किसी समाज की वास्तविक प्रगति कैसे मापी जाती है? क्या ऊँची इमारतों की संख्या से? क्या तेज़ आर्थिक विकास से? या फिर तकनीक के व्यापक उपयोग से?
सामाजिक विशेषज्ञों का कहना है—वह समाज विकसित माना जाता है जहाँ महिलाओं के हाथ में किताब हो। क्योंकि जब एक महिला पढ़ती है, तो केवल एक व्यक्ति नहीं बदलता—एक घर, एक परिवार, पूरा समाज और आने वाली पीढ़ियाँ बदल जाती हैं।
इसीलिए कहा जाता है कि महिलाओं के हाथ में किताब, बेहतर पीढ़ी की गारंटी है।
महिला की शिक्षा केवल उसका बुनियादी अधिकार नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य की सबसे मजबूत नींव है।

महिला घर की पहली शिक्षक होती है। बच्चा अपनी पहली आवाज़, पहला शब्द और पहला संस्कार माँ से सीखता है। जब माँ शिक्षित होती है, तो बच्चा व्यापक सोच, सुदृढ़ मूल्यों और तेज़ सामाजिक समझ के साथ बढ़ता है। लेकिन यदि माँ अशिक्षित हो, तो परिवार की प्रगति धीमी पड़ जाती है। आज के विज्ञान और तकनीक के युग में महिला की शिक्षा वह आधार है जो परिवार को युग के साथ चलने की शक्ति देती है।

पिछले दो दशकों में महिलाओं की नौकरी, आर्थिक जागरूकता और उद्यमिता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। एक पढ़ी–लिखी महिला न केवल नौकरी करती है, बल्कि पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति को बदलने की क्षमता रखती है।
विश्व बैंक की रिपोर्टों के अनुसार शिक्षित महिलाओं के कारण परिवार की आय में 10 से 20 प्रतिशत तक वृद्धि देखी गई है
इसके साथ ही बच्चों की सेहत, पोषण, स्वच्छता, और आर्थिक प्रबंधन में भी सुधार होता है। शिक्षित महिला घरेलू हिंसा, कम उम्र की शादी तथा लैंगिक भेदभाव के खिलाफ अधिक प्रभावी रूप से खड़ी हो पाती है।
कुल मिलाकर शिक्षा महिला की शक्ति, सुरक्षा और आत्मविश्वास है।

शिक्षित महिला समाज में स्वास्थ्य–स्वच्छता, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, समानता और न्याय जैसे मूल्यों को मजबूत करती है। वह विज्ञान, कला, राजनीति और व्यवसाय में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
आज प्रश्न यह नहीं है कि महिलाओं को शिक्षा की आवश्यकता है या नहीं—बल्कि सवाल यह है कि शिक्षा के बिना समाज आगे कैसे बढ़ सकता है?

शिक्षा प्राप्त महिला अपने अधिकारों से परिचित होती है, निर्णयों में आत्मविश्वास से भाग लेती है, परिवार और समाज में सम्मान पाती है तथा राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में अपनी आवाज़ को मजबूती से प्रस्तुत करती है। परिवर्तन का सबसे प्रभावशाली हथियार किताब ही है।

शहरों में बदलाव तेज़ी से हो रहा है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को अब भी अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है—उच्च शैक्षणिक संस्थानों की कमी, परिवहन की दिक्कतें, गरीबी, घरेलू जिम्मेदारियाँ, कम उम्र की शादी, सामाजिक भ्रम और पारिवारिक दबाव।
इन समस्याओं के समाधान के लिए सरकार और समाज दोनों को साझा जिम्मेदारी निभानी होगी।

सरकार की कई योजनाओं—बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV), मुफ्त साइकिल, यूनिफॉर्म, मध्याह्न भोजन, छात्रवृत्ति और बचत योजनाओं ने लड़कियों की शिक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन प्रयासों से हजारों गरीब परिवारों की बेटियाँ स्कूल और कॉलेज तक पहुँचने में सक्षम हुई हैं।

अनुसंधान बताते हैं कि शिक्षित माताओं के बच्चे अधिक टीकाकरण प्राप्त करते हैं, कुपोषण का खतरा कम होता है, शिक्षा में बेहतर प्रदर्शन करते हैं और स्वच्छता की आदतें मजबूत विकसित होती हैं।
माँ की शिक्षा बच्चों की ज़िंदगी का सबसे मजबूत सुरक्षा कवच है। किताब थामने वाली महिला अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाती है, जबकि अशिक्षा उसे जानकारी के अभाव में कमजोर बनाती है।
शिक्षित महिला अपने कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक रहती है, आत्मविश्वास से निर्णय लेती है और अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा बनती है। वह पीड़िता नहीं, बल्कि परिवर्तन की नेता होती है।

आज भारत में महिला शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ देखने को मिल रही हैं—IAS, IPS, IFS, IRS, KAS, KEA जैसी सेवाओं में बढ़ती संख्या, महिलाओं द्वारा संचालित स्टार्टअप, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, कानून, अनुसंधान, खेल, संस्कृति और तकनीक में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता।
इन उपलब्धियों की नींव कहीं न कहीं महिला के हाथ में पकड़ी गई किताब ही है।

घर में—मजबूत परिवार, संस्कारित और स्वस्थ बच्चे, संगठित जीवन।
समाज में—जागरूक नागरिक, महिलाओं के प्रति बेहतर सुरक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता और सशक्तिकरण।
राष्ट्र में—मजबूत मानव संसाधन, दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बेहतर स्थान।

महिला शिक्षा को बढ़ावा देना समय की माँग है—कम उम्र की शादी पर सख्त रोक, कॉलेज शिक्षा को प्रोत्साहन, सुरक्षित परिवहन, पुस्तकालय और कौशल प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना तथा स्कूल छोड़ चुकी बालिकाओं को पुनः शिक्षा से जोड़ना आवश्यक है।

महिलाओं की शिक्षा समाज के कल्याण का दीर्घकालिक निवेश है।
महिला के हाथ में किताब सिर्फ ज्ञान नहीं—घर, समाज और देश का भविष्य रोशन करने वाला दीपक है।
किताब थामने वाली महिला ही कल की नेता, वैज्ञानिक, शिक्षिका, डॉक्टर, नीति–निर्माता और जागरूक पीढ़ी की निर्माता बनती है।

इसीलिए—
यदि महिला के हाथ में किताब है, तो समाज का भविष्य सुरक्षित है।
किताब दीजिए, अवसर दीजिए—और बेहतर पीढ़ी का निर्माण कीजिए।

लेखक: शब्बीर अहमद, श्रीनिवासपुर

Source: Haqeeqat Time (translate in hindi)