शहरियत का बदलता तसव्वुर और अवामी ख़दशात
SIR, दस्तावेज़ और आइनी सवालात पर एक तजज़िया
हाल ही में भारत के विदेश मंत्रालय ने यह वज़ाहत दी कि भारतीय पासपोर्ट नागरिकता (Citizenship) का सबूत नहीं, बल्कि सिर्फ़ विदेश यात्रा के लिए जारी किया गया एक यात्रा दस्तावेज़ (Travel Document) है। इस बयान के बाद पूरे देश में नागरिकों के बीच नई बहस और बेचैनी पैदा हो गई है।
लोगों का सवाल है कि जब पासपोर्ट पर स्पष्ट रूप से राष्ट्रीयता (Nationality) “Indian” दर्ज होती है, तो उसे नागरिकता का प्रमाण क्यों नहीं माना जा रहा? इस स्पष्टीकरण ने आम नागरिकों की उलझन और बढ़ा दी है और नागरिकता का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है।
पिछले वर्ष बिहार में SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया शुरू होने के दौरान नागरिकता के प्रमाण को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा था। उस समय अदालत ने कहा था कि यदि किसी व्यक्ति के पास राशन कार्ड या अन्य दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं हैं, तो पासपोर्ट को नागरिकता का निर्णायक प्रमाण (Conclusive Proof of Citizenship) माना जा सकता है। इसके बावजूद विदेश मंत्रालय की नई व्याख्या ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
भारत में सरकार नागरिकता का कोई अलग प्रमाण-पत्र जारी नहीं करती। ऐसे में यदि नागरिकता साबित करने के लिए अलग-अलग दस्तावेज़ों की मांग की जाती है, तो यह बड़ी आबादी के लिए कठिन साबित हो सकता है। विशेष रूप से गरीब, मज़दूर और वंचित तबकों के लिए, जिनके पास पुराने दस्तावेज़ सुरक्षित रखना हमेशा संभव नहीं रहा।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि पहले भारतीय नागरिकता की अवधारणा समावेशी (Inclusive) थी। यानी जो भारत के संविधान, लोकतांत्रिक व्यवस्था और कानूनों पर विश्वास रखता था, उसे इस देश का नागरिक माना जाता था। लेकिन समय के साथ यह सोच धीरे-धीरे बहिष्करण (Exclusion) की ओर बढ़ती गई, जहाँ नागरिकता सिद्ध करने का बोझ नागरिकों पर बढ़ता गया।
संवैधानिक विशेषज्ञ प्रो. फ़ैज़ान मुस्तफ़ा का कहना है कि असम में कई लोगों के पास 15–18 तरह के दस्तावेज़ होने के बावजूद उन्हें विदेशी घोषित कर दिया गया। उनका मानना है कि समय के साथ नागरिकता संबंधी मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण भी पहले की तुलना में अधिक सख़्त हुआ है।
संविधान निर्माण के दौरान डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी नागरिकता के प्रश्न को सबसे जटिल विषयों में से एक बताया था। संविधान के अनुच्छेद 5 के तहत प्रारंभिक सिद्धांत यह था कि भारत में जन्म लेने वाला व्यक्ति भारतीय नागरिक होगा। बाद में अनुच्छेद 11 के माध्यम से संसद को नागरिकता संबंधी कानून बनाने का अधिकार दिया गया।
इसके बाद 1955 में नागरिकता अधिनियम अस्तित्व में आया। वर्ष 1986 में इसमें पहला बड़ा संशोधन हुआ, जिसके तहत केवल भारत में जन्म लेना पर्याप्त नहीं रहा, बल्कि माता-पिता में से कम से कम एक का भारतीय होना आवश्यक कर दिया गया। वर्ष 2003 में नियम और कड़े किए गए, जबकि 2019 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) पारित किया गया, जिसे 2024 में अधिसूचित किया गया।
इसके बाद 2025 में बिहार और 2026 में पश्चिम बंगाल सहित अन्य राज्यों में SIR प्रक्रिया शुरू हुई, जहाँ मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान नागरिकता और पहचान से जुड़े सवाल फिर सामने आए। कई स्थानों पर आवश्यक दस्तावेज़ों के अभाव में बड़ी संख्या में लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने की खबरें भी सामने आईं।
लेख में यह भी उल्लेख किया गया है कि असम में NRC प्रक्रिया के दौरान लगभग 19 लाख लोगों के नाम सूची से बाहर हो गए थे। वहीं जिन करोड़ों लोगों की नागरिकता सत्यापित हुई, उन्हें भी आज तक सरकार की ओर से अलग नागरिकता प्रमाण-पत्र जारी नहीं किया गया।
लेखक का तर्क है कि 1987 से पहले जन्मे लोगों के लिए नागरिकता साबित करने की चुनौती अपेक्षाकृत कम है, लेकिन उसके बाद जन्मे लोगों को अपनी ही नहीं, बल्कि अपने माता-पिता की नागरिकता से जुड़े दस्तावेज़ भी प्रस्तुत करने पड़ सकते हैं। इससे गरीब और दस्तावेज़ों से वंचित तबकों के सामने गंभीर कठिनाइयाँ खड़ी हो सकती हैं।
लेख के अंत में यह चिंता व्यक्त की गई है कि यदि नागरिकता और दस्तावेज़ों का प्रश्न इसी तरह जटिल होता गया, तो बड़ी संख्या में लोग सरकारी योजनाओं और संवैधानिक अधिकारों से वंचित हो सकते हैं। लेखक का कहना है कि नागरिकता का मुद्दा संवेदनशील है और इसका समाधान संविधान, कानून और न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए।
लेखक: मोहम्मद आज़म शाहिद, बेंगलुरु
Source: Haqeeqat Times

