्याप्त साधन नहीं हैं. साथ ही, इससे यह भी उजागर होता है कि मोदी सरकार इस मुद्दे को सार्वजनिक रूप से अधिक आक्रामक ढंग से उठाने या ऐसे साझेदार से कोई राजनीतिक कीमत वसूलने को तैयार नहीं दिखी, जिसकी सैन्य कार्रवाई में सीधे भारतीय नागरिकों की जान गई.

यह भारत-अमेरिका ‘रणनीतिक साझेदारी’ के भीतर मौजूद संरचनात्मक असमानता को उजागर करता है. वर्षों से नई दिल्ली वॉशिंगटन के साथ अपने संबंधों को बराबरी, पारस्परिक सम्मान और साझा समुद्री सुरक्षा उद्देश्यों पर आधारित साझेदारी के रूप में प्रस्तुत करती रही है. लेकिन जब अमेरिका समुद्री नाकेबंदी जैसी कार्रवाई थोपता है, तब भारतीय नागरिकों के जीवन का महत्व गौण हो जाता है और भारत की प्रतिक्रिया महज़ औपचारिक विरोध तथा असरहीन राजनयिक तलबियों तक सीमित रह जाती है.

यह घटनाक्रम दिखाता है कि जिस रिश्ते को अक्सर ‘रणनीतिक साझेदारी’ कहा जाता है, उसमें शक्ति-संतुलन वास्तव में कितना असमान है. भारतीय नागरिकों की मौत के बावजूद न तो अमेरिका पर कोई ठोस जवाबदेही तय हो सकी और न ही उसकी सैन्य कार्रवाइयों पर कोई अंकुश लगा. इससे यह सवाल और गहरा होता है कि आखिर इस साझेदारी में भारत की वास्तविक प्रभाव-क्षमता कितनी है.

मोदी सरकार की भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफलता

घरेलू राजनीति के स्तर पर सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि मोदी सरकार अपने नागरिकों के जीवन की रक्षा करने के उस बुनियादी संवैधानिक दायित्व को निभाने में विफल रही है, जिसकी अपेक्षा किसी भी सरकार से की जाती है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अतीत में ऑपरेशन गंगा और ऑपरेशन कावेरी जैसे बड़े निकासी अभियानों को अक्सर इस राजनीतिक छवि के निर्माण के लिए इस्तेमाल किया है कि वह ऐसे शक्तिशाली नेता हैं, जो दुनिया के किसी भी कोने में फंसे भारतीय को सुरक्षित वापस ला सकते हैं. (यह अलग बात है कि पूर्ववर्ती सरकारों ने भी बड़े पैमाने पर निकासी अभियान चलाए थे, लेकिन उन्हें इस तरह राजनीतिक प्रचार का विषय नहीं बनाया गया था.)

वर्तमान में 500 से अधिक भारतीय नाविक फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी में संचालित जहाजों पर काम कर रहे हैं. ऐसे में एमटी सेटेबेलो पर अमेरिकी सैन्य हमले की खुलकर निंदा करने या इसके लिए अमेरिका का नाम लेने से परहेज़ करके मोदी सरकार ने इस दावे की विश्वसनीयता को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया है.

इस हमले में मुख्य अभियंता पतनाला सुरेश, इंजन फिटर शिवानंद चौरसिया और डेक कैडेट आदित्य शर्मा की मौत हो गई थी. इसके बावजूद सरकार की प्रतिक्रिया सीमित और सतर्क बनी रही.

इससे एक चिंताजनक संदेश जाता है कि भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और उनके लिए न्याय की मांग हर मामले में समान रूप से नहीं की जाती. बल्कि यह इस बात पर निर्भर करती है कि घटना के लिए जिम्मेदार पक्ष कौन है और उसका भारत के साथ भू-राजनीतिक संबंध क्या है.

दूसरे शब्दों में, यह ऐसी स्थिति की ओर संकेत करता है जहां भारतीय नागरिकों के जीवन की रक्षा या उनके लिए जवाबदेही की मांग एक समान सिद्धांत पर नहीं, बल्कि कूटनीतिक और रणनीतिक समीकरणों के आधार पर तय होती दिखाई देती है.

बड़ी शक्तियों के सामने हिंदुत्ववादी शासन की झिझक

वास्तविक संप्रभुता का अर्थ यह है कि कोई देश अपने नागरिकों के खिलाफ हुई शत्रुतापूर्ण कार्रवाई का विरोध करने में सक्षम हो, चाहे वह कार्रवाई किसी भी ताकतवर देश ने क्यों न की हो. लेकिन इस मामले पर प्रधानमंत्री मोदी की पूरी चुप्पी यह दिखाती है कि वॉशिंगटन के साथ रणनीतिक निकटता ने भारतीय विदेश नीति को किस हद तक सीमित कर दिया है.

जब अपेक्षाकृत छोटे देश भारत की कूटनीतिक सीमाओं को चुनौती देते हैं, तब हिंदुत्ववादी शासन अक्सर आक्रामक राष्ट्रवाद, अतिरंजित संप्रभुता और त्वरित प्रतिशोध की भाषा का सहारा लेता है. लेकिन जब कोई पश्चिमी महाशक्ति सीधे भारतीय नागरिकों की जान ले लेती है, तो वही राजनीतिक तंत्र बेहद सावधानी से चुनी गई नौकरशाही भाषा और विदेश मंत्रालय की औपचारिक ‘चिंता व्यक्त करने वाली’ प्रतिक्रियाओं तक सिमट जाता है.

अप्रैल में वॉशिंगटन में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में भाजपा नेता राम माधव ने भी अप्रत्यक्ष रूप से इस धारणा को बल दिया था कि मौजूदा शासन अमेरिका के प्रति अत्यधिक अनुकूल और निर्भर रुख अपनाता है.

यह चयनात्मक नरमी उस मजबूत और अडिग नेतृत्व की छवि को कमजोर करती है, जिसे मोदी पिछले एक दशक से देश के भीतर निर्मित करने की कोशिश करते रहे हैं.

ऐसी झिझक केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है. वर्ष 2020 में गलवान घाटी में चीन के साथ हुई झड़प में 20 भारतीय सैनिकों की मौत के बाद भी भारत सरकार ने न तो चीनी राजनयिक को तलब किया था और न ही कोई औपचारिक विरोध-पत्र (डिमार्श) जारी किया था.

इतना ही नहीं, घटना के चार दिन बाद प्रधानमंत्री मोदी ने यह बयान दिया था कि कोई भी चीनी सैनिक भारतीय सीमा में घुसा नहीं था.

हाल के महीनों में केंद्र सरकार ने बॉलीवुड को गलवान संघर्ष पर आधारित फिल्में बनाने से भी रोका है और स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि किसी भी परिस्थिति में चीन को भारत के प्रतिद्वंद्वी के रूप में चित्रित न किया जाए.

अमेरिकी पक्ष के तर्कों को दोहराते हुए राजनीतिक जवाबदेही से बचने की कोशिश

विदेश मंत्रालय और बंदरगाह, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्रालय लगातार इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि एमटी मैरिवेक्स, एमटी सेटेबेलो और एमटी जलवीर भारतीय जहाज़ नहीं थे, बल्कि पलाऊ या गिनी-बिसाऊ जैसे देशों के झंडे तले संचालित विदेशी-पंजीकृत पोत थे. सरकार अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून की इन तकनीकी बारीकियों का सहारा लेकर घरेलू राजनीतिक जवाबदेही से बचने की कोशिश कर रही है.

जबकि वास्तविकता यह है कि वैश्विक मर्चेंट नेवी को नाविक उपलब्ध कराने वाले देशों में भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत है. ऐसे में भारतीय नाविकों की मौत पर सरकार की चुप्पी ने देश के समुद्री श्रमिक संगठनों में गहरा आक्रोश पैदा किया है. फॉरवर्ड सीमेन यूनियन ऑफ इंडिया जैसे संगठनों ने भी इस पर कड़ी नाराज़गी जताई है.

इस तरह की नौकरशाही ढाल एक खतरनाक मिसाल कायम करती है. इससे विदेशों में काम कर रहे लाखों भारतीय श्रमिकों, खासकर ब्लू-कॉलर और अनुबंधित कर्मचारियों, को यह संदेश जाता है कि यदि वे किसी गैर-भारतीय कंपनी या विदेशी झंडे वाले जहाज़ पर काम करते हुए शोषण, खतरे या हिंसा का शिकार होते हैं, तो उन्हें भारतीय राज्य का मजबूत राजनीतिक या कानूनी समर्थन शायद ही मिल सके.

साथ ही यह संदेश अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों और सैन्य शक्तियों तक भी पहुंचता है कि गैर-भारतीय जहाज़ों पर काम कर रहे भारतीय नागरिकों के साथ कुछ भी होने पर नई दिल्ली की ओर से कड़ा प्रतिरोध या जवाबदेही तय कराने की कोशिश नहीं की जाएगी.

नतीजतन, मारे गए भारतीय नाविकों के परिवारों को न्याय पाने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून और जटिल कानूनी प्रक्रियाओं का सामना लगभग अकेले करना पड़ता है. ऐसी स्थिति में वे अपने ही देश के संप्रभु और कूटनीतिक समर्थन से वंचित रह जाते हैं.

क़ानून के शासन और समुद्री मार्गों पर निर्बाध आवाजाही के दावों पर सवाल

व्यावसायिक जहाज़ों के खिलाफ घातक सैन्य बल का इस्तेमाल करते हुए एकतरफा समुद्री नाकेबंदी लागू करके अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों को प्रभावी रूप से एक सैन्य हथियार में बदल दिया है.

भारत जैसे देश के लिए, जिसकी ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार काफी हद तक खुले समुद्री मार्गों पर निर्भर है, यह एक चिंताजनक मिसाल है. इससे यह स्थिति पैदा होती है कि कोई महाशक्ति अपने स्तर पर तय कर सकती है कि अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में कौन-सा वाणिज्यिक जहाज़ वैध है और कौन निशाना बनाए जाने योग्य. इससे वैश्विक समुद्री व्यवस्था नियमों और कानूनों पर आधारित ढांचे से हटकर ताकत के खुले प्रदर्शन और ‘गनबोट डिप्लोमेसी’ के दौर की ओर बढ़ती दिखाई देती है.

कई वर्षों से अमेरिका, भारत और उनके क्वाड साझेदार – जापान तथा ऑस्ट्रेलिया – हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी बढ़ती नौसैनिक मौजूदगी को ‘समुद्री मार्गों पर निर्बाध आवाजाही’ की रक्षा के नाम पर उचित ठहराते रहे हैं.

लेकिन ओमान की खाड़ी के निकट अमेरिकी हमलों ने इसी तर्क को उलट कर रख दिया है. अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों के अहम संकरे बिंदुओं (चोक पॉइंट्स) में से एक माने जाने वाले ओमान की खाड़ी में चल रहे व्यापारी जहाज़ों पर मिसाइल हमले करके अमेरिका वही काम कर रहा है, जिसके लिए वह अक्सर चीन जैसे अपने प्रतिद्वंद्वियों की आलोचना करता रहा है.

एमटी मैरिवेक्स, एमटी सेटेबेलो और एमटी जलवीर पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का असर केवल तत्काल कूटनीतिक विफलता या राजनीतिक समर्पण तक सीमित नहीं है. यह घटनाक्रम कहीं व्यापक और संरचनात्मक सवाल खड़े करता है.

इन हमलों और उन पर नई दिल्ली की प्रतिक्रिया के प्रभाव भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों से कहीं आगे तक जाते हैं और प्रधानमंत्री मोदी के शासनकाल में भारतीय शासन व्यवस्था, विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई गहरे प्रश्नों को उजागर करते हैं.

Source: The Wire