“जब अवाम सवाल करे, तो जवाब देना ज़रूरी है”
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत अवाम का एतमाद (भरोसा) होता है, और सबसे बड़ा ख़तरा तब पैदा होता है जब यही एतमाद ख़ामोशी से टूटने लगे। आज हिंदुस्तान में जो कुछ हो रहा है, वह सिर्फ़ एक इम्तिहान या एक एहतिजाज (प्रदर्शन) की कहानी नहीं, बल्कि हुकूमत और अवाम के रिश्ते पर उठते गंभीर सवालों की तस्वीर है।
NEET को लेकर जारी एहतिजाज अब केवल तालीमी निज़ाम तक सीमित नहीं रहा। यह अब हुकूमत के रवैये का आईना बन गया है। नौजवान अपने मुस्तकबिल (भविष्य) के बारे में सवाल पूछ रहे हैं, इंसाफ़ की मांग कर रहे हैं, लेकिन जवाब में उन्हें लाठीचार्ज, धक्के और सख्ती का सामना करना पड़ रहा है।
सबसे ज़्यादा फिक्र उस वीडियो ने बढ़ाई, जिसमें एक महिला प्रदर्शनकारी के साथ एक पुरुष पुलिस अधिकारी की कथित बदसलूकी दिखाई गई। अगर रियासत की ताकत महिलाओं के सम्मान पर चोट बनकर उतरे, तो फिर कानून की हुकूमत का दावा किस बुनियाद पर किया जाएगा? पुलिस का फ़र्ज़ अवाम की हिफाज़त करना है, उनकी तौहीन करना नहीं।
हुकूमत की असली परीक्षा मुख़ालिफ़ आवाज़ों को दबाने में नहीं, बल्कि उन्हें सुनने में होती है। जब तन्क़ीद (आलोचना) को दुश्मनी समझा जाने लगे, तब लोकतंत्र एक ख़तरनाक मोड़ पर पहुंच जाता है। इख़्तिलाफ़-ए-राय (मतभेद) कोई जुर्म नहीं, बल्कि एक ज़िंदा समाज की पहचान है।
आज मुल्क का माहौल बदल रहा है। नौजवानों की बेचैनी अब सिर्फ़ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रही, बल्कि सड़कों पर दिखाई दे रही है। किसान अब भी नाराज़ हैं। दलित अपनी इज़्ज़त और हक़ की लड़ाई लड़ रहे हैं। आदिवासी अपने अधिकार मांग रहे हैं। ओबीसी समाज में भी बेचेनी बढ़ रही है, जबकि अक़ल्लियतें (अल्पसंख्यक) अपने दस्तूरी हक़ और बराबरी की तलाश में हैं।
ये तमाम आवाज़ें अलग-अलग नहीं हैं। इनके दर्द का मरकज़ एक ही है—यह एहसास कि शायद हुकूमत ने अवाम की आवाज़ सुनना कम कर दिया है।
इक्तिदार (सत्ता) में बैठे लोगों को समझना होगा कि अवाम का ख़ौफ़ कुछ वक़्त का हो सकता है, लेकिन अवाम की नाराज़गी लंबे समय तक असर छोड़ती है। तारीख़ गवाह है कि हुकूमतें सिर्फ़ नारों से नहीं गिरतीं, बल्कि तब कमज़ोर होती हैं जब वे अपने ही नागरिकों की आवाज़ को नज़रअंदाज़ करने लगती हैं।
हवा का रुख बदल रहा है। यह बदलाव किसी एक पार्टी या एक एहतिजाज का नहीं, बल्कि अवामी शऊर (जनचेतना) के बदलने का संकेत है। अब सवाल सिर्फ़ NEET का नहीं रहा। सवाल यह है कि क्या इस मुल्क में इख़्तिलाफ़ की आवाज़ को इज़्ज़त के साथ सुना जाएगा, या ताकत के दम पर ख़ामोश करने की कोशिश की जाएगी?
लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि हुकूमत अवाम से डरती नहीं, बल्कि उनके सामने जवाबदेह होती है। जब जवाबदेही कम होने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि इक्तिदार मज़बूत नहीं, बल्कि कमज़ोर हो रहा है।
लेखक: जमी़ल अहमद मिलनसार, बेंगलुरु
Source: Haqeeqat Times

