नई दिल्ली/बेंगलुरु: देश में शहरियत (Citizenship) को लेकर बहस एक बार फिर तेज़ हो गई है। हाल ही में कर्नाटक हाईकोर्ट ने बेंगलुरु में हिरासत में लिए गए अब्दुल रहीम की कथित बांग्लादेश डिपोर्टेशन पर फिलहाल रोक लगाते हुए उनकी पहचान की दोबारा जांच के आदेश दिए हैं। वहीं दूसरी ओर, गुवाहाटी हाईकोर्ट ने असम के एक निवासी को विदेशी घोषित करने वाले फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के फैसले को बरकरार रखा।

हाईकोर्ट ने कहा कि केवल कई सरकारी दस्तावेज़ पेश कर देना शहरियत साबित करने के लिए काफी नहीं है। अदालत के मुताबिक, दस्तावेज़ों का कानूनी रूप से प्रमाणित, आपस में मेल खाने वाला और विश्वसनीय होना ज़रूरी है। संबंधित व्यक्ति ने NRC, वोटर लिस्ट, ज़मीन के कागज़ात, स्कूल सर्टिफिकेट, PAN कार्ड और वोटर ID समेत 16 दस्तावेज़ पेश किए थे, लेकिन अदालत ने उनमें कई विसंगतियां पाई।

इस फैसले के बाद सोशल मीडिया और सियासी हलकों में यह सवाल ज़ोर पकड़ रहा है कि अगर पासपोर्ट, आधार कार्ड, वोटर ID, PAN कार्ड, राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और स्कूल सर्टिफिकेट भी शहरियत का अंतिम सबूत नहीं हैं, तो आखिर भारतीय नागरिक अपनी नागरिकता किस दस्तावेज़ से साबित करेगा?

इस बीच विदेश मंत्रालय ने भी स्पष्ट किया है कि भारतीय पासपोर्ट एक ट्रैवल डॉक्यूमेंट है, न कि शहरियत का अंतिम कानूनी प्रमाण। मंत्रालय के अनुसार, नागरिकता का निर्धारण Citizenship Act, 1955 और संबंधित नियमों के तहत किया जाता है।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में ऐसा कोई एकल (Single) दस्तावेज़ नहीं है जिसे हर मामले में शहरियत का अंतिम प्रमाण माना जाए। यदि नागरिकता पर विवाद होता है, तो अदालत उपलब्ध साक्ष्यों और संबंधित कानूनों के आधार पर फैसला करती है।

लेख में यह भी चिंता जताई गई है कि दस्तावेज़ों में छोटी-मोटी गलतियां, नाम या उम्र में अंतर, पलायन, गरीबी, अशिक्षा और पुराने रिकॉर्ड की कमी के कारण गरीब, ग्रामीण, प्रवासी मज़दूर, महिलाओं और अल्पसंख्यकों को सबसे अधिक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

यह मुद्दा अब केवल कानूनी नहीं, बल्कि पहचान, लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिकों के भरोसे से जुड़ा बड़ा सवाल बनता जा रहा है।

Source: Haqeeqat Times