शुक्रिया प्रधान जी! आपने बहुत कुछ समझा दिया…

सवाल दबाने से जम्हूरियत ख़ामोश नहीं होती

कभी-कभी तारीख़ के सबसे बड़े सबक किताबों से नहीं मिलते। कभी कोई वाक़िआ, कोई सियासी संकट, कोई हुकूमती फैसला या किसी हुक्मरान की ज़िद पूरी नस्ल को वह सबक सिखा देती है, जो बरसों की तक़रीरें और किताबें भी नहीं सिखा पातीं।

धर्मेंद्र प्रधान जी, आपका शुक्रिया।

इसलिए नहीं कि आपने कोई ऐसा काम किया जिस पर आने वाली नस्लें आपका शुक्रिया अदा करेंगी, बल्कि इसलिए कि आपकी सियासी ज़िद और हुकूमती रवैये ने कई ऐसे सवालों को जन्म दिया जिन्हें बरसों से दबाने या “मुल्क-दुश्मनी” का लेबल लगाकर ख़ामोश करने की कोशिश की जाती रही।

आपकी वजह से नई नस्ल ने यह समझा कि—

  • मुल्क और हुकूमत एक नहीं होते।
  • हुक्मरान और वतन एक नहीं होते।
  • हुकूमत से इख़्तिलाफ़ करना, मुल्क से गद्दारी नहीं होता।
  • और सवाल पूछने वाला हमेशा दुश्मन नहीं होता।

कभी-कभी वही सबसे बड़ा वतनपरस्त होता है जो इक्तेदार से पूछता है—

“जो वादा किया था, वह कहाँ है?”

पिछले बारह सालों में हिंदुस्तान की सियासत में कुछ नए अल्फ़ाज़ बहुत आम हो गए—

“एंटी नेशनल”, “मुल्क-दुश्मन”, “पाकिस्तानी एजेंट”, “चीनी एजेंट”, “अर्बन नक्सल”।

जो हुकूमत से सवाल करे, उस पर नया लेबल। जो एहतिजाज करे, उस पर नया इल्ज़ाम।

ऐसा माहौल बना दिया गया जैसे वतनपरस्ती का सर्टिफिकेट भी इक्तेदार ही जारी करेगा।

लेकिन तारीख़ का मिज़ाज कुछ और होता है।

तारीख़ कभी किसी हुकूमत को यह इख़्तियार नहीं देती कि वह खुद को “मुल्क” घोषित कर दे।

हुकूमतें आती हैं, जाती हैं। पार्टियाँ बनती हैं, टूटती हैं। हुक्मरान बदलते हैं।

लेकिन मुल्क रहता है। संविधान रहता है। अवाम रहती है। और सबसे बढ़कर—सवाल रहता है।

आज की Gen-Z ने शायद सबसे गहराई से यही बात महसूस की है।

जब “आज़ादी” का नारा लगा तो कहा गया—यह मुल्क के खिलाफ़ है।

जब “इंक़लाब ज़िंदाबाद” कहा गया तो पूछा गया—यह किसके खिलाफ़ है?

लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा कि—

अगर आज़ादी का मतलब डर से आज़ादी हो…
अगर इंक़लाब का मतलब नाइंसाफी के खिलाफ़ आवाज़ हो…
अगर एहतिजाज का मतलब अपने हक़ के लिए खड़ा होना हो…

तो फिर इसमें मुल्क-दुश्मनी कहाँ है?

क्या भगत सिंह का इंक़लाब मुल्क के खिलाफ़ था?

अगर ऐसा होता तो शायद आज “आज़ादी” का लफ़्ज़ भी एंटी नेशनल माना जाता।

नारे कभी गद्दार नहीं होते।

नीयत गद्दार हो सकती है, अल्फ़ाज़ नहीं।

एक और परदा भी उठा—

वह यह कि “हुक्मरान ही मुल्क है”

बरसों तक कोशिश हुई कि हुक्मरान की मुखालिफ़त को मुल्क की मुखालिफ़त बना दिया जाए।

लेकिन जम्हूरियत का सबसे बुनियादी उसूल है—

हुक्मरान अवाम का नुमाइंदा होता है, मालिक नहीं।

और जिस दिन अवाम सवाल करना छोड़ दे, उसी दिन जम्हूरियत सिर्फ़ चुनावी रस्म बनकर रह जाती है।

इसीलिए सवाल करने वाला नौजवान ख़तरनाक नहीं होता।

ख़तरनाक वह निज़ाम होता है जो सवाल से डरता है।

शुक्रिया प्रधान जी!

आपने एक और भ्रम तोड़ दिया।

यह कि किसी नेता को इतना बड़ा बना दो कि लोग उस पर सवाल करने से डर जाएँ।

आज सोशल मीडिया के दौर में एक नौजवान के हाथ में मौजूद मोबाइल फ़ोन कभी-कभी पूरे प्रोपेगेंडा सिस्टम से ज़्यादा ताकतवर साबित होता है।

क्योंकि वहाँ—

  • पुराने वादे मौजूद हैं।
  • पुराने वीडियो मौजूद हैं।
  • तुलना मौजूद है।
  • याददाश्त मौजूद है।
  • और सबसे बढ़कर—अवाम की अपनी आवाज़ मौजूद है।

अब कोई भी शख़्सियत सवालों से ऊपर नहीं रह सकती।

जम्हूरियत में कोई नेता मुक़द्दस नहीं होता।

मुक़द्दस होता है संविधान।
मुक़द्दस होती है अवाम की हाकिमियत।
मुक़द्दस होती है इंसान की आज़ादी और उसका वक़ार।

और फिर गांधी…

तारीख़ का शायद सबसे बड़ा तंज़ यही है कि जिस गांधी को कमज़ोर साबित करने की कोशिश की गई, वही आज फिर मुख़ालफ़त और अहिंसा की सबसे बड़ी निशानी बनकर सामने खड़े हैं।

गांधी के पास न फ़ौज थी, न सत्ता, न सरकारी मशीनरी।

उनके पास सिर्फ़ दो चीज़ें थीं—

सच पर यक़ीन और अवाम पर भरोसा।

उन्होंने दुनिया को बताया कि ताक़त सिर्फ़ हथियार में नहीं होती।

ताक़त सच में भी होती है।

ताक़त अहिंसा में भी होती है।

ताक़त एक आम इंसान के इंकार में भी होती है।

इसीलिए गांधी आज भी ज़िंदा हैं।

उनके क़ातिल का नाम तारीख़ में दर्ज है।

लेकिन गांधी का नाम इंसानियत के ज़मीर में दर्ज है।

NEET और नौजवानों का सवाल

NEET जैसे संकट ने भी एक बुनियादी सवाल खड़ा किया—

हुकूमत आख़िर जवाबदेह किसके सामने है?

अवाम के सामने?

नौजवानों के सामने?

वालिदैन के सामने?

या सिर्फ़ सियासी निज़ाम के सामने?

जब एक तालीब-ए-इल्म बरसों मेहनत करता है, तो उसके पीछे सिर्फ़ एक एग्ज़ाम नहीं होता।

उसके पीछे माँ की दुआ, बाप की क़ुर्बानी और पूरे घर का सपना होता है।

ऐसे में अगर निज़ाम नाकाम हो जाए, तो वह सिर्फ़ इंतज़ामी गलती नहीं रहती।

वह इंसानी मसला बन जाती है।

और जब सवाल अदालत तक पहुँच जाए, तो समझ लेना चाहिए कि कहीं न कहीं जवाब कम पड़ गया है।

सोशल मीडिया की नई ताक़त

जिस सोशल मीडिया को कभी वक़्त की बर्बादी कहा जाता था, वही आज सियासी शऊर की नई यूनिवर्सिटी बन चुका है।

यहाँ कोई एक एंकर यह तय नहीं करता कि मुल्क क्या सोचे।

यहाँ कोई एक पार्टी यह तय नहीं करती कि कौन वतनपरस्त है और कौन गद्दार।

यहाँ हर दावा पर सवाल हो सकता है।

हर बयान की जाँच हो सकती है।

हर नौजवान अपनी बात रख सकता है।

अब नई नस्ल को सिर्फ़ बताया नहीं जा सकता।

उसे क़ायल करना पड़ता है।

और शायद आने वाले वक़्त में सबसे मज़बूत सियासी ताक़त वही होगी जो नौजवानों के सवालों का जवाब दे सके।

आख़िर में…

तो एक बार फिर—

शुक्रिया प्रधान जी!

आपने शायद यह सिखा दिया कि—

  • सच को “एंटी नेशनल” कह देने से वह झूठ नहीं बन जाता।
  • सवाल पूछने वाले को गद्दार कह देने से सवाल ख़त्म नहीं होता।
  • हुक्मरान को मुल्क कह देने से मुल्क हुक्मरान नहीं बन जाता।
  • प्रोपेगेंडा को हक़ीक़त नहीं बनाया जा सकता।
  • और किसी शख़्सियत को मुक़द्दस बना देने से वह सवालों से ऊपर नहीं हो जाती।

जम्हूरियत की सबसे बड़ी ताक़त हुकूमत नहीं—

अवाम का सवाल है।

और आखिर में तारीख़ हर हुक्मरान से सिर्फ़ एक सवाल पूछती है—

“आप मुल्क के मालिक बनकर आए थे या अवाम के ख़ादिम बनकर?”

तारीख़ के कटघरे में न प्रोपेगेंडा चलता है, न नारों का शोर।

वहाँ सिर्फ़ सच चलता है।

वहाँ यह नहीं पूछा जाता कि आपने कितनी बार “भारत माता की जय” कहा।

वहाँ सिर्फ़ यह पूछा जाता है—

  • जब अवाम मुश्किल में थी, आप कहाँ थे?
  • जब नौजवान सवाल कर रहे थे, आपने जवाब दिया या उन्हें ख़ामोश किया?
  • जब सच और सत्ता आमने-सामने थे, आपने किसका साथ दिया?

और शायद यही जम्हूरियत की सबसे बड़ी पहचान है—

मुल्क वह नहीं जहाँ अवाम को ख़ामोश कराया जाए।

मुल्क वह है जहाँ अवाम को बोलने, सवाल करने और इख़्तिलाफ़ जताने का हक़ हासिल हो।

और जो क़ौम सवाल करना सीख लेती है, उसे हमेशा के लिए कोई ख़ामोश नहीं कर सकता।

लेखक: शरफ़ुद्दीन सैयद, बेंगलुरु

Source: Haqeeqat Times