जब पासपोर्ट ही काफ़ी नहीं, तो असली हिंदुस्तानी होने का पैमाना आख़िर क्या है?
कभी-कभी सरकार की कोई आधिकारिक सफ़ाई सिर्फ़ एक प्रशासनिक बयान नहीं होती, बल्कि वह रियासत और उसके नागरिकों के रिश्ते पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर देती है। हाल ही में जब सरकार की तरफ़ से यह कहा गया कि पासपोर्ट भारतीय नागरिकता (Citizenship) का अंतिम और निर्णायक सबूत नहीं, बल्कि एक ट्रैवल डॉक्यूमेंट है, तो कानूनी हलकों में यह शायद नई बात न हो, लेकिन आम लोगों के बीच इस बयान ने गहरी बेचैनी पैदा कर दी।
एक आम हिंदुस्तानी के लिए पासपोर्ट सिर्फ़ कुछ पन्नों की सरकारी किताब नहीं होता। यह उसके लिए उसके वतन की तरफ़ से मिली पहचान की सबसे मज़बूत दस्तावेज़ होती है। इसे हासिल करने के लिए वह कई सरकारी दफ़्तरों के चक्कर लगाता है, पहचान और पते के सबूत जमा करता है, पुलिस वेरिफिकेशन से गुजरता है और कई स्तर की जांच के बाद उसके हाथ में पासपोर्ट आता है। दुनिया के लगभग हर देश में यही पासपोर्ट उसकी भारतीय पहचान के तौर पर स्वीकार किया जाता है।
ऐसे में अगर वही सरकार यह कहे कि पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है, तो सवाल सिर्फ़ कानून का नहीं रह जाता, बल्कि लोगों के भरोसे का बन जाता है।
सरकार के पास अपने कानूनी तर्क हो सकते हैं, अदालतों के फैसलों का हवाला हो सकता है और कानून की अलग-अलग व्याख्याएं भी हो सकती हैं। लेकिन लोकतंत्र सिर्फ़ कानून की किताबों से नहीं चलता, बल्कि नागरिकों के भरोसे से चलता है। अगर सरकार एक व्यक्ति की पहचान की पुष्टि करके उसे पासपोर्ट जारी करे और फिर यह भी कहे कि इससे उसकी नागरिकता साबित नहीं होती, तो आम नागरिक के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आख़िर वह अपनी भारतीय नागरिकता किस आधार पर साबित करे?
यह सवाल किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों का है। वह किसान जो पीढ़ियों से अपनी ज़मीन पर खेती कर रहा है, वह मज़दूर जिसने शहरों को खड़ा किया, वह छात्र जो विदेश में पढ़ते समय अपने पासपोर्ट को अपनी पहचान मानता है और वह बुज़ुर्ग जिसने आज़ादी के बाद का भारत अपनी आंखों से देखा—सभी के मन में यही सवाल उठता है कि अगर पासपोर्ट भी काफ़ी नहीं, तो फिर काफ़ी क्या है?
पिछले कुछ वर्षों में NRC, CAA, आधार, वोटर आईडी और अन्य दस्तावेज़ों को लेकर चली बहसों ने पहले ही नागरिकता को लेकर असमंजस का माहौल बना दिया है। ऐसे में हर नई सरकारी सफ़ाई आम लोगों के मन में और अधिक भ्रम पैदा करती है।
भारत की सामाजिक हक़ीक़त भी इस मुद्दे को और पेचीदा बनाती है। करोड़ों लोग ऐसे हैं जिनके पास पूरा पारिवारिक रिकॉर्ड नहीं है। लाखों लोगों का जन्म उस दौर में हुआ जब गांवों में जन्म पंजीकरण की व्यवस्था कमज़ोर थी। कई परिवार बाढ़, दंगों, गरीबी या पलायन के दौरान अपने महत्वपूर्ण दस्तावेज़ खो चुके हैं। अगर नागरिकता का आधार सिर्फ़ कागज़ी दस्तावेज़ बन जाए, तो सबसे पहले यही तबका सबसे ज़्यादा परेशान होगा।
एक लोकतांत्रिक देश में सरकार की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ नागरिकों की पहचान की जांच करना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षा और भरोसे का एहसास दिलाना भी है। लोकतंत्र की खूबसूरती इस बात में नहीं कि नागरिक हर समय अपनी वफ़ादारी और पहचान साबित करता फिरे, बल्कि इस बात में है कि सरकार अपने नागरिकों पर भरोसा करे और उन्हें बराबरी का हिस्सा माने।
इतिहास गवाह है कि देश तब कमज़ोर नहीं होते जब उनके संसाधन कम हो जाते हैं, बल्कि तब कमज़ोर होते हैं जब उनके नागरिक सरकार पर भरोसा खो देते हैं। भरोसा किसी सरकारी सर्कुलर या अदालत के फैसले से नहीं बनता, बल्कि वर्षों की नीतियों और व्यवहार से बनता है।
वतन सिर्फ़ कागज़ों का नाम नहीं है। एक किसान की मिट्टी से मोहब्बत, एक सैनिक की कुर्बानी, एक मज़दूर की मेहनत, एक शिक्षक की सेवा और एक शायर के ख़्वाब भी उसकी पहचान का हिस्सा हैं। नागरिकता सिर्फ़ कानूनी दर्जा नहीं, बल्कि एक जज़्बाती, तहज़ीबी और ऐतिहासिक रिश्ता भी है।
आज ज़रूरत इस बात की है कि सरकार सिर्फ़ कानूनी सफ़ाइयों तक सीमित न रहे, बल्कि साफ़ और भरोसा पैदा करने वाला संदेश दे। लोगों को यक़ीन दिलाया जाए कि उनके संवैधानिक अधिकार और उनकी पहचान किसी शक़ के घेरे में नहीं हैं। सरकार नागरिकों से हर बार सबूत मांगने वाली संस्था नहीं, बल्कि उनके अधिकारों की हिफ़ाज़त करने वाली संस्था होनी चाहिए।
क्योंकि आख़िरकार यह बहस पासपोर्ट की नहीं, भरोसे की है। सवाल सिर्फ़ एक दस्तावेज़ का नहीं, बल्कि उस यक़ीन का है जो हर नागरिक अपने वतन पर करता है। अगर सरकार की जारी की गई सबसे अहम दस्तावेज़ भी लोगों में भरोसा पैदा न कर सके, तो समस्या दस्तावेज़ों की नहीं, बल्कि सरकारी विश्वसनीयता की बन जाती है।
वतन सिर्फ़ एक ज़मीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक एहसास, एक रिश्ता और एक यक़ीन है। और जिस दिन कोई नागरिक अपने ही देश में अपने वजूद का सबूत ढूंढने लगे, उस दिन सरकार को कानून की धाराओं से ज़्यादा अपने ज़मीर की आवाज़ सुननी चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी दस्तावेज़ पासपोर्ट नहीं, बल्कि जनता का भरोसा होता है। और जब भरोसा डगमगा जाए, तो कोई मुहर, कोई दस्तख़त और कोई सरकारी कागज़ उस खालीपन को भर नहीं सकता।
लेखक: जमी़ल अहमद मिलनसार
Source: Haqeeqat Times

