रिपोर्टर्स सैंस फ्रंटियर्स (आरएसएफ) की ‘2026 प्रेस फ्रीडम प्रीडेटर्स लिस्ट’ में कुल 33 लोगों और संस्थाओं में अडानी समूह, ऑपइंडिया और डोनाल्ड ट्रंप अलग-अलग श्रेणियों में शामिल किए गए हैं. अडानी को ‘क़ानूनी’ श्रेणी में रखा गया है, जबकि ऑपइंडिया ‘सामाजिक’ श्रेणी में शामिल है. वहीं, ट्रंप को ‘राजनीतिक’ श्रेणी में रखा गया है.
नई दिल्ली: गौतम अडानी की एक तस्वीर, जिसमें उनके गले में फूलों की माला है और चेहरे पर हल्की मुस्कान के साथ वे ऊपर की ओर देख रहे हैं, अब रिपोर्टर्स सैंस फ्रंटियर्स (आरएसएफ) की ‘2026 प्रेस फ्रीडम प्रीडेटर्स लिस्ट’ (2026 प्रेस स्वतंत्रता के ख़तरों की सूची) में शामिल दुनिया की 33 प्रमुख हस्तियों और कंपनियों के साथ नजर आएगा.
इस साल पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भी इस सूची में जगह मिली है. वहीं, स्वतंत्र मीडिया की आलोचना करने और सत्ता समर्थक विचारों को प्रमुखता देने वाला संस्थान ऑपइंडिया (OpIndia) एक बार फिर इस सूची में शामिल किया गया है.
आरएसएफ हर साल 2 नवंबर को मनाए जाने वाले पत्रकारों के खिलाफ अपराधों में दंडमुक्ति के अंतरराष्ट्रीय दिवस के अवसर पर यह सूची जारी करता है. इसमें उन 33 लोगों और संस्थाओं का परिचय दिया गया है, जिन्होंने 2026 में पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को निशाना बनाया. आरएसएफ का कहना है, ‘इन सभी में एक बात समान है – प्रेस की स्वतंत्रता के प्रति नफरत.’
आरएसएफ के मुताबिक, ‘व्यंग्यात्मक अंदाज में तैयार की गई यह सूची उन विभिन्न और क्रूर तरीकों को उजागर करती है, जिनका इस्तेमाल पत्रकारिता का गला घोंटने के लिए किया जाता है.’
इस सूची में भारत से दो नाम शामिल हैं. पहला नाम कॉरपोरेट क्षेत्र की दिग्गज कंपनी अडानी समूह के प्रतिनिधित्व करने वाले गौतम अडानी का है.
आरएसएफ के मुताबिक, अडानी ग्रुप मीडिया के लिए एक ‘शिकारी’ (predator) है, क्योंकि वह पत्रकारों को चुप कराने के लिए कानूनी मुकदमों (gag suits) का इस्तेमाल करता है. हाल ही में प्रकाशित कुछ लेखों के कारण समूह ने एक पत्रकार के खिलाफ आपराधिक मानहानि का मुकदमा दायर किया था. इस मामले में पत्रकार को हाल ही में गुजरात की एक जेल में भी रहना पड़ा.
आरएसएफ का कहना है कि अडानी समूह और उसकी सहायक कंपनियों से जुड़ी खबरों और रिपोर्टिंग को लेकर भारत में पत्रकारों के खिलाफ उसके 11 दीवानी और आपराधिक मुकदमे अभी भी लंबित हैं.

आरएसएफ की रिपोर्ट के अनुसार, अडानी समूह मीडिया संस्थानों और पत्रकारों के खिलाफ कथित तौर पर दुरुपयोगपूर्ण कानूनी कार्रवाइयां करके पत्रकारिता को अपराध की श्रेणी में लाने की कोशिश कर रहा है. इस सूची में उनके साथ कज़ाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट टोकायेव (जो पहली बार इसमें शामिल हुए हैं) और तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोआन जैसी अन्य प्रमुख हस्तियां भी शामिल हैं, जिनका मक़सद भी यही है.
अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए आरएसएफ ने अडानी एंटरप्राइजेज की ओर से 6 सितंबर 2025 को दायर एक मुकदमे का हवाला दिया है.
इसमें कहा है, ‘वादी कुछ पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और संगठनों की कार्रवाइयों से आहत है, जिन्होंने ‘दुर्भावनापूर्ण’ इरादे से अडानी समूह की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाया है. इससे उसके हितधारकों को अरबों डॉलर का नुकसान हुआ है और एक देश के रूप में भारत की छवि, ब्रांड वैल्यू और विश्वसनीयता को भी भारी क्षति पहुंची है… प्रतिवादियों ने भारत-विरोधी हितों के साथ गठजोड़ करके और लगातार वादी की बुनियादी ढांचा एवं ऊर्जा परियोजनाओं को निशाना बनाकर, जो भारत के बुनियादी ढांचे और ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं, दुर्भावनापूर्ण उद्देश्यों से इन परियोजनाओं के कामकाज में बाधा पहुंचाई है.’
इस सूची में शामिल एक और भारतीय नाम संस्थान ‘ऑपइंडिया’ है. इसे इस साल इसलिए शामिल किया गया है क्योंकि यह ‘सत्ता में बैठे लोगों द्वारा प्रायोजित या समर्थित डिजिटल हमलों के जरिए स्वतंत्र पत्रकारिता के खिलाफ नफरत फैला रहा है.
ऑपइंडिया की कार्यप्रणाली पर किए गए अपने अध्ययन में आरएसएफ ने पहले उल्लेख किया था कि जनवरी से सितंबर 2025 के बीच इस वेबसाइट ने पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को निशाना बनाते हुए 91 लेख प्रकाशित किए. इनमें से 43 लेख विशेष रूप से पांच पत्रकारों के खिलाफ थे. आरएसएफ के अध्ययन में पाया गया कि इन 43 लेखों में से 32 प्रकाशित होने के तुरंत बाद संबंधित पत्रकारों के खिलाफ ऑनलाइन उत्पीड़न की लहर शुरू हो गई.
आरएसएफ का कहना है कि ‘स्टॉप फंडिंग हेट’ (Stop Funding Hate) अभियान के चलते ऑपइंडिया की फंडिंग बंद होने के बावजूद उसे गूगल ऐडसेंस और अन्य स्रोतों से समर्थन मिल रहा है.
आरएसएफ की संपादकीय निदेशक ऐनी बोकांडे ने कहा, ‘ऑपइंडिया भारत में पत्रकारों के खिलाफ व्यवस्थित उत्पीड़न की प्रक्रिया का एक प्रमुख हिस्सा है, जो पत्रकारों को वास्तविक खतरे में डालता है. आरएसएफ भारतीय न्याय व्यवस्था से अपील करता है कि वह इन प्रकाशनों से जुड़े साइबर उत्पीड़न अभियानों की जांच करे. ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, मुख्य रूप से एक्स (पूर्व में ट्विटर), को इन हमलों को बढ़ावा देने वाली नफरत भरी सामग्री हटाने के लिए कदम उठाने चाहिए. इसके अलावा, गूगल एडसेंस द्वारा इस साइट को लगातार फंडिंग देना, साइट के गलत आचरण के बिल्कुल विपरीत है. भारत में पत्रकारों और प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए ऑनलाइन उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाई बहुत महत्वपूर्ण है.’
आरएसएफ की वेबसाइट पर ऑपइंडिया के परिचय में कहा गया है, ‘2023 से 2025 के बीच इस वेबसाइट पर पत्रकारों को निशाना बनाते हुए 300 से अधिक लेख प्रकाशित किए गए. इन लेखों ने अक्सर बड़े पैमाने पर ऑनलाइन उत्पीड़न अभियानों को बढ़ावा दिया.’
आरएसएफ की रिपोर्ट के अनुसार, ऑपइंडिया पर सबसे अधिक निशाना बनाए गए पत्रकारों में राजदीप सरदेसाई: इंडिया टुडे के सलाहकार संपादक और एंकर – 36 लेख, आरफा खानम शेरवानी: द वायर की पत्रकार – 18 लेख, मोहम्मद जुबैर: फैक्ट-चेकिंग वेबसाइट ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक – 15 लेख, महेश लांगा: द हिंदू के पत्रकार – 13 लेख, रवीश कुमार: स्वतंत्र पत्रकार – 11 लेख, राना अय्यूब: वॉशिंगटन पोस्ट की स्तंभकार (columnist) और न्यूज़क्लिक के प्रधान संपादक प्रबीर पुरकायस्थ – प्रत्येक के खिलाफ 10 लेख शामिल हैं.
आरएसएफ के अध्ययन में स्वतंत्र मीडिया संस्थानों द वायर, न्यूज़क्लिक और न्यूज़लॉन्ड्री को भी प्रमुख निशानों में शामिल पाया गया. इस अवधि में इनके खिलाफ क्रमशः 32, 17 और 16 अपमानजनक लेख प्रकाशित किए गए.
इन संस्थाओं और अन्य कई कारकों ने मिलकर भारत की मीडिया स्वतंत्रता की स्थिति को प्रभावित किया है. वर्ष 2026 की प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर पहुंच गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में छह स्थान नीचे है. आरएसएफ की रैंकिंग के मुताबिक, दुनिया के बड़े हिस्से में मीडिया की स्वतंत्रता की कमी को दर्शाने वाले देशों की सूची में भारत भी शामिल है.

हाल ही में आरएसएफ ने पिछले 25 वर्षों में मीडिया की स्वतंत्रता की स्थिति की समीक्षा करते हुए एक रिपोर्ट जारी की थी.
इसमें कहा गया था, ‘रिपोर्टर्स सैंस फ्रंटियर्स (आरएसएफ) के विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक के इतिहास में पहली बार दुनिया के आधे से अधिक देश अब प्रेस की स्वतंत्रता के लिहाज से ‘कठिन’ या ‘बेहद गंभीर’ श्रेणी में आ गए हैं. पिछले 25 वर्षों में सूचकांक में शामिल सभी 180 देशों और क्षेत्रों का औसत स्कोर कभी इतना नीचे नहीं रहा.’
डोनाल्ड ट्रंप भी आरएसएफ की सबसे खराब सूची में शामिल
पिछले साल सूची में शामिल होने से बाल-बाल बचने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को इस साल 2026 की ‘प्रेस स्वतंत्रता के प्रिडेटर्स की सूची’ में जगह मिल गई है. अपने दूसरे कार्यकाल के दो साल से भी कम समय में प्रेस पर उनके हमलों के खराब रिकॉर्ड के कारण उन्हें इस सूची में शामिल किया गया है.
आरएसएफ के मुताबिक, जनवरी 2025 में ह्वाइट हाउस लौटने के बाद से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के हालिया इतिहास में प्रेस की स्वतंत्रता पर अभूतपूर्व हमला कर रहे हैं.
रिपोर्ट में उन मौखिक हमलों, कानूनी दबाव और प्रशासनिक प्रतिशोध की घटनाओं का उल्लेख किया गया है, जिनके जरिए ट्रंप ने उन मीडिया संस्थानों को निशाना बनाया जिन्हें वे अपने विरोधी मानते हैं.
रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ने पत्रकारों की सरकारी और सैन्य संस्थानों तक पहुंच सीमित की है, सार्वजनिक प्रसारकों की स्वतंत्रता को कमजोर किया है और प्रेस के खिलाफ प्रसारण नियामक संस्था का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में किया है.
आरएसएफ ने सितंबर 2026 में ह्वाइट हाउस में पत्रकारों की पहुंच पर प्रतिबंध लगाए जाने से जुड़े सवाल के जवाब में ट्रंप की टिप्पणी का भी उल्लेख किया है.
ट्रंप ने कहा था, ‘ओह, तो आप ‘आज़ाद प्रेस’ पर लगी पाबंदी की बात कर रहे हैं? है न? बहुत ही सीधी-सी पाबंदी है. मैं उन्हें अपने दफ़्तर में नहीं चाहता. मैं उन्हें यहां नहीं चाहता. मैं तो यही कहूंगा कि यह पाबंदी जहां तक हो सके, वहां तक लागू रहनी चाहिए.’
हालांकि, साल 2026 की प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग में अमेरिका 180 देशों में 64वें स्थान पर है, लेकिन पिछले वर्ष के मुकाबले उसकी स्थिति सात पायदान नीचे आई है.
‘जाने-पहचाने चेहरे’
अडानी समूह, ऑपइंडिया और डोनाल्ड ट्रंप आरएसएफ की सूची में अलग-अलग श्रेणियों में शामिल किए गए हैं. अडानी को ‘कानूनी’ श्रेणी में रखा गया है, जबकि ऑपइंडिया ‘सामाजिक’ श्रेणी में शामिल है. वहीं, ट्रंप को ‘राजनीतिक’ श्रेणी में रखा गया है. हालांकि, ये तीनों नाम आरएसएफ की सूची में शामिल कुल 33 लोगों और संस्थाओं में से हैं.
आरएसएफ ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को अपनी सूची में लगातार मौजूद रहने वाला चेहरा बताया है. वहीं, निकारागुआ के डैनियल ओर्टेगा को ‘सुरक्षा’ श्रेणी में बार-बार शामिल होने वाला व्यक्ति बताया गया है.
आरएसएफ ने इजरायली सशस्त्र बलों को भी बेहद निरंकुश और चुनौती से परे बताया है. इसके अलावा मेक्सिको के ड्रग कार्टेल और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का भी उल्लेख किया गया है.
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार ने इजरायली सशस्त्र बलों के साथ मिलकर गाजा, वेस्ट बैंक और लेबनान में पत्रकारों के खिलाफ अपनी दमनकारी नीति जारी रखी है.’
इस सूची में शामिल 33 लोगों में एकमात्र महिला रूस टुडे और रूस के अन्य मीडिया संस्थानों की संपादक मार्गरीटा सिमोनियन हैं.
आरएसएफ ने उनके बारे में कहा है, ‘उन्होंने आरएसएफ को भंग करने की मांग की थी और बेलारूस के ब्लॉगर रमन प्रतासेविच को गिरफ्तार करने के लिए एक विमान का रास्ता बदलवाए जाने के बाद अलेक्जेंडर लुकाशेंको को बधाई दी थी.’
इससे पहले विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक जारी करते हुए भी आरएसएफ ने कहा था कि दुनिया के आधे से अधिक देश अब प्रेस की स्वतंत्रता के लिहाज से ‘कठिन’ या ‘बेहद गंभीर’ श्रेणी में आ चुके हैं.
आरएसएफ के मुताबिक, ‘पिछले 25 वर्षों में सूचकांक में शामिल सभी 180 देशों और क्षेत्रों का औसत स्कोर कभी इतना नीचे नहीं रहा.’
Source: The Wire

