मियाँ! ज़िंदगी भी अजीब तमाशा है। वक़्त का पहिया इतनी ख़ामोशी से घूमता है कि देखते ही देखते साल गुज़र जाते हैं, उम्र की किताब के कई सफ़्हे पलट जाते हैं। लेकिन दिल के किसी कोने में एक दुनिया हमेशा ज़िंदा रहती है, और वो है बचपन की दुनिया।
ये वो दौर है जिसे न वक़्त मिटा सकता है, न दूरियाँ कमज़ोर कर सकती हैं और न ही ज़िंदगी की मसरूफ़ियत उसकी ख़ुशबू छीन सकती है। जब भी दिल दुनिया की भागदौड़, थकान और बेरंग ज़िंदगी से उकता जाता है, तो यादों के दरवाज़े अपने आप खुल जाते हैं और बचपन की मासूम दुनिया आँखों के सामने आ खड़ी होती है।
मियाँ, वो दिन भी क्या दिन थे!
न किसी बात की फ़िक्र, न कल की परवाह, न जेब में पैसे होने की चिंता और न दुनिया की चालाकियों का एहसास। ख़ुशी तो बस इतनी सी बात में मिल जाती थी कि दोस्तों के साथ गली में निकल गए, मिट्टी में खेल लिए, बारिश के पानी में कागज़ की कश्तियाँ बहा दीं या किसी पेड़ पर चढ़कर कच्चे आम तोड़ लिए। तब कहाँ मालूम था कि यही छोटे-छोटे लम्हे एक दिन ज़िंदगी का सबसे बड़ा ख़ज़ाना बन जाएंगे।
हमारा बचपन किसी महल, महंगे खिलौनों या बड़ी-बड़ी सहूलियतों का मोहताज नहीं था। हम गाँव की कच्ची गलियों में पले-बढ़े, जहाँ मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू ही दुनिया का सबसे कीमती इत्र लगती थी। नंगे पाँव दौड़ना, गिर जाना, फिर हँसकर उठ जाना, घुटनों का छिल जाना और अम्मी का प्यार से फूँक मारकर कहना, “अरे मियाँ, अब सब ठीक हो गया।” बस यही तो असली ख़ुशियाँ थीं।
सुबह मस्जिद से आती अज़ान की आवाज़, परिंदों की चहचहाहट, खेतों से चलती ठंडी हवा और घर के आँगन से अम्मी की आवाज़, “मियाँ, पहले नाश्ता कर लो, फिर खेलने जाना।” आज भी कानों में गूंजती है तो दिल भर आता है।
शाम होते ही हर गली बच्चों की आवाज़ों से गुलज़ार हो जाती थी। गिल्ली-डंडा, कंचे, लट्टू, आँख-मिचौली, पकड़म-पकड़ाई और पतंगबाज़ी खेलते-खेलते कब सुबह से शाम हो जाती थी, पता ही नहीं चलता था। थकान का नाम तक नहीं होता था।
और मियाँ, हमारी दोस्ती भी क्या दोस्ती थी! न मिलने के लिए कोई वादा, न मोबाइल फोन, न मैसेज। बस गली के नुक्कड़ से एक आवाज़ आती, “ओ मियाँ… बाहर आओ!” और देखते ही देखते पूरी टोली जमा हो जाती। हर ख़ुशी में साथ, हर शरारत में शरीक और हर राज़ एक-दूसरे की अमानत होता था। रूठते भी थे, मगर अगले ही पल गले लग जाते थे। न दिल में जलन थी, न नफ़रत, न मतलब—सिर्फ़ मोहब्बत, अपनापन और बेग़र्ज़ दोस्ती थी।
दादी अम्मा की लोरियाँ, नानी की कहानियाँ, वालिद की शफ़क़त, माँ की ममता और बुज़ुर्गों की दुआएँ… ये सब हमारी ज़िंदगी की सबसे बड़ी दौलत थीं। उस वक़्त शायद उनकी क़द्र नहीं थी, लेकिन आज उन्हीं यादों से दिल को सुकून मिलता है।
फिर वक़्त बदला। तालीम, ज़िम्मेदारियाँ, रोज़गार और ज़िंदगी की भागदौड़ ने सबको अपनी-अपनी मंज़िलों की तरफ़ भेज दिया। जिन दोस्तों के बिना एक दिन भी अधूरा लगता था, आज उनसे मिले बरसों बीत जाते हैं। अब रिश्ते सोशल मीडिया की तस्वीरों, किसी स्टेटस पर एक नज़र, कभी-कभार एक फोन कॉल या ईद की मुबारकबाद तक सिमटकर रह गए हैं।
मियाँ! तुम अपनी ज़िंदगी में मशगूल हो गए, और शायद यही दुनिया का दस्तूर भी है। लेकिन यक़ीन मानो, बचपन की वो मासूम शरारतें, बेफ़िक्र ठहाके, बेझिझक बातें और सच्ची दोस्ती आज भी मेरे दिल में ज़िंदा हैं। शायद तुम हमें भूल गए हो, मगर हम आज भी तुम्हें अपनी दुआओँ में याद रखते हैं। सच्ची दोस्ती कभी हिसाब नहीं माँगती और कुछ रिश्ते वक़्त या दूरियों से कभी नहीं टूटते।
आज जब उन्हीं गाँव की गलियों से गुज़रता हूँ तो हर मोड़ कोई पुरानी कहानी सुनाता है। पेड़ तो आज भी वहीं खड़े हैं, लेकिन उनकी छाँव में बैठने वाले दोस्त बिछड़ गए। मैदान तो हैं, मगर बच्चों की खिलखिलाहट कहीं खो गई है। आज बच्चे मैदानों में कम और मोबाइल की स्क्रीन पर ज़्यादा नज़र आते हैं। उनके हाथों में गेंद नहीं, मोबाइल है; उनकी आँखों में खुले आसमान के ख़्वाब नहीं, बल्कि स्क्रीन की चमक बस गई है।
दिल दुखता है कि आज की नस्ल वो बचपन नहीं जी रही जो हमने जिया था। उन्हें खेलने के लिए मैदान कम और स्क्रीन ज़्यादा मिल रही हैं। किताबों की ख़ुशबू, बुज़ुर्गों की सोहबत, दोस्तों का अपनापन और गाँव की सादगी धीरे-धीरे सिर्फ़ यादों का हिस्सा बनती जा रही है।
हासिल-ए-कलाम यही है कि बचपन सिर्फ़ उम्र का एक हिस्सा नहीं, बल्कि इंसान की मासूमियत, मोहब्बत, सादगी और ख़ुलूस का दूसरा नाम है। अगर हम अपनी आने वाली नस्ल को एक ख़ूबसूरत बचपन नहीं दे पाए, तो हो सकता है वो तालीमयाफ़्ता तो बन जाए, लेकिन ख़ुशनसीब नहीं।
आज भी अगर किसी गली में कोई बच्चा मिट्टी से घरौंदा बना रहा हो, कोई लड़का पतंग उड़ा रहा हो या कोई बच्ची अपनी गुड़िया को लोरी सुना रही हो, तो दिल से यही दुआ निकलती है—या अल्लाह! इन मासूम मुस्कुराहटों को हमेशा सलामत रखना।
मियाँ! बचपन वो चिराग़ है जो एक बार बुझ जाए तो फिर दोबारा नहीं जलता। उसकी रौशनी को महफ़ूज़ रखना, अपने बच्चों को सिर्फ़ अच्छी तालीम ही नहीं बल्कि मोहब्बत, खेल, ख़ुलूस, दोस्ती और एक ख़ूबसूरत बचपन भी देना हम सबकी साझा ज़िम्मेदारी है। क्योंकि यही बचपन कल के अच्छे इंसान, अच्छे समाज और रौशन मुस्तक़बिल की बुनियाद है।
✍️ रहबर तमापुरी
Source: Haqeeqat Times

