बारूद, तेल और तिजारत का ख़तरनाक त्रिकोण
आधुनिक जंगों में इंसानी जान से ज़्यादा मुनाफ़ा क्यों अहम हो गया?
हर जंग अपने पीछे दो तरह का मलबा छोड़ जाती है। एक वह, जो टूटी हुई इमारतों, जली हुई गाड़ियों और बेक़सूर इंसानी लाशों की शक्ल में दुनिया को दिखाई देता है। दूसरा वह, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था, सियासत और इंसानी ज़मीर पर गिरता है। पहला मलबा कैमरों में क़ैद हो जाता है, जबकि दूसरा तारीख़ के हाशियों में दबकर रह जाता है।
अफ़सोस की बात यह है कि हर जंग के दौरान हमारी नज़र इस बात पर रहती है कि कितनी मिसाइलें दागी गईं, कितने शहर तबाह हुए और किस मुल्क ने किस पर बढ़त हासिल की। लेकिन बहुत कम लोग यह सवाल उठाते हैं कि इस जंग से कमाया किसने?
अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच हालिया टकराव ने एक बार फिर यही सवाल ज़िंदा कर दिया है। पहली नज़र में तीनों देशों को नुकसान हुआ, लेकिन अगर इस जंग को सिर्फ़ फ़ौजी नज़रिए से नहीं, बल्कि आर्थिक और सियासी नज़रिए से देखा जाए, तो तस्वीर कुछ और ही दिखाई देती है।
आज अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी फ़ौजी ताक़त होने के साथ-साथ हथियार उद्योग का भी सबसे बड़ा केंद्र है। जंग के दौरान इस्तेमाल होने वाले हथियारों की दोबारा ख़रीद होती है, नए ऑर्डर दिए जाते हैं, सहयोगी देश अपनी रक्षा तैयारियों को मज़बूत करते हैं और हथियार बनाने वाली कंपनियों का कारोबार तेज़ हो जाता है। यानी जंग सिर्फ़ सरहदों पर नहीं, बल्कि फ़ैक्ट्रियों और वित्तीय बाज़ारों में भी लड़ी जाती है।
खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ने के शुरुआती दौर में अमेरिकी नेतृत्व ने यह साफ़ किया कि अगर ईरान के हमलों से अरब देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों या सुविधाओं को नुकसान होता है, तो उससे जुड़े आर्थिक बोझ में मेज़बान देशों को भी अपनी हिस्सेदारी निभानी होगी। इसे बदलती वैश्विक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जहाँ सुरक्षा का खर्च भी सहयोगी देशों के बीच बाँटा जा रहा है।
इसी दौरान खाड़ी देशों ने अपनी सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए आधुनिक रक्षा प्रणालियों और नए हथियारों की ख़रीद में दिलचस्पी बढ़ा दी। यानी ख़ौफ़ ने एक बार फिर वैश्विक हथियार बाज़ार को रफ़्तार दे दी।
दूसरी तरफ़, हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास बढ़े तनाव ने वैश्विक तेल बाज़ार को भी झकझोर दिया। तेल की क़ीमतों में उतार-चढ़ाव से दुनिया भर में महँगाई, व्यापारिक लागत और आर्थिक अनिश्चितता बढ़ी। इसका असर सिर्फ़ जंग में शामिल देशों पर नहीं, बल्कि उन करोड़ों लोगों पर भी पड़ा, जिनका इस संघर्ष से कोई सीधा संबंध नहीं था।
यह भी हक़ीक़त है कि जब-जब युद्धविराम (सीज़फ़ायर) की उम्मीद जगी, तब-तब अलग-अलग सियासी, कूटनीतिक और फ़ौजी कारणों ने उस प्रक्रिया को और पेचीदा बना दिया। इन वजहों पर विशेषज्ञों की राय अलग-अलग हो सकती है, लेकिन एक सवाल अपनी जगह बरकरार है—क्या आधुनिक जंगों में आर्थिक हित भी अमन की राह को प्रभावित करते हैं?
इराक, अफ़ग़ानिस्तान, लीबिया और दुनिया के कई अन्य संघर्ष हमें यही सबक देते हैं कि जंगें ख़त्म हो जाती हैं, लेकिन उनके आर्थिक असर दशकों तक बने रहते हैं। जंग से तबाह देशों के पुनर्निर्माण में वर्षों लग जाते हैं, जबकि हथियार उद्योग और उससे जुड़े कुछ आर्थिक वर्ग मुनाफ़े के नए रिकॉर्ड बना लेते हैं।
आज दुनिया के सामने सबसे बड़ा सवाल शायद यह नहीं है कि कौन-सी फ़ौज ज़्यादा ताक़तवर है, बल्कि यह है कि जंग का आर्थिक मॉडल आख़िर किसके फ़ायदे में काम करता है? अगर ख़ौफ़ एक कारोबार बन जाए, हथियार सबसे बड़ा उद्योग बन जाए और अमन सबसे कम मुनाफ़े वाली चीज़ बनकर रह जाए, तो दुनिया में जंगों को रोकना पहले से कहीं ज़्यादा मुश्किल हो जाएगा।
तारीख़ गवाह है कि हर जंग के बाद फ़तह पाने वालों की सूची बदल जाती है, लेकिन एक तबक़ा ऐसा है जो शायद कभी हारता नहीं—जंग का कारोबार। सैनिक बदल जाते हैं, मोर्चे बदल जाते हैं, सरकारें बदल जाती हैं, मगर हथियार बेचने वाले, ख़ौफ़ की तिजारत करने वाले और जंग से मुनाफ़ा कमाने वाले हर दौर में अपना हिसाब फ़ायदे के खाने में ही लिखते हैं।
शायद इसी वजह से आज के दौर का सबसे अहम सवाल यह नहीं कि जंग किसने जीती? बल्कि यह है कि जंग से कमाया किसने?
लेखक: शरफ़ुद्दीन सैयद
Source: Haqeeqat Times (Translated in Hindi)

