क़ौमों की तक़दीर किताबों से नहीं, तरबियतयाफ़्ता इंसानों से बदलती है
इंसानी तहज़ीब की तारीख़ पर नज़र डालें तो मालूम होता है कि क़ौमों की तामीर सिर्फ़ इमारतों, सड़कों और मआशी तरक़्क़ी से नहीं होती, बल्कि असल तरक़्क़ी इंसान की सोच, फ़िक्र और किरदार की तामीर से होती है। और इंसान की इस तामीर में जिस शख़्सियत का किरदार सबसे अहम होता है, वह उस्ताद है।
उस्ताद वह शख़्स है जो इल्म की रौशनी से जहालत के अंधेरों को दूर करता है, सोचने का सलीक़ा सिखाता है, किरदार को सँवारता है और एक फ़र्द को ज़िम्मेदार शहरी बनाने में बुनियादी किरदार अदा करता है। इसी लिए उस्ताद को बजा तौर पर मआमार-ए-क़ौम कहा जाता है।
हर साल 5 सितंबर को हिंदुस्तान में यौम-ए-असातिज़ा मनाया जाता है। यह दिन महान फ़लसफ़ी, माहिर-ए-तालीम और हिंदुस्तान के साबिक़ सदर-ए-जम्हूरिया डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की पैदाइश की मुनासिबत से मनाया जाता है। डॉ. राधाकृष्णन का यक़ीन था कि तालीम इंसानी शख़्सियत की तकमील का ज़रिया है। उनके यौम-ए-पैदाइश को यौम-ए-असातिज़ा के तौर पर मनाया जाना मुल्क में असातिज़ा की ख़िदमात और मक़ाम के एतराफ़ की अलामत है।
इंसानी ज़िंदगी में इल्म की अहमियत मुसल्लम है और इस्लाम ने भी इल्म को ग़ैर-मामूली अहमियत दी है। क़ुरआन-ए-करीम की पहली वह़्यी ही “इक़रा”, यानी “पढ़ो”, के हुक्म से शुरू होती है। क़ुरआन-ए-करीम इंसान को इल्म की तरफ़ मुतवज्जेह करते हुए फ़रमाता है:
“क्या जानने वाले और न जानने वाले बराबर हो सकते हैं?”
इल्म की फ़ज़ीलत उस वक़्त मुकम्मल होती है जब उसे आगे पहुँचाया जाए। उस्ताद इसी अमल का अहम तरीन ज़रिया है। वह इल्म को एक नस्ल से दूसरी नस्ल तक पहुँचाता है और इंसानी शऊर को तरक़्क़ी देता है।
हज़रत मुहम्मद ﷺ ने ख़ुद को तालीम देने वाला बताया। आपकी पूरी ज़िंदगी इंसानों की तालीम और तरबियत का अमली नमूना है। आपने सिर्फ़ इल्मी मसाइल नहीं सिखाए, बल्कि अख़लाक़, मुहब्बत, सब्र, बर्दाश्त, अद्ल, मुसावात और इंसानियत का भी दर्स दिया। इस एतबार से उस्ताद का असल मंसब सिर्फ़ किताब पढ़ाना नहीं, बल्कि इंसान बनाना है।
जब एक उस्ताद अपने शागिर्द के अंदर इल्म के साथ अख़लाक़, एहसास-ए-ज़िम्मेदारी और इंसानियत का जज़्बा पैदा करता है तो वह दरअसल एक बेहतर मुआशरे की बुनियाद रखता है।
हज़रत अली (रज़ि.) से मंसूब मशहूर क़ौल है:
“जिसने मुझे एक हर्फ़ भी सिखाया, मैं उसका ग़ुलाम हूँ।”
अगरचे इस क़ौल की निस्बत के बारे में अहल-ए-इल्म के दरमियान कलाम मिलता है, लेकिन इसमें पोशीदा मफ़हूम उस्ताद और इल्म के अज़ीम मक़ाम को वाज़ेह करता है।
उस्ताद और तालिब-ए-इल्म का रिश्ता सिर्फ़ क्लासरूम तक महदूद नहीं होना चाहिए। एक हक़ीक़ी उस्ताद अपने शागिर्द के अंदर मौजूद सलाहियतों को दरयाफ़्त करता है, उसकी कमज़ोरियों को समझता है और उसे बेहतर मुस्तक़बिल के लिए तैयार करता है।
कभी उस्ताद की एक नसीहत, कभी उसकी हौसला-अफ़ज़ाई और कभी उसकी सख़्ती भी तालिब-ए-इल्म की ज़िंदगी में फ़ैसला-कुन किरदार अदा कर सकती है। बहुत से कामयाब अफ़राद अपनी कामयाबी का सेहरा अपने असातिज़ा के सर बाँधते हैं।
एक अच्छा उस्ताद तालिब-ए-इल्म को सिर्फ़ यह नहीं बताता कि क्या सोचना है, बल्कि यह सिखाता है कि कैसे सोचना है। यही तालीम और असल तरबियत के दरमियान फ़र्क़ है।
उस्ताद की शख़्सियत ख़ुद एक ख़ामोश निसाब होती है। तालिब-ए-इल्म उस्ताद की गुफ़्तगू, रवैये, वक़्त की पाबंदी, दियानतदारी, शाइस्तगी और दूसरों के साथ उसके सुलूक से भी बहुत कुछ सीखते हैं। इसलिए उस्ताद के लिए ज़रूरी है कि वह अपने किरदार को भी उतना ही अहम समझे जितना अपने मज़मून को।
एक उस्ताद की शख़्सियत में इल्म और अमल का इम्तिज़ाज हो तो उसके असरात सिर्फ़ एक जमात तक महदूद नहीं रहते, बल्कि कई नस्लों तक पहुँचते हैं।
अल्लामा इक़बाल ने तालीम और तरबियत को इंसानी शख़्सियत की तामीर का बुनियादी ज़रिया क़रार दिया। उनके नज़दीक तालीम का मक़सद महज़ मालूमात हासिल करना नहीं, बल्कि ऐसी शख़्सियत पैदा करना है जो ख़ुद-एतमादी, ख़ुदी, बुलंद हौसली और अमल की क़ुव्वत से मालामाल हो।
इक़बाल ने नौजवानों को शाहीन की मिसाल देते हुए उन्हें बुलंद-परवाज़ी, ख़ुददारी और मुसलसल जद्दोजहद का पैग़ाम दिया। उस्ताद का काम भी यही है कि वह तालिब-ए-इल्म के अंदर छुपी हुई क़ुव्वत को पहचाने और उसे बुलंद मक़ासिद की तरफ़ मुतवज्जेह करे।
इक़बाल का यह शेर आज भी हमारी तालीमी फ़िक्र की रहनुमाई करता है—
“अफ़राद के हाथों में है अक़वाम की तक़दीर
हर फ़र्द है मिल्लत के मुक़द्दर का सितारा।”
अगर अफ़राद क़ौम की तक़दीर बदल सकते हैं तो उन अफ़राद की फ़िक्री और अख़लाक़ी तरबियत करने वाले असातिज़ा का किरदार भी ग़ैर-मामूली अहमियत रखता है।
आज का दौर इंफ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी का दौर है। इंटरनेट, मोबाइल फ़ोन, सोशल मीडिया और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस ने इल्म तक रसाई को पहले से कहीं आसान बना दिया है। आज तालिब-ए-इल्म चंद लम्हों में दुनिया के किसी भी हिस्से से मालूमात हासिल कर सकता है।
ऐसे माहौल में कभी-कभी यह सवाल उठता है कि जब मालूमात हर जगह मौजूद हैं तो उस्ताद की ज़रूरत क्या रह गई है?
हक़ीक़त यह है कि मालूमात की फ़रावानी ने उस्ताद की अहमियत कम नहीं की, बल्कि उसे और बढ़ा दिया है। आज तालिब-ए-इल्म के सामने मालूमात का एक वसीअ समंदर है, मगर हर मालूमात दुरुस्त नहीं होती। उस्ताद उसे मालूमात और इल्म, हक़ीक़त और अफ़वाह, तहक़ीक़ और सतही मुतालआ के दरमियान फ़र्क़ समझाता है।
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस जवाब दे सकती है, लेकिन उस्ताद तालिब-ए-इल्म को यह सिखाता है कि सवाल कैसे पैदा किया जाए, जवाब को कैसे परखा जाए और इल्म को इंसानी भलाई के लिए कैसे इस्तेमाल किया जाए।
इसलिए आज का उस्ताद सिर्फ़ मुअल्लिम नहीं, बल्कि रहनुमा, मुर्ब्बी, मुहक़्क़िक़ और फ़िक्री साथी भी है।
मौजूदा दौर में उस्ताद को कई चैलेंजों का सामना है। तालिब-ए-इल्म की बदलती हुई ज़ेहनियत, सोशल मीडिया का बढ़ता हुआ असर, तालीमी मुसाबक़त, निसाब का दबाव, टेक्नोलॉजी में तेज़ी से होने वाली तब्दीलियाँ और इंतिज़ामी ज़िम्मेदारियाँ तदरीस के अमल को पहले से ज़्यादा पेचीदा बना रही हैं।
ख़ास तौर पर आला तालीम के शोबे में उस्ताद से तदरीस के साथ तहक़ीक़, मक़ाला-नवीसी, सेमिनार, इम्तिहानी उमूर, तालिब-ए-इल्म की रहनुमाई और दीगर कई ज़िम्मेदारियाँ निभाने की तवक़्क़ो की जाती है।
ऐसे में असातिज़ा को मुनासिब वसाइल, तहक़ीक़ी सहूलियात और पेशेवराना तर्बियत फ़राहम करना वक़्त की अहम ज़रूरत है।
अगर हम उस्ताद से बेहतरीन कारकर्दगी की तवक़्क़ो रखते हैं तो हमें उस्ताद के मसाइल को भी समझना होगा। एक मुतमइन, बा-वक़ार और बा-इख़्तियार उस्ताद ही पूरी यकसूई के साथ नई नस्ल की तरबियत कर सकता है।
उस्ताद की इज़्ज़त, उसके पेशेवराना वक़ार और उसकी इल्मी ज़रूरतों का ख़याल रखना दरअसल मुल्क के मुस्तक़बिल में सरमायाकारी के मुतरादिफ़ है।
यौम-ए-असातिज़ा के मौक़े पर तालीमी इदारों में मुख़्तलिफ़ तक़ारीब मुनअक़िद की जाती हैं। तालिब-ए-इल्म अपने असातिज़ा को फूल पेश करते हैं, मुबारकबाद देते हैं और उनकी ख़िदमात का एतराफ़ करते हैं। यह एक ख़ूबसूरत रिवायत है, लेकिन यौम-ए-असातिज़ा का मक़सद सिर्फ़ एक दिन उस्ताद को याद करना नहीं होना चाहिए।
असल ज़रूरत यह है कि पूरे साल उस्ताद की इज़्ज़त, वक़ार और हुक़ूक़ का ख़याल रखा जाए। उस्ताद की इज़्ज़त सिर्फ़ उस वक़्त नहीं होनी चाहिए जब वह हमें इम्तिहान में नंबर दे रहा हो, बल्कि उस वक़्त भी होनी चाहिए जब वह हमारी ग़लती की इस्लाह कर रहा हो।
आज की नई नस्ल ज़हीन, सलाहियत-मंद और सवाल करने वाली नस्ल है। उसे महज़ अहकाम नहीं, बल्कि दलील, मुकालमे और रहनुमाई की ज़रूरत है। मौजूदा उस्ताद के लिए ज़रूरी है कि वह तालिब-ए-इल्म के सवालों को अहमियत दे और उसके अंदर तहक़ीक़ व जस्तजू की रूह पैदा करे।
ऐसा तालीमी माहौल क़ायम किया जाना चाहिए जहाँ तालिब-ए-इल्म सवाल करने से न घबराए, अपनी राय का इज़हार कर सके और इख़्तिलाफ़-ए-राय को तहज़ीब के दायरे में समझना सीखे। यही तालीम एक सेहतमंद और बा-शऊर मुआशरे की बुनियाद बनती है।
किसी भी मुआशरे की तरक़्क़ी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि वहाँ इल्म और अहल-ए-इल्म को कितना एहतिराम हासिल है। जिस मुआशरे में उस्ताद की इज़्ज़त होती है, वहाँ तालीम को भी इज़्ज़त हासिल होती है। और जहाँ तालीम को अहमियत दी जाती है, वहाँ तरक़्क़ी के इमकानात ज़्यादा रौशन होते हैं।
हमें अपने बच्चों को यह सिखाने की ज़रूरत है कि उस्ताद सिर्फ़ एक मज़मून पढ़ाने वाला शख़्स नहीं, बल्कि उनकी शख़्सियत की तामीर में शरीक एक अहम रहनुमा है। उस्ताद की इज़्ज़त दरअसल इल्म, तरबियत और मुस्तक़बिल की इज़्ज़त है।
उस्ताद वह चराग़ है जो ख़ुद जलकर दूसरों को रौशनी फ़राहम करता है। वह एक तालिब-ए-इल्म को सिर्फ़ किताब के हुरूफ़ नहीं पढ़ाता, बल्कि उसे ज़िंदगी का मतलब समझने की सलाहियत भी देता है। उसके अल्फ़ाज़ क्लासरूम की चारदीवारी से निकलकर शागिर्द की पूरी ज़िंदगी में सफ़र करते हैं।
आज जब दुनिया तेज़ी से तब्दील हो रही है, टेक्नोलॉजी इंसानी ज़िंदगी के हर शोबे में दाख़िल हो रही है और इल्म के ज़राए लगातार बढ़ रहे हैं, ऐसे वक़्त में उस्ताद का असल किरदार और भी अहम हो गया है।
हमें ऐसे असातिज़ा की ज़रूरत है जो इल्म के साथ किरदार, टेक्नोलॉजी के साथ अख़लाक़ और कामयाबी के साथ इंसानियत का दर्स दें।
यौम-ए-असातिज़ा दरअसल हमें यह याद दिलाता है कि हमारी कामयाबी के पीछे किसी न किसी उस्ताद की मेहनत ज़रूर शामिल होती है। इसलिए आज के दिन अपने तमाम असातिज़ा को ख़िराज-ए-तहसीन पेश करते हुए हमें यह अहद करना चाहिए कि हम उनसे हासिल किए हुए इल्म को अपनी ज़ात तक महदूद नहीं रखेंगे, बल्कि उसे मुआशरे की बेहतरी और इंसानियत की ख़िदमत के लिए इस्तेमाल करेंगे।
उस्ताद सिर्फ़ मुस्तक़बिल नहीं बनाता, वह मुस्तक़बिल को सोचने का सलीक़ा अता करता है।
तमाम असातिज़ा-ए-किराम को यौम-ए-असातिज़ा के मौक़े पर दिल की गहराइयों से सलाम, ख़िराज-ए-तहसीन और नेक तमन्नाएँ।
लेखिका : तहसीना माविनकटी (ताशा रानी बनूरी)
Source: Haqeeqat Times

