सच को व्यक्त करने का इस्लामी तरीका
आज का दौर सोशल मीडिया का है, जहाँ बात कुछ ही पलों में फैल जाती है और थोड़े समय में लोगों की राय बन जाती है। इसी कारण अब वैचारिक बहसें, धार्मिक चर्चाएँ और ज्ञान की बातें सीमित लोगों तक नहीं रहीं, बल्कि आम समाज का विषय बन गई हैं। हाल ही में मशहूर लेखक जावेद अख्तर और युवा इस्लामी विद्वान मुफ़्ती शमाइल नदवी के बीच ईश्वर के अस्तित्व पर हुई बहस ने भी लोगों का खूब ध्यान खींचा। ठंड का मौसम, बड़ी भीड़ और लाखों दर्शक इस बात का संकेत थे कि आज भी लोगों के दिलों में ईश्वर, सृष्टि और जीवन के अर्थ से जुड़े सवाल जीवित हैं।
इस बहस में दिए गए तर्कों से यह स्पष्ट हुआ कि जब सच को मजबूत और समझदारी के साथ पेश किया जाता है, तो वह खुद सामने आ जाता है। लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि मंच पर कौन जीता, बल्कि यह है कि उसके बाद हमारा व्यवहार क्या रहा और क्या होना चाहिए था।
अफ़सोस की बात है कि हम अक्सर छोटी-सी कामयाबी को बड़ी जीत समझकर भावनात्मक उत्सव में बदल देते हैं। खुशी मनाना स्वाभाविक है, लेकिन जब यह दिखावा, बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने और शोर-शराबे में बदल जाए, तो इसका उलटा असर होता है। फूलों की बारिश, बार-बार स्वागत और जीत के नारे इस्लामी दावत की गरिमा के ख़िलाफ़ हैं।
इस्लाम का स्वभाव शोर नहीं, बल्कि शांति, संतुलन और समझदारी है। वह भावनाओं को भड़काने के बजाय उन्हें नैतिकता और विवेक के अधीन रखता है। पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ की ज़िंदगी इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। मक्का की महान विजय के दिन भी उनका सिर झुका हुआ था, ज़बान पर शुक्र था और दिल में विनम्रता।
दरअसल बहस के बाद का समय दावत का समय था। यह मौका था कि असहमत लोगों तक प्यार और सोच-विचार के साथ पहुँचा जाए, ताने और मज़ाक की जगह चिंतन की दावत दी जाए। ईश्वर के अस्तित्व पर बहस जीतने के बाद सबसे बेहतर तरीका यह होता कि लोगों को प्रकृति, ब्रह्मांड और अपने भीतर झाँकने की प्रेरणा दी जाती और क़ुरआन को सिर्फ़ तर्क की किताब नहीं, बल्कि मार्गदर्शन की किताब के रूप में पेश किया जाता। लेकिन दुर्भाग्य से यह अवसर भावनात्मक नारों और विरोधियों की हँसी उड़ाने में खो गया।
ऐसा व्यवहार न दावत है, न ज्ञान और न ही इस्लामी चरित्र। इस्लाम मतभेद को दुश्मनी में बदलने की इजाज़त नहीं देता और न ही दूसरों को नीचा दिखाकर खुद को ऊँचा साबित करने की शिक्षा देता है। सच अपने आप में ऊँचा होता है, उसे साबित करने के लिए शोर की ज़रूरत नहीं होती।
इससे भी ज़्यादा चिंता की बात यह है कि कुछ लोग इस बहस को ही सच और झूठ का अंतिम पैमाना मानने लगे हैं और यह समझने लगे हैं कि ईश्वर के अस्तित्व को साबित करने के लिए सिर्फ़ तर्क और दर्शन ही रास्ता है। यह सोच अधूरी है। तर्क और दर्शन अपनी जगह उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन ईमान सिर्फ़ बहसों या दार्शनिक बातों से पैदा नहीं होता। ईमान फितरत, वह़ी और नैतिक अनुभव के मेल से बनता है।
दीन की दावत कोई एक भाषण, एक बहस या एक वायरल वीडियो नहीं है। यह एक लंबी, धैर्य भरी और लगातार चलने वाली प्रक्रिया है, जिसमें धीरे-धीरे आगे बढ़ना, चुपचाप मेहनत करना, गहरी सोच और मज़बूत नैतिकता शामिल होती है। जो लोग शोर को ही सफलता समझ लेते हैं, वे असली काम से दूर हो जाते हैं।
लेखक: ज़की नूर अज़ीम नदवी, लखनऊ

