भारत में मुसलमानों की हालत से सभी लोग वाकिफ़ हैं। आज देश में ऐसे बयान आम हो गए हैं, जिनसे नफ़रत बढ़ती है। कई नेता बिना सोचे-समझे बयान देकर चर्चा में आना चाहते हैं। खास तौर पर मुसलमानों के ख़िलाफ़ बयान देकर राजनीति की जा रही है। पहले भी ऐसा होता रहा है, लेकिन अब हालात और ज़्यादा चिंताजनक होते जा रहे हैं।
यह सच है कि मुसलमान अल्लाह पर भरोसा रखते हैं, लेकिन मौजूदा हालात में समझदारी से बोलना भी बहुत ज़रूरी है। आज मुसलमानों को हर जगह शक की नज़र से देखा जा रहा है—घर, बाज़ार, बस, ट्रेन, स्कूल-कॉलेज और हवाई अड्डों तक। राजनीतिक पार्टियाँ अपने फ़ायदे के लिए इस माहौल का इस्तेमाल कर रही हैं। नए क़ानून, नियम और सख़्ती का असर भी ज़्यादातर आम लोगों पर पड़ रहा है।
ऐसे मुश्किल समय में ज़िम्मेदार और गंभीर सोच की ज़रूरत है। लेकिन कुछ मुस्लिम नेताओं और धर्मगुरुओं के बयान हालात को और बिगाड़ सकते हैं। अक्सर देखा जाता है कि बयान देने वाले नेता सुरक्षित रहते हैं, जबकि उसकी क़ीमत आम मुसलमानों को चुकानी पड़ती है।
हाल ही में कुछ नेताओं के बयान—जैसे बाबरी मस्जिद के मुद्दे को फिर से उठाना या जिहाद जैसे शब्दों का इस्तेमाल—बहस और तनाव बढ़ाने वाले बन रहे हैं। जिहाद का असली मतलब ज़ुल्म के ख़िलाफ़ संघर्ष है, लेकिन इसे बार-बार गलत तरीके से पेश किया जाता रहा है। ऐसे माहौल में इस तरह की बातें कहने से नफ़सान हो सकता है।
इसी तरह चुनावी भाषणों में धार्मिक नारे और भावनात्मक बातें करना भी समझदारी नहीं मानी जा सकतीं। इससे समाज में डर और बँटवारा बढ़ता है। आज हालात इतने नाज़ुक हैं कि छोटी-सी बात भी बड़ी परेशानी का कारण बन सकती है।
सच यह है कि आज ज़रूरत आपसी एकता की है। मुसलमानों को आपस में लड़ने के बजाय एक-दूसरे का साथ देना चाहिए। साथ ही उन लोगों और राजनीतिक दलों के साथ खड़े होना चाहिए जो आज भी नफ़रत की राजनीति का विरोध करते हैं।
अगर बयानबाज़ी इसी तरह चलती रही, तो हालात बेहतर होने के बजाय और ख़राब होंगे। इसलिए नेताओं और रहनुमाओं को बहुत सोच-समझकर बोलना चाहिए, ताकि देश का माहौल बिगड़े नहीं और आम मुसलमान बेवजह मुश्किल में न पड़ें।
लेखक: इक़बाल अहमद जकाती







