मौलाना अबुल कलाम आज़ाद: चाय के प्याले में ठहरा हुआ एक ख़याल

11 नवम्बर को हम देश के महान शिक्षाविद् और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की 137वीं जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। इस वर्ष की ख़ासियत यह है कि कर्नाटक राज्य पहली बार इस दिन को औपचारिक रूप से “शिक्षा दिवस” के रूप में मना रहा है। राज्य के शिक्षा विभाग और समग्र शिक्षा अभियान ने पूरे प्रदेश के स्कूलों और कॉलेजों में भाषणों, वाद-विवादों और संगोष्ठियों के माध्यम से इस दिन को एक बौद्धिक पर्व का रूप दे दिया है। यह पहल मौलाना आज़ाद की शैक्षिक सेवाओं को याद करने और उनकी विरासत को नए अर्थों में समझने की एक सराहनीय कोशिश है।

मौलाना आज़ाद को सिर्फ एक राजनीतिक नेता के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व की गहराई को नज़रअंदाज़ करना होगा। उनकी ज़िंदगी की सादगी और अनुशासन उनके भीतर की रौशनी का आईना थे। सुबह की ख़ामोशी में, जब चाय के प्याले से भाप उठती थी, तो वह क्षण मौलाना के गहरे चिंतन का प्रतीक बन जाता था — जैसे एक सादा पेय उनके विचारों की शांति को आकार दे रहा हो।

1888 में जन्मे इस विद्वान के पिता मौलवी ख़ैरुद्दीन स्वयं एक प्रतिष्ठित आलिम-ए-दीन थे। बचपन से ही मौलाना ने अरबी, फ़ारसी और उर्दू की शिक्षा अपने पिता से प्राप्त की। यही भाषाएँ आगे चलकर उनकी विचारधारा और संस्कृति की नींव बनीं। उनकी सोच में वही नफ़ासत और तरतीब थी जो चाय की भाप में उठते सुगंधित सन्नाटे में महसूस होती है। ज्ञान, साहित्य और धर्म सेवा के क्षेत्रों में उनके योगदान ने ऐसा अमिट निशान छोड़ा जो आज भी समय की गर्द में धुंधला नहीं हुआ।

मौलाना का चाय से संबंध सिर्फ़ स्वाद का नहीं था। बिना दूध और शक्कर की कड़क चाय उनकी एक ध्यानमग्न आदत थी। गांधीजी, नेहरू या अन्य नेताओं के साथ विमर्श हो या आज़ादी की रणनीति पर मंथन — चाय की वही महक इन पलों को आत्मीयता और एकाग्रता से भर देती थी। अंग्रेज़ी दौर में जहाँ चाय एक सामाजिक रिवायत थी, वहीं मौलाना के लिए वह चिंतन और आत्मिक शांति का पल बन चुकी थी।

चाय के उसी छोटे से क्षण में मौलाना सिर्फ़ एक नेता नहीं रह जाते, बल्कि मानवता और शांति के संदेशवाहक बन जाते थे। 1958 में उनके इंतकाल के बाद भी उनका संयम, उनका सौंदर्यपूर्ण विचार और मानवतावादी दृष्टिकोण आज भी प्रेरणा देता है।

इसलिए आज जब आपके हाथ में चाय का प्याला हो, तो ज़रा ठहर कर सोचिए — कर्नाटक में पहली बार मनाए जा रहे “शिक्षा दिवस” का अर्थ क्या है?
यह दिन सिर्फ़ सम्मान का नहीं, बल्कि ज़िंदगी के सबक़ों की याद दिलाने का दिन है — उस मौलाना को याद करने का, जिन्होंने ज्ञान को इंसानियत से जोड़ा और शिक्षा को आत्मा की आज़ादी बताया।

Source: Haqeeqat Time (Translate in hindi)

लेखक: जमी़ल अहमद मिलनसार, बेंगलुरु