SIR के आँकड़े, बेंगलुरु की तस्वीर और लोकतंत्र के सामने उठते सवाल

 

लोकतंत्र में वोटर लिस्ट महज़ नामों का एक सरकारी रजिस्टर नहीं होती, बल्कि यह नागरिक के उस बुनियादी हक़ की दस्तावेज़ होती है, जिसके ज़रिए वह राज्य की सत्ता में अपनी हिस्सेदारी दर्ज कराता है। इसलिए वोटर लिस्ट से फर्जी, मृत या डुप्लीकेट नामों को हटाना ज़रूरी है। लेकिन सुधार के नाम पर अगर बहुत बड़ी तादाद में योग्य नागरिक ही शक के दायरे में आ जाएँ, तो मामला सिर्फ चुनावी इंतज़ाम का नहीं रह जाता, बल्कि लोकतांत्रिक भरोसे, प्रशासनिक पारदर्शिता और वोट देने के अधिकार की हिफाज़त का बुनियादी सवाल बन जाता है।

कर्नाटक में जारी Special Intensive Revision यानी SIR के दौरान करीब एक करोड़ दस लाख से ज्यादा वोटरों को अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत, डुप्लीकेट एंट्री या दूसरी श्रेणियों में चिन्हित किए जाने की खबरों ने इस सवाल को बेहद अहम बना दिया है कि आखिर राज्य के लगभग हर पाँच में से एक वोटर ऐसी सूची में कैसे पहुँच गया, जहाँ उसकी चुनावी हैसियत पर दोबारा सवाल खड़ा हो गया है?

यह बात साफ रहनी चाहिए कि इन श्रेणियों में चिन्हित होना अंतिम रूप से वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने के बराबर नहीं है। लेकिन इतनी बड़ी संख्या में नागरिकों का शक के दायरे में आ जाना अपने आप में एक असाधारण स्थिति है, जिसकी पूरी और स्पष्ट व्याख्या चुनाव आयोग को करनी चाहिए।

बेंगलुरु की तस्वीर सबसे ज्यादा चिंताजनक

इस पूरे मामले की सबसे चिंताजनक तस्वीर बेंगलुरु में दिखाई देती है। चुनावी अधिकारियों के जारी आँकड़ों के मुताबिक शहर के करीब एक करोड़ तीन लाख रजिस्टर्ड वोटरों में से लगभग आधे वोटरों को अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत, डुप्लीकेट या दूसरी श्रेणियों में चिन्हित किया गया है।

यानी बेंगलुरु के लगभग आधे रजिस्टर्ड वोटर इस समय अतिरिक्त जांच के दायरे में हैं।

यह सिर्फ एक आँकड़ा नहीं है। बेंगलुरु देश के सबसे बड़े शहरी, औद्योगिक और रोज़गार केंद्रों में से एक है। यहाँ देश के अलग-अलग हिस्सों और खुद कर्नाटक के अलग-अलग जिलों से लाखों लोग नौकरी, कारोबार और पढ़ाई के लिए आते हैं।

किराए का मकान बदलना, एक इलाके से दूसरे इलाके में जाना, कुछ समय के लिए अपने गाँव लौटना या नौकरी के सिलसिले में घर से बाहर रहना यहाँ आम ज़िंदगी का हिस्सा है। ऐसे शहर में किसी वोटर का घर पर नहीं मिलना इस बात का सबूत नहीं हो सकता कि वह वोटर अब मौजूद ही नहीं है।

यहीं से एक बुनियादी सवाल पैदा होता है—क्या पलायन यानी Migration को चुनावी गैर-मौजूदगी के बराबर समझा जा रहा है?

अगर किसी नागरिक ने अपना मकान बदला है, तो चुनावी कानून में पता बदलने और वोटर रजिस्ट्रेशन को दुरुस्त करने का बाकायदा तरीका मौजूद है।

अगर कोई नौजवान रोज़गार के लिए दूसरे इलाके में गया है, तो इसका मतलब यह नहीं कि उसने अपना वोट देने का हक़ खो दिया।

और अगर घर-घर जांच के दौरान कोई वोटर घर पर मौजूद नहीं था, तो उसकी गैर-मौजूदगी को स्थायी रूप से ‘गायब’ मानने से पहले उचित सत्यापन ज़रूरी है।

कुछ विधानसभा क्षेत्रों में 50 फीसदी से ज्यादा वोटर चिन्हित

बेंगलुरु के आँकड़ों में एक और पहलू चिंता पैदा करता है। कुछ विधानसभा क्षेत्रों में शक के दायरे में आने वाले वोटरों का अनुपात 50 फीसदी से भी ज्यादा बताया गया है।

यहाँ फिर स्पष्ट करना ज़रूरी है कि ये अंतिम रूप से हटाए जाने वाले वोटरों की संख्या नहीं है, बल्कि जांच के लिए चिन्हित किए गए वोटर हैं।

लेकिन सवाल अपनी जगह कायम है—

अगर किसी विधानसभा क्षेत्र में हर दो में से एक से ज्यादा वोटर शुरुआती तौर पर संदिग्ध श्रेणी में आ जाते हैं, तो क्या इसे महज़ सामान्य चुनावी सफाई की प्रक्रिया कहा जा सकता है?

या फिर चुनावी प्रक्रिया, फील्ड वेरिफिकेशन और नागरिकों तक पहुँचने के पूरे सिस्टम का दोबारा जायज़ा लेना ज़रूरी है?

बेंगलुरु के इन असाधारण आँकड़ों को महज़ राजनीतिक नारे के तौर पर नहीं, बल्कि प्रशासनिक जांच के विषय के तौर पर देखा जाना चाहिए।

चुनाव आयोग को यह बताना चाहिए कि इन विधानसभा क्षेत्रों में इतनी ज्यादा संख्या की असल वजह क्या है।

क्या यहाँ Migration ज्यादा है?

क्या किराएदार आबादी का अनुपात अधिक है?

क्या पुरानी वोटर लिस्ट में बड़ी संख्या में पुराने पते मौजूद थे?

क्या घर-घर जांच के दौरान नागरिकों तक पहुँचने में मुश्किल हुई?

या फिर वोटरों को अलग-अलग श्रेणियों में चिन्हित करने की प्रक्रिया में कोई व्यावहारिक कमी सामने आई?

इन सवालों के जवाब सिर्फ भरोसा दिलाने से नहीं, बल्कि आँकड़ों के साथ दिए जाने चाहिए।

हर पाँच में एक वोटर शक के दायरे में क्यों?

कर्नाटक में लगभग 20 प्रतिशत वोटरों के शक के दायरे में आने की तस्वीर और बेंगलुरु में लगभग आधे वोटरों के चिन्हित होने को एक साथ देखें, तो चिंता और बढ़ जाती है।

अगर राज्य के हर पाँच में से एक वोटर और देश के एक बड़े शहरी केंद्र के लगभग हर दूसरे वोटर की चुनावी स्थिति अतिरिक्त जांच के अधीन हो जाए, तो यह सामान्य प्रशासनिक बदलाव नहीं रह जाता।

यहाँ दो संभावनाएँ सामने आती हैं—

या तो पिछली वोटर लिस्ट में बहुत बड़े पैमाने पर खामियाँ थीं,

या फिर मौजूदा जांच प्रक्रिया में ऐसी कमियाँ हैं, जिनकी वजह से बड़ी संख्या में वास्तविक वोटर भी शक के दायरे में आ रहे हैं।

दोनों ही स्थितियों में जवाबदेही और पारदर्शी स्पष्टीकरण ज़रूरी है।

क्या नागरिक से अपने ही वोट का सबूत माँगा जा रहा है?

सबसे बुनियादी सवाल यही है—

क्या SIR का मकसद गलत नामों को तलाश करना है या नागरिकों से अपने सही नाम का सबूत माँगना?

फर्जी नामों को तलाश कर हटाना राज्य की जिम्मेदारी है। लेकिन वर्षों से वोटर लिस्ट में दर्ज किसी योग्य नागरिक को महज़ शक की बुनियाद पर अपनी पात्रता साबित करने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ें, तो इसे प्रशासनिक न्याय का आदर्श मॉडल नहीं कहा जा सकता।

वोटर लिस्ट को दुरुस्त करने का बोझ नागरिक के बुनियादी अधिकार से बड़ा नहीं हो सकता।

कमजोर तबकों पर असर का सवाल

इस पूरे मामले में कमजोर तबकों के सवाल को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

दिहाड़ी मजदूर, किराए के मकान में रहने वाला परिवार, रोज़गार के लिए दूसरे शहर जाने वाला नौजवान, शादी के बाद अपना पता बदलने वाली महिला, बुजुर्ग नागरिक या अनौपचारिक बस्ती में रहने वाला व्यक्ति सरकारी प्रक्रिया के हर चरण में समान सुविधा नहीं रखता।

बेंगलुरु में यह समस्या और जटिल हो जाती है, क्योंकि शहर की बड़ी आबादी स्थायी और अस्थायी Migration के मेल से बनी है।

अगर ऐसे नागरिक को पहले वोटर लिस्ट में शामिल किया जाए, फिर उसे संदिग्ध श्रेणी में रखा जाए और आखिर में अपनी मौजूदगी साबित करने के लिए जटिल प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरना पड़े, तो कागज़ पर मौजूद हक़ और वास्तविक हक़ के बीच एक खतरनाक दूरी पैदा हो सकती है।

गलत नाम रहने और सही नाम हटने का नुकसान बराबर नहीं

वोटर लिस्ट की गलती का नुकसान राज्य और नागरिक के बीच बराबर नहीं बंटता।

अगर कोई फर्जी नाम लिस्ट में रह जाता है, तो उसे बाद में जांच के ज़रिए सुधारा जा सकता है।

लेकिन अगर किसी वास्तविक नागरिक का नाम अंतिम वोटर लिस्ट से बाहर हो जाता है और वह समय पर दावा या आपत्ति दर्ज नहीं करा पाता, तो चुनाव के दिन उसका वोटिंग राइट वापस नहीं लाया जा सकता।

इसलिए चुनावी प्रशासन का मूल सिद्धांत ज्यादा से ज्यादा नाम हटाना नहीं, बल्कि गलत तरीके से योग्य वोटरों के नाम हटने की संभावना को न्यूनतम करना होना चाहिए।

इसी वजह से उन शिकायतों को भी सिर्फ राजनीतिक विरोध कहकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए, जिनमें मौजूदा वोटर लिस्ट में नाम होने के बावजूद Enumeration Form नहीं मिलने, गलत तरीके से दूसरे स्थान पर ट्रांसफर किए जाने या घर पर मौजूद न होने को स्थायी स्थिति मान लिए जाने की शिकायतें सामने आई हैं।

अगर ये सीमित प्रशासनिक गलतियाँ हैं, तो इन्हें तुरंत ठीक किया जाना चाहिए। लेकिन अगर ऐसी शिकायतें बड़े पैमाने पर सामने आ रही हैं, तो चुनाव आयोग को इनका स्वतंत्र और गंभीर जायज़ा लेना चाहिए।

BLO पर दबाव भी एक अहम सवाल

ग्राउंड लेवल पर काम करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों पर अगर फॉर्म वितरण, डेटा एंट्री और वेरिफिकेशन पूरा करने का असामान्य दबाव रहा हो, तो यह भी एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक सवाल है।

वोटर लिस्ट की शुद्धता किसी टारगेट को पूरा करने से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

अगर काम की कामयाबी का पैमाना सिर्फ रफ्तार बन जाए और सही वेरिफिकेशन पीछे छूट जाए, तो गलत चिन्हांकन की संभावना बढ़ सकती है।

ऐसी स्थिति में सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं होगा। पूरे प्रशासनिक सिस्टम की समीक्षा करनी होगी।

2002 के रिकॉर्ड से मिलान कितना निर्णायक?

साल 2002 के पुराने चुनावी रिकॉर्ड से मिलान भी इस SIR का एक अहम हिस्सा है।

करीब 24 साल पुराने रिकॉर्ड में किसी मौजूदा नागरिक की जानकारी पूरी तरह मैच न होना, अपने आप में उसकी मौजूदा चुनावी पात्रता खत्म होने का सबूत नहीं हो सकता।

पुराना रिकॉर्ड वेरिफिकेशन में मददगार हो सकता है, लेकिन उसे मौजूदा नागरिक की पहचान और पात्रता का एकमात्र पैमाना नहीं बनाया जाना चाहिए।

पिछले दो दशकों में लोगों के पते, परिवार, नाम, दस्तावेज़ और सामाजिक परिस्थितियों में बड़े बदलाव हुए हैं। चुनावी प्रशासन को इस वास्तविकता का ध्यान रखना होगा।

17 अगस्त तक बढ़ी घर-घर जांच की अवधि

इस संदर्भ में घर-घर जांच की अवधि को 17 अगस्त तक बढ़ाया जाना एक अहम कदम है।

नए शेड्यूल के मुताबिक—

  • 24 अगस्त: ड्राफ्ट वोटर लिस्ट का प्रकाशन
  • 24 अगस्त से 23 सितंबर: दावे और आपत्तियाँ दर्ज करने की अवधि
  • 27 अक्टूबर: अंतिम वोटर लिस्ट का प्रकाशन

यह अतिरिक्त समय महज़ प्रशासनिक मोहलत नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे सुधार के मौके के तौर पर इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

खासकर बेंगलुरु में, जहाँ लाखों वोटर संदिग्ध श्रेणी में चिन्हित किए गए हैं, हर विधानसभा क्षेत्र में विशेष सहायता केंद्र, साफ जानकारी, स्थानीय भाषा में मार्गदर्शन और शिकायतों के तेजी से समाधान की व्यवस्था होनी चाहिए।

हर नागरिक को यह पता होना चाहिए कि उसका नाम किस श्रेणी में और क्यों आया है, उसे किस अधिकारी से संपर्क करना है और अगर गलत चिन्हांकन हुआ है तो उसे कैसे ठीक कराया जा सकता है।

असली परीक्षा ड्राफ्ट लिस्ट के बाद होगी

अब असली परीक्षा ड्राफ्ट वोटर लिस्ट के प्रकाशन के बाद होगी।

अगर एक करोड़ से ज्यादा चिन्हित किए गए लोगों में बड़ी संख्या दोबारा सत्यापन के बाद वोटर लिस्ट में शामिल हो जाती है, तो यह संकेत होगा कि शुरुआती चिन्हांकन का बड़ा हिस्सा एहतियाती जांच का नतीजा था।

लेकिन अगर इन लोगों में से बड़ी संख्या ड्राफ्ट या अंतिम सूची से बाहर रह जाती है, तो मौजूदा प्रक्रिया, ग्राउंड वेरिफिकेशन और प्रशासनिक निगरानी पर कहीं ज्यादा गंभीर सवाल उठेंगे।

चुनावी नतीजों पर पड़ सकता है असर

और यही मामला आने वाले चुनावों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

किसी चुनावी क्षेत्र में कुछ हजार वोट भी नतीजा बदल सकते हैं।

बेंगलुरु के कुछ विधानसभा क्षेत्रों में अगर संदिग्ध वोटरों की मौजूदा संख्या का सिर्फ एक हिस्सा भी अंतिम रूप से वोटर लिस्ट से बाहर हो जाता है, तो चुनावी मुकाबले का संतुलन प्रभावित हो सकता है।

यह दावा करना सही नहीं होगा कि इस प्रक्रिया से निश्चित रूप से किसी खास राजनीतिक पार्टी को फायदा या नुकसान होगा, क्योंकि चिन्हित वोटरों की राजनीतिक पसंद का कोई प्रमाणित रिकॉर्ड मौजूद नहीं है।

लेकिन यह बात स्पष्ट है कि बड़ी संख्या में योग्य वोटरों का नाम हटना चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है, खासकर उन सीटों पर जहाँ जीत और हार का फैसला कुछ हजार वोटों से होता है।

राजनीतिक असर भी सामने आ सकता है

इसका एक राजनीतिक असर भी हो सकता है।

अब राजनीतिक पार्टियों का ध्यान सिर्फ वोट माँगने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वोटर लिस्ट की निगरानी, नामों के वेरिफिकेशन और दावे-आपत्तियों की प्रक्रिया तक फैल सकता है।

अगर किसी राजनीतिक दल को लगे कि उसके पारंपरिक समर्थन वाले इलाकों में बड़ी संख्या में वोटर संदिग्ध या बाहर किए जा रहे हैं, तो वह इसे चुनावी मुद्दा बना सकता है।

इससे चुनावी माहौल और ज्यादा राजनीतिक और विवादित हो सकता है।

इससे भी ज्यादा गंभीर स्थिति तब होगी, जब आम नागरिकों में यह एहसास पैदा हो जाए कि चुनाव लड़ने और वोट डालने से पहले ही उनके राजनीतिक अधिकार का फैसला प्रशासनिक लिस्ट के जरिए किया जा रहा है।

चुनाव आयोग को क्या स्पष्ट करना चाहिए?

इसीलिए चुनाव आयोग के लिए सिर्फ यह बताना काफी नहीं होगा कि कितने नाम संदिग्ध या चिन्हित किए गए हैं।

उसे श्रेणीवार, जिला-वार और विधानसभा क्षेत्र-वार आँकड़े पारदर्शी तरीके से सामने रखने चाहिए।

यह स्पष्ट होना चाहिए कि—

  • कितने वोटर अनुपस्थित पाए गए?
  • कितने स्थानांतरित हो चुके हैं?
  • कितने मृत पाए गए?
  • कितने डुप्लीकेट एंट्री में आए?
  • कितने अन्य श्रेणियों में चिन्हित हुए?
  • कितने नाम दोबारा शामिल किए गए?
  • और कितने नाम वास्तव में हटाने की सिफारिश की गई?

खासकर बेंगलुरु के उन विधानसभा क्षेत्रों, जहाँ असामान्य रूप से ज्यादा वोटर चिन्हित किए गए हैं, वहाँ अलग से विस्तृत स्पष्टीकरण दिया जाना चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस नागरिक का नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में नहीं है, उसे प्रभावी सूचना और आसान तरीके से दावा या आपत्ति दर्ज कराने का मौका मिलना चाहिए।

नागरिक को अपने ही वोट के अधिकार के लिए राज्य के सामने किसी आरोपी की तरह खड़ा नहीं होना चाहिए।

लोकतंत्र में नागरिक सिर्फ एक संख्या नहीं

अल्लामा इकबाल का मशहूर शेर है—

“जम्हूरियत एक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिसमें
बंदों को गिनते हैं, तौला नहीं करते।”

यह शेर यहाँ सिर्फ राजनीतिक तंज़ के तौर पर नहीं, बल्कि लोकतंत्र के एक बुनियादी सिद्धांत की याद दिलाता है।

वोटर लिस्ट में नागरिकों की गिनती ज़रूरी है, लेकिन हर नागरिक को सिर्फ एक संख्या समझ लेना लोकतंत्र की रूह के साथ इंसाफ नहीं होगा।

हर नाम के पीछे एक इंसान है, एक नागरिक है और एक संवैधानिक अधिकार है।

असली कामयाबी क्या होगी?

इसलिए कर्नाटक में जारी SIR के बारे में साफ रुख यही होना चाहिए कि फर्जी, मृत और डुप्लीकेट नामों की सफाई ज़रूर हो, लेकिन इसकी कीमत किसी एक भी योग्य नागरिक के वोटिंग राइट की कुर्बानी के रूप में नहीं होनी चाहिए।

एक करोड़ दस लाख से ज्यादा नागरिकों का संदिग्ध श्रेणी में पहुँच जाना अपने आप में इतना बड़ा आँकड़ा है कि इसे सामान्य चुनावी प्रक्रिया कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

और जब इसी प्रक्रिया में बेंगलुरु जैसे शहर के लगभग आधे वोटर भी जांच के दायरे में आ जाएँ, तो मामला और गंभीर हो जाता है।

अगर लगभग 20 प्रतिशत वोटरों के संभावित बाहर होने का अंदेशा बड़े पैमाने पर वास्तविक निष्कासन में बदल जाता है, तो यह सिर्फ वोटर लिस्ट में बदलाव नहीं होगा।

यह चुनावी प्रतिनिधित्व, राजनीतिक संतुलन और जनता के चुनावी भरोसे में एक बड़ा बदलाव होगा।

इसके उलट अगर ड्राफ्ट और अंतिम सूची के चरणों में बड़ी संख्या में वास्तविक वोटर दोबारा शामिल हो जाते हैं और हर नाम हटाने का फैसला भरोसेमंद ग्राउंड वेरिफिकेशन के बाद होता है, तो यही प्रक्रिया चुनावी सिस्टम की सफाई और सुधार का प्रभावी माध्यम साबित हो सकती है।

अब जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है कि वह इस चिंता को सिर्फ आश्वासनों से नहीं, बल्कि पारदर्शी आँकड़ों, भरोसेमंद वेरिफिकेशन, प्रभावी आपत्ति प्रक्रिया और समय पर सुधार के ज़रिए दूर करे।

वोटर लिस्ट को साफ-सुथरा बनाना लोकतंत्र की सेवा है।

लेकिन योग्य नागरिक का नाम वोटर लिस्ट में सुरक्षित रखना उससे भी बड़ी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है।

आखिरकार असली कामयाबी यह नहीं होगी कि कितने नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए।

असली कामयाबी यह होगी कि कितने गैर-हकदार नाम सही तरीके से हटाए गए और कितने योग्य नागरिकों का वोट देने का अधिकार पूरी जिम्मेदारी के साथ सुरक्षित रखा गया।

कर्नाटक और खासकर बेंगलुरु का मौजूदा अनुभव इसी बुनियादी सवाल का जवाब देगा—

क्या SIR चुनावी लिस्ट को ज्यादा सही और भरोसेमंद बनाता है, या फिर एक आम नागरिक को अपने ही लोकतांत्रिक अधिकार के लिए एक नई परीक्षा से गुजरना पड़ता है?

लेखक: अब्दुल हलीम मंसूर

Source: Haqeeqat Times