तलवार और ईमान के झंडाबरदार – टीपू सुल्तान, जो कभी झुके नहीं
टीपू सुल्तान की जिंदगी और लड़ाई को आज के राजनीतिक-सामाजिक हालात से जोड़कर देखना बहुत जरूरी है। ब्रिटिश राज के खिलाफ उनका असहयोग का सिद्धांत आज भी आजादी और देश की रक्षा का संदेश देता है।
आज के भारत में, जहाँ आजादी की लड़ाई नए रूप ले चुकी है, टीपू की कुर्बानी हमें सिखाती है कि देश का गौरव और स्वतंत्रता किताबों तक सीमित नहीं, बल्कि एक जीवंत जज्बा है। आज जब देश-विदेश में स्वतंत्रता को चुनौतियाँ मिल रही हैं, टीपू की मिसाल हमें अपनी पहचान और हक के लिए डटकर खड़े होने की हिम्मत देती है।
टीपू ने अपने समय की विश्व राजनीति को समझा और फ्रांस, तुर्की जैसे देशों से दोस्ती की। यह आज के कूटनीतिक संतुलन से मिलता-जुलता है। इससे साबित होता है कि स्वतंत्रता की रक्षा सिर्फ युद्ध नहीं, बल्कि राजनीति और कूटनीति भी है।
आज की युवा पीढ़ी को टीपू जैसे नेताओं से सीखना चाहिए। वे सिर्फ जुल्म के खिलाफ नहीं लड़े, बल्कि एक आधुनिक, स्वतंत्र और तरक्कीशील समाज बनाने की कोशिश की।
18वीं सदी के अंत में जब ब्रिटिश साम्राज्य भारत पर छा रहा था, दक्षिण भारत से एक शख्स ने उसका मुकाबला किया। वह थे टीपू सुल्तान – ‘मैसूर का शेर’। उन्होंने दूरदर्शिता, साहस और राजनीतिक समझ से देश की आजादी की अमर कहानी लिखी।
टीपू का जन्म 1751 में हुआ। बचपन से ही उन्हें ज्ञान, युद्ध कौशल और आत्मसम्मान की शिक्षा मिली। 1782 में पिता हैदर अली के बाद उन्होंने मैसूर की कमान संभाली और एक मजबूत, न्यायपूर्ण और शक्तिशाली राज्य बनाया।
उनके शासन में:
– अर्थव्यवस्था सुधरी
– खेती और उद्योग बढ़े
– सड़कें और किले मजबूत हुए
– सबसे बड़ा कारनामा: युद्धक रॉकेट बनाए, जो उस समय के सबसे उन्नत हथियार थे। इतिहासकार मानते हैं कि यही तकनीक बाद में यूरोप में इस्तेमाल हुई।
टीपू समझ गए थे कि अंग्रेजों का व्यापार असल में कब्जे की शुरुआत है। इसलिए उन्होंने फ्रांस और तुर्की से गठबंधन किया ताकि ब्रिटिश ताकत का मुकाबला हो सके।
अंग्रेजों के लिए टीपू एक बड़ी रुकावट थे। मराठों और हैदराबाद के निजाम के साथ मिलकर अंग्रेजों ने चार युद्ध लड़े, लेकिन हर बार टीपू ने साहस और जीत का झंडा ऊँचा रखा।
1799 के चौथे युद्ध में जब श्रीरंगपट्टम का किला घिर गया, टीपू ने आखिरी साँस तक लड़ने का फैसला किया। वे शहीद हुए, लेकिन कभी झुके नहीं। उनकी जिंदगी ने साबित किया:
इज्जत की मौत, गुलामी की जिंदगी से बेहतर है।
टीपू के बाद उनकी सल्तनत बाँट दी गई, लेकिन उनकी कुर्बानी ने भारत की आजादी की लौ को नई रोशनी दी। वे सिर्फ राजा नहीं, एक प्रतीक थे – जो सिखाते हैं कि आत्मसम्मान ही वह ताकत है जो गुलामी की जंजीरें तोड़ सकती है।
टीपू के ये शब्द आज भी गूंजते हैं:
“शेर की एक दिन की जिंदगी, भेड़ की सौ साल की जिंदगी से बेहतर है।”
आज जब हम अपनी इतिहास देखते हैं, तो समझ आता है कि टीपू की लड़ाई सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं थी। यह आज के मुद्दों के समाधान के लिए भी एक मार्गदर्शन है।
लेखक: जमील अहमद मलनसार – बंगलोर
पद: सहायक महासचिव, ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल कर्नाटक
9854498354
Source: Haqeeqat Time







