दो मुकदमे, दो मापदंड — कानून की आंखों पर पट्टी है या पर्दा?
बड़ी जम्हूरियतों की असली ताकत उनकी पार्लियामेंट की इमारतों, ऊंची अदालतों या ताकतवर हुकूमतों में नहीं होती। उनकी असली ताकत उस यक़ीन में होती है कि एक आम नागरिक यह महसूस करे कि कानून उसके नाम, मज़हब और पहचान से बेनियाज़ होकर उसके साथ इंसाफ करेगा। जब यह भरोसा कमज़ोर पड़ने लगे, तब संविधान की इबारतें अपनी जगह मौजूद रहती हैं, मगर उसकी रूह बेचैन हो जाती है।
हिंदुस्तान का संविधान अपने नागरिकों को मज़हब के आधार पर नहीं बांटता। उसके नज़दीक हर शख्स पहले एक नागरिक है, उसके बाद कुछ और। इसी वजह से कानून के सामने बराबरी को सिर्फ़ एक कानूनी शब्द नहीं, बल्कि जम्हूरी ज़िंदगी की बुनियादी शर्त माना गया है। यह उसूल सिर्फ अदालतों के फैसलों में नहीं, बल्कि एफआईआर दर्ज करने, धाराओं के चुनाव, गिरफ़्तारी, तफ्तीश, ज़मानत और सरकारी रवैये के हर मरहले में दिखाई देना चाहिए।
हाल ही में गंगा नदी से जुड़े दो अलग-अलग मामलों ने इसी बुनियादी उसूल पर सवाल खड़े किए हैं। दोनों मामलों में इल्ज़ाम था कि गंगा की पवित्रता से जुड़ी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची। दोनों मामलों में जनता की प्रतिक्रिया सामने आई। दोनों में कानून ने कार्रवाई भी की। लेकिन समाज के एक तबके को यह महसूस हुआ कि कानूनी कार्रवाई की सख्ती, लगाई गई धाराओं और ज़मानत की प्रक्रिया में साफ़ फर्क दिखाई देता है।
यह लेख किसी आरोपी को मुजरिम ठहराने या किसी दूसरे को बेगुनाह साबित करने के लिए नहीं है। यह फैसला सिर्फ अदालत का अधिकार है। लेकिन एक जम्हूरी समाज में यह सवाल उठाना हर नागरिक का हक़ है कि अगर दो मामलों की प्रकृति एक जैसी महसूस होती है, तो क्या उन पर कानून का रवैया भी एक जैसा नहीं होना चाहिए?
कानून का एहतराम सिर्फ इसलिए नहीं किया जाता कि उसके पास ताकत है, बल्कि इसलिए भी किया जाता है कि वह गैर-जानिबदार दिखाई देता है। अगर लोगों को यह महसूस होने लगे कि कानून की सख्ती या नरमी जुर्म की प्रकृति से ज़्यादा आरोपी की पहचान के हिसाब से बदलती है, तो नुकसान सिर्फ एक मुकदमे का नहीं होता, बल्कि उन तमाम संस्थाओं का होता है जिन पर निष्पक्षता की जिम्मेदारी है।
यह भी सही है कि हर मुकदमे के तथ्य अलग हो सकते हैं। अदालतें सबूत, वीडियो, गवाह, हालात और कानूनी पहलुओं को देखकर फैसला करती हैं। इसलिए हर फर्क को भेदभाव नहीं कहा जा सकता। लेकिन जब फर्क साफ दिखाई दे और उसकी उचित कानूनी वजह लोगों के सामने न आए, तो सवाल उठना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। जम्हूरियत सवालों से कमज़ोर नहीं होती, बल्कि सवालों को दबाने से कमज़ोर होती है।
हमारे संविधान ने राज्य को अधिकार जरूर दिए हैं, लेकिन उन अधिकारों के साथ जवाबदेही भी तय की है। यही वजह है कि अदालतों, पुलिस और प्रशासन से हमेशा यह उम्मीद की जाती है कि वे सिर्फ इंसाफ करें ही नहीं, बल्कि उनका हर कदम निष्पक्ष इंसाफ की मिसाल भी बने।
गंगा नदी करोड़ों लोगों की आस्था और तहज़ीब की निशानी है। अगर उसकी पवित्रता का अपमान कानून की नज़र में जुर्म है, तो यही उसूल हर नागरिक पर बराबरी से लागू होना चाहिए। कानून की इज़्ज़त तभी कायम रहती है, जब उसके पैमाने सबके लिए बराबर हों।
आखिरकार, असली सवाल किसी एक मुकदमे या एक समुदाय का नहीं है। असली सवाल उस भरोसे का है जो एक नागरिक अपने संविधान, अपनी अदालतों और अपने न्याय तंत्र पर करता है। अगर यह भरोसा कमज़ोर पड़ जाए, तो नुकसान सिर्फ आज का नहीं बल्कि आने वाली नस्लों का भी होगा।
इसलिए सवाल आज भी अपनी जगह कायम है—
अगर संविधान एक है, तो कानून के लागू होने में फर्क क्यों महसूस होता है? अगर नागरिक बराबर हैं, तो इंसाफ के पैमाने भी बराबर होने चाहिए। क्योंकि जम्हूरियत की बुनियाद सिर्फ कानून से नहीं, बल्कि कानून के बराबर और निष्पक्ष अमल से मजबूत होती है।
(मज़मून निगार की राय से संस्था का सहमत होना ज़रूरी नहीं है।)
जमील अहमद मिलनसार, बेंगलुरु
Source: Haqeeqat Times

