1958 में दिल्ली विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में नेहरू के भाषण में परमाणु भौतिकी है, आइंस्टाइन हैं, औद्योगिक क्रांति है, पूंजीवाद और साम्यवाद हैं, सामाजिक न्याय है, भारतीय संस्कृति है और आधुनिक तकनीकी सभ्यता के कारण पैदा होने वाला आध्यात्मिक संकट है. वहीं नरेंद्र मोदी का डीयू में दिया भाषण ‘वेव’, ‘इम्पैक्ट’, ‘टारगेट’, ‘नाराज़ फूफा’, ‘दिमागी नक्सल’, ‘फ्लैस’, ‘ओजी’ और राजनीतिक चुटकुलों के सहारे आगे बढ़ता है.

 

जवाहरलाल नेहरू ने एक भाषण 6 दिसंबर 1958 को दिल्ली विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में दिया था. उस समय वे 69 वर्ष के थे. नरेंद्र मोदी ने 5 सितंबर 2026 को दिल्ली विश्वविद्यालय के ही श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के शताब्दी समारोह में एक भाषण दिया. इस समय मोदी 75 वर्ष के हैं.

दोनों भाषण विद्यार्थियों के बीच दिए गए. नेहरू के सामने बैठै विद्यार्थी निर्माण पीढ़ी के थे जबकि मोदी भारतीय जेन ज़ी को संबोधित कर रहे थे. दोनों के भाषणों की लंबाई भी लगभग समान है, नेहरू का अंग्रेजी भाषण में 3,900 तो मोदी का हिंदी भाषण लगभग 3100 शब्दों का है.

दोनों ने ये भाषण उम्र के उस पड़ाव पर दिए, जहां किसी राजनेता के पास अपने समय, समाज और अगली पीढ़ी को देने के लिए केवल उत्साहवर्धक नारों से कुछ अधिक होने की अपेक्षा की जा सकती है. खासकर तब, जब सामने विश्वविद्यालय के विद्यार्थी हों.

नेहरू उस पीढ़ी के व्यक्ति थे जिसे मोटे तौर पर भारत की स्वदेशी पीढ़ी कहा जा सकता है. वह पीढ़ी औपनिवेशिक शासन में पैदा हुई, राष्ट्रीय आंदोलन के बीच बड़ी हुई और उसने स्वतंत्रता के लिए राजनीतिक संघर्ष किया. नेहरू स्वयं इस भाषण में कहते हैं कि उनकी पीढ़ी मूलतः ‘भारत के गांधी युग के लोगों’ की थी. इस पीढ़ी ने विदेशी शासन देखा, उसके विरुद्ध संघर्ष किया, स्वतंत्रता हासिल की और विभाजन तथा आजादी-दोनों को अपनी आंखों से देखा.

मोदी देश की आजादी के तीन वर्ष बाद पैदा हुए. उनकी पीढ़ी को अंग्रेजों से देश छीनना नहीं था; उसे आजाद देश की संस्थाओं, अर्थव्यवस्था और समाज को आगे बनाना था. मोदी के पास नेहरू की तुलना में बहुत अधिक लंबा स्वतंत्र भारत उपलब्ध था. उनके सामने भारत की सफलताओं और असफलताओं का सात दशकों से अधिक का अनुभव, लोकतंत्र की संस्थाएं, औद्योगीकरण, हरित क्रांति, विज्ञान, शिक्षा, सामाजिक आंदोलनों और आर्थिक परिवर्तनों का विशाल इतिहास मौजूद था.

लेकिन दोनों के इन भाषणों को पढ़कर उलटा अनुभव होता है.

आत्मप्रचार के बरक्स अंतर की स्वीकार्यता

69 वर्षीय नेहरू का भाषण अपने समय से आगे देखने की बेचैनी से भरा है. 75 वर्षीय मोदी का भाषण अपने शासन की उपलब्धियों के आत्मप्रचार की बेचैनी से. नेहरू अपनी सीमाओं, प्रश्नों और भविष्य की अनिश्चितताओं से बात शुरू करते हैं. जबकि मोदी अपने प्रभाव, उपलब्धियों और अपने नेतृत्व की महानता के बखान से. नेहरू युवाओं को अपने से आगे जाने वाली पीढ़ी मानते हैं; मोदी उन्हें मुख्यतः अपने शासन की उपलब्धियों का श्रोता बनाते हैं. एक भाषण युवाओं की बुद्धि को चुनौती देता है, दूसरा उनसे अपनी सफलता की स्वीकृति चाहता है.

यहां हम दोनों के भाषणों कुछ अंश देखेंगे, ताकि इस फर्क को बेहतर तरीके से समझा जा सके. नेहरू उपरोक्त भाषण के आरंभ में ही अपने और युवाओं के बीच की दूरी स्वीकार करते हुए कहते हैं:

मेरे लिए आपकी (नई पीढ़ी की) सोच के साथ तालमेल बिठाना आसान नहीं है, जैसे आपके लिए अपने को मेरी जगह रखकर देखना कठिन होता होगा.

यह किसी ऐसे व्यक्ति का स्वर है जो उम्र और सत्ता के बावजूद यह मानता है कि नई पीढ़ी का संसार उससे अलग है और संभव है कि वह उसे पूरी तरह न समझता हो.

जबकि उसी जगह मोदी उसी स्वयं अपने पुराने भाषण के प्रभाव का बखान करते हैं. प्रधानमंत्री बनने से पहले 2013 में उसी कॉलेज में दिए अपने भाषण को याद करते हुए वे कहते हैं:

वो भाषण, मैं कह सकता हूं, उसकी एक वेव बन गई थी, एक आंदोलन बन गया था. और आज भी 13-14 साल के बाद उस सभा का, उस संबोधन का इम्पैक्ट बरकरार है.

इसके बाद वे बताते हैं कि उन्होंने उन सपनों को जिया और देश के लिए स्वयं को खपा दिया. यह अंतर मामूली नहीं है. नेहरू युवाओं के सामने अपनी सीमाओं से शुरुआत करते हैं. मोदी अपनी महत्ता से.

मोदी के यह स्वर पूरे भाषण में बना रहा. जनधन योजना के प्रसंग में मोदी कहते हैं:

लेकिन ये मोदी है. माई-बाप कल्चर पसंद करने वालों के सामने चट्टान की तरह खड़ा रहता है.

और आगे:

मैं हिम्मत रखता हूं, इसलिए उस दिन जो कहा था, आज उसका रिपोर्ट कार्ड लेकर आपके सामने आया हूं.

रक्षा उत्पादन की चर्चा में वे फिर स्वयं को विषय बनाते हैं:

मैं छोटे और आसान टारगेट लेने वाला व्यक्ति नहीं हूं. मैं देश के लिए बड़े लक्ष्य तय करता हूं और उनको अचीव करने में अपनी पूरी जिंदगी खपा देता हूं.

यह देश की उपलब्धियों की कथा नहीं है बल्कि एक व्यक्ति यानी स्वयं मोदी की महानता की कथा उन्हीं की जुबानी है. आत्ममुग्ध से अधिक आत्मप्रचारात्मक. जैसे सब्जी बाजार में सब्जी वाला अपनी सब्जियों प्रशंसा में हांक लगाता है, ताकि लोग उसके आसपास आएं और उसका माल बिके.

नेहरू इसके लगभग उलट जगह खड़े हैं. दिल्ली के हजारों वर्षों के इतिहास को याद करते हुए वे कहते हैं:

अनगिनत पीढ़ियों का कारवां हमारी आंखों के सामने से गुजरता है. मेरी अपनी पीढ़ी भी उस कारवां में शामिल हो जाएगी.

और फिर युवाओं से कहते हैं:

तब, नौजवान स्त्री-पुरुषो, उन सभी अच्छे उद्देश्यों का ध्वज आपको संभालना होगा जिनके लिए हम जिए हैं और जिन्हें हम पाना चाहते हैं.

एक तरफ ‘मैं मोदी हूं, मैं विशिष्ट हूं, मैं ही वर्तमान, मैं ही भविष्य हूं की हांक’ है तो दूसरी तरफ नेहरू कि यह विनम्रता कि ‘मेरी अपनी पीढ़ी भी उस कारवां में शामिल हो जाएगी.’ इससे दोनों भाषणों की पूरी मानसिक संरचना को देखा जाना चाहिए.

नेहरू के यहां व्यक्ति छोटा है, इतिहास बड़ा है. जबकि मोदी इतिहास को अपनी कथित उपलब्धियों का मंच घोषित करते हैं.

नेहरू कहते हैं:

महान उद्देश्यों से जुड़ने पर ही जीवन महान बनता है.

मोदी कहते हैं कि वे स्वयं बड़े लक्ष्य तय करते हैं और उन्हें हासिल करने में पूरी जिंदगी लगा देते हैं. एक में महानता उद्देश्य से आती है; दूसरे में महानता वक्ता की अपने बड़प्पन और जिद का बखान बन जाती है.

इससे भी बड़ा अंतर इस बात में है कि दोनों अपनी असहमति से कैसे पेश आते हैं. नेहरू मार्क्सवाद से सहमत नहीं थे. इस भाषण में वे उसकी हिंसा और व्यक्ति के दमन की साफ आलोचना करते हैं. फिर भी वे यह समझने की कोशिश करते हैं कि करोड़ों लोग उसकी ओर क्यों आकर्षित हुए. वे कहते हैं:

मेरा खयाल है कि करोड़ों लोगों के लिए मार्क्सवाद का बुनियादी आकर्षण वैज्ञानिक सिद्धांत प्रस्तुत करने के उसके प्रयास में नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के प्रति उसकी उत्कट निष्ठा में था.

यह किसी विरोधी विचार से सहमत होना नहीं है. यह उसे गंभीरता से लेना है. अपने विरोधी के भीतर भी किसी नैतिक आकांक्षा को पहचान सकना बौद्धिक आत्मविश्वास का चिह्न है. दूसरी ओर, मोदी अपने विरोधियों के देशद्रोही होने का संकेत करते हैं. वैचारिक विरोधियों के एक हिस्से के लिए वे कहते हैं: ‘दिमागी नक्सल.’

फिर विरोध को बीमारी और स्वयं को उपचारकर्ता के रूपक में रखते हुए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को होम्योपैथी की गोली कहते हैं, बीमारी के भड़कने और इलाज शुरू होने (करने?) की बात करते हैं.

नेहरू अपने भाषण में असहमति के बारे में कहते हैं:

विचारधाराओं के बीच सहअस्तित्व आवश्यक हो गया है.

आगे वे कहते हैं: ‘हमें अपने मत और विचार दूसरों पर थोपने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.’

नेहरू यह भी कहते हैं कि विरोधी समाजों के लगातार संघर्ष में फंसे रहने से ‘एक-दूसरे से धीरे-धीरे सीखने और उसे आत्मसात करने’ की प्रक्रिया रुक जाती है.

मोदी कहते हैं कि उनके शासनकाल से पहले पाकिस्तान का हौसला बढा हुआ था, जबकि आज ‘पाकिस्तान कोई नापाक हरकत करता है, तो भारत की सेनाएं घर में घुसकर मारती हैं.’ गोया हमारे देश की मौजूदा समस्याओं के लिए पाकिस्तान जिम्मेवार हो.

जबकि नेहरू विद्यार्थियों से श्रम करने के लिए आह्वान करते हुए कहते हैं कि हमें ‘उस संकीर्ण राष्ट्रवाद के आगे नहीं झुकना होगा, जिसके लिए आज की दुनिया में कोई जगह नहीं और जो हमारे ऊंचे आदर्शों से मेल नहीं खाता.’

इस अंतर को शायद अधिक व्याख्या की आवश्यकता नहीं है.

विरोध का उपहास

उपरोक्त भाषण में मोदी की भाषा और भी नीचे उतरती है.

मोदी सरकारी नीतियों और परियोजनाओं पर सवाल उठाने वाले लोगों को युवाओं के सामने दूसरी ‘स्पीशीज़’ बताते हैं. वे कहते हैं कि:

दूसरी स्पीशीज़ ऐसी होती है कि कोई भी काम शुरू हो, वो ‘नाराज़ फूफा’ बन जाते हैं.

मोदी अपने आलाेचकों का मजाक उड़ाते हुए कहते हैं फूफा जी लोगों का स्थायी सवाल होता है कि ‘इसकी क्या जरूरत है?’ वे शिकायत करते हैं कि उनके आलोचक ‘फूफा जी’ लोग फलां प्रतिमा सरकार ने क्यों बनाई, फलां योजना क्यों लागू की जैसे सवाल पूछते हैं.

किसी सार्वजनिक परियोजना के बारे में ‘इसकी क्या जरूरत है?’ पूछना लोकतंत्र का एक बुनियादी प्रश्न है. उसकी लागत कितनी है? प्राथमिकता क्या होनी चाहिए? उससे किसे लाभ होगा? क्या वही पैसा कहीं और बेहतर ढंग से खर्च किया जा सकता था?

यही तो वे सवाल हैं, जिन्हें उठाना विपक्ष, बुद्धिजीवियों और पत्रकारों का काम है. विश्वविद्यालय तो खास तौर पर ऐसी जगह है जहां इन प्रश्नों निर्माण होना चाहिए. मोदी इन प्रश्नों का उत्तर देने के बजाय प्रश्न पूछने वाले को ‘नाराज़ फूफा’ बना देते हैं.

एक प्रधानमंत्री अपने से विपरीत विचार से भी कुछ सीखने की संभावना देख रहा है. दूसरा अपने वैचारिक विरोधी को बीमारी में बदल रहा है. एक विरोधी विचार का सबसे अच्छा तर्क खोजने की कोशिश करता है; दूसरा विरोधी के लिए सबसे अच्छा उपहास खोजता है. यही वह जगह है जहां मोदी का भाषण केवल राजनीतिक रूप से आक्रामक नहीं, बौद्धिक रूप से बहुत कमजोर दिखाई देता है.

भौतिक प्रगति बनाम नैतिक प्रगति

नेहरू का भाषण आसान भाषण नहीं है. उसमें परमाणु भौतिकी है, आइंस्टाइन हैं, पदार्थ और ऊर्जा का प्रश्न है, औद्योगिक क्रांति है, पूंजीवाद और साम्यवाद हैं, उत्पादन के साधन हैं, सामाजिक न्याय है, व्यक्ति की स्वतंत्रता है, साधन और साध्य का नैतिक प्रश्न है, भारतीय संस्कृति है और आधुनिक तकनीकी सभ्यता के कारण पैदा होने वाला आध्यात्मिक संकट है.

मोदी का भाषण इसके विपरीत ‘वेव’, ‘इम्पैक्ट’, ‘टारगेट’, ‘नाराज़ फूफा’, ‘दिमागी नक्सल’, ‘फ्लैस’, ‘ओजी’ और राजनीतिक चुटकुलों के सहारे आगे बढ़ता है. इसके पीछे यह तर्क दिया जा सकता है कि भाषा समय के साथ बदलती है और हर नेता अपने समय के युवाओं की भाषा बोलना चाहता है. लेकिन सरल भाषा और सरल विचार एक चीज नहीं हैं. बोलचाल की भाषा में भी गहन विचार संभव हैं.

समस्या मोदी की भाषा का आधुनिक होना नहीं है. समस्या विचार का हल्का होना है.

नेहरू जिस समय भाषण दे रहे थे, वह भी आत्मविश्वास से भरे स्वतंत्र भारत का समय था. बांध बन रहे थे, उद्योग खड़े हो रहे थे, वैज्ञानिक संस्थाएं बन रही थीं और योजनाबद्ध विकास का उत्साह था. वे चाहते तो उस पूरी उपलब्धि को अपनी सरकार की विजय-कथा में बदल सकते थे.

लेकिन उलटा वे अपने भाषण में प्रश्न पूछते हैं- भौतिक प्रगति के बीच मनुष्य का क्या होगा? क्या समाज अपने नैतिक आधार खो देगा? क्या तकनीक मनुष्य को बड़ा बनाएगी, या वह बाहरी दुनिया पर विजय पाते-पाते अपने ही भीतर खो जाएगा?

मोदी की उपलब्धियों की सूची में आत्मसंदेह अनुपस्थित है. शायद इसका कारण यह है, जैसा कि 2024 में वे एक इंटरव्यू में कह चुके हैं कि उन्हें लगता है कि वे ‘नॉन-बायोलॉजिकल’ (परमात्मा द्वारा भेजे गए) हैं.

उनके लिए अतीत और वर्तमान की संरचना सीधी है. अपने प्रधानमंत्री बनने से पहल की कुछ नकारात्मक खबरों को सुनाकर वे कहते हैं: ‘तब निराशा और हताशा के सिवाय कुछ नहीं था.’

जबकि वर्तमान भारत विजयी है- ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ की जगह ‘पॉलिसी डायनेमिज्म’ है.

यह इतिहास की असुविधाजनक जटिलताओं को हटा देने वाली भाषा है.

नेहरू अपने भाषण में अतीत के बारे में कहते हैं:

भारत का यह पूरा अतीत, अपने गौरव और अपनी विफलताओं सहित, हमारी विरासत है.

और तुरंत प्रश्न करते हैं:

लेकिन क्या हम उसी अतीत में रह सकते हैं?

यहां भी अंतर वही है. नेहरू इतिहास को समझना चाहते हैं; मोदी इतिहास का इस्तेमाल राजनीतिक कंट्रास्ट पैदा करने के लिए करते हैं.

मैं, मेरा, मुझसे संबंधित

मोदी के भाषण की आत्मकेंद्रितता कभी-कभी विचित्र सीमा तक पहुंच जाती है. जब वे वैश्विक घटनाओं का भी श्रेय लेने लगते हैं. कोरोना महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध, व्यापारिक संकट और पश्चिम एशिया की परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए वे कहते हैं इन विपरीत परिस्थितियों में उनके आलोचकों काे लगा कि:

अब मोदी फंस गया, अब मोदी गिर जाएगा, अब मोदी कुचल जाएगा.

उसके बाद वे कहते हैं कि भारत की, अर्थात् उनका ‘बुरा चाहने वालों की हर हसरत धरी की धरी रह जा रही है. ‘

वे दुनिया की महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं को भी अपने इर्द-गिर्द घूमते हुए दिखाने की कोशिश करते हैं.

नेहरू दुनिया की घटनाओं को अपने ऊपर केंद्रित करने के बजाय उनके बीच मनुष्य की स्थिति खोजते हैं.

यही शायद इन भाषणों का सबसे बुनियादी फर्क है. नेहरू के भाषण में संसार वक्ता से बड़ा होता जाता है. मोदी अपने भाषण में संसार को बार-बार अपने से छोटा दिखाने की कोशिश करते हैं.

नेहरू अपने से बहुत छोटी पीढ़ी के सामने यह मानने को तैयार हैं कि दुनिया बदल गई है, पुरानी पीढ़ी के मूल्य अपर्याप्त हो सकते हैं और नई तकनीकी सभ्यता ऐसे प्रश्न पैदा कर रही है जिनके उत्तर उनके पास भी तैयार नहीं हैं.

मोदी के भाषण में ऐसी बौद्धिक विनम्रता दुर्लभ है. उनके पास सभी प्रश्नों के उत्तर पहले से मौजूद हैं और वे उत्तर उनके अपने नेतृत्व की कथित सफलता की ओर जाते हैं.

विनम्रता का भाव और अभाव

एक और बात ध्यान देने लायक है. नेहरू अपने भाषण की शुरुआत कोमल हास्य से करते हैं. उनके शब्द हैं:

आज इस दीक्षांत समारोह में बोलने का निमंत्रण मिला, तो कुलपति महोदय ने आग्रह किया कि मैं कुछ लिखकर लाऊं. मैंने बचने की कोशिश की. आखिर, जब कोई लिखता है, तो उससे बड़ी गहरी बातें कहने की अपेक्षा की जाती है. बिना तैयारी के बोलना और अपनी बातों में गहराई का आभास देना कहीं आसान है. लेकिन उनका आग्रह जारी रहा और अंततः मैंने हार मान ली. इसलिए, महोदय, आपकी अनुमति से मैं अपना लिखा हुआ कुछ पढ़कर सुनाऊंगा.

दिल्ली विवि के तत्कालीन कुलपति अर्थशास्त्री वी.के.आर.वी. राव थे. भारतीय अर्थव्यवस्था को समझने में उनका योगदान राष्ट्रीय आय के आकलन से जुड़ा रहा है. एक कुलपति देश के प्रधानमंत्री को कह सकता था कि अगर उनके विश्वविद्यालय में बोलना तो प्रधानमंत्री को तैयारी के साथ आना चाहिए, लिखित भाषण के साथ आना चाहिए. नेहरू ऐसा ही करते हैं और समारोह में लिखित भाषण का पाठ करते हैं. कुलपति राव बाद में केंद्रीय मंत्री भी बने.

देश भर के विश्वविद्यालयों में कुलपित की कुर्सियों पर अपने पितृसंगठन आरएसएस के चापलूस कार्यकताओं की आसीन करवा देने वाली भाजपा सरकार के मुखिया से क्या ऐसी विनम्रता की उम्मीद की जा सकती है? क्या उनके राज में कोई कुलपति ऐसा कह सकता है?

दोनों भाषणों को साथ पढ़ने कई जरूरी कारण हैं.

इन भाषणों को यह पता लगाने के लिए नहीं पढ़ा जाना चाहिए कि 1958 में नेहरू ने जो कुछ कहा वह सब सही था. बल्कि यह देखने के लिए कि भारत के प्रधानमंत्री का पद कभी विश्वविद्यालय के युवाओं के सामने किस स्तर की बातचीत संभव मानता था- और आज वह बातचीत किस स्तर तक सिमट गई है.

नेहरू और मोदी का भाषण इसी तुलना के लिए पढ़ा जाना चाहिए.

(जवाहलाल नेहरू के भाषण का हिंदी अनुवाद यहां और नरेंद्र मोदी का भाषण यहां पढ़ सकते हैं.)

(प्रमोद रंजन पत्रकार, लेखक और शिक्षाविद् हैं.)