हालात से जागरूकता समय की अहम ज़रूरत
लेखक: मोहम्मद आज़म शाहिद
मेरे एक परिचित, जो स्वयं को बहुत गंभीर और समझदार मानते हैं, हाल ही की एक बातचीत के दौरान कह रहे थे, “मैं अख़बार नहीं पढ़ता।” अपनी बात को मेरे सामने स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि अख़बार पढ़ना समय की बर्बादी है और जो कुछ कहीं भी हो रहा है, उसे जानकर हमें क्या हासिल होता है। हमें तो अपनी ज़िंदगी अपने प्रयासों से जीनी है, दूसरों के बारे में जानकर हमें क्या मिलेगा। अपनी बात समाप्त करते हुए वे मेरे अख़बार पढ़ने की आदत और रुचि का मज़ाक उड़ाते रहे। हालात से जागरूकता के प्रति उनकी उदासीनता पर मैं कुछ कह नहीं सका—इसलिए भी कि जिनके लिए समय का उपयोग केवल लाभ-हानि की कसौटी पर परखना ही सबसे अहम हो, उनसे कैसी बहस की जाए।
जब मैं विदा हो रहा था, तो मेरे मन में कई बातें उभरती रहीं। एक यह कि हमारे देश में ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है, जो बदलते हालात और घटनाओं से दूरी बनाए रखना अपना निजी स्वभाव समझते हैं। सरकारें जो भी फैसले करती हैं और नए-नए कानून बनते हैं, उनका अमल अक्सर एकतरफ़ा निर्णयों पर आधारित होता है, जिसके परिणामस्वरूप एक खास वर्ग को लाभ मिलता है और अन्य वर्गों के हितों को नुकसान पहुंचता है। ऐसे घटनाक्रम हमारे देश में आए दिन होते रहे हैं, लेकिन अधिकांश लोग सब कुछ अपनी आंखों के सामने होते देख कर भी चुप रहना और सहना ही अपनी भलाई समझते हैं।
ऐसे लोगों का मानना है कि अपने आसपास हो रही घटनाओं से अलग-थलग रहकर ही हम सुरक्षित रह सकते हैं। इन मामलों में उलझना, उन पर बात करना, उन्हें परखना, विश्लेषण करना और समझने की कोशिश करना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल नहीं होता। वे खामोश दर्शक बनकर समय की धारा में बहते रहते हैं और अपनी इसी सोच को अपने लिए बेहतर मानने के आदी हो जाते हैं। स्वार्थपूर्ण सांप्रदायिकता का ज़हर शांति के माहौल में घोला जाता रहता है, और इन साज़िशों को समझना भी हमारी ज़िम्मेदारी है।
जब कभी सरकारों द्वारा हमारे हितों के खिलाफ फैसले किए जाते हैं, तो चिंतित लोग सामूहिक रूप से कुछ संस्थाओं और संगठनों के माध्यम से सरकार के सामने तर्कपूर्ण मांगें रखते हैं कि ऐसे कदम वापस लिए जाएं। जब कोई कार्रवाई नहीं होती, तो अदालतों का दरवाज़ा खटखटाया जाता है। सामूहिक रूप से जनहित याचिकाएं दायर की जाती हैं, मुकदमों की पैरवी होती है, और यदि फैसले वापस लेने में देर हो, तो विरोध-प्रदर्शन किए जाते हैं। लोकतांत्रिक दायरे में अपने संवैधानिक अधिकारों और सुविधाओं की प्राप्ति के लिए आंदोलन किए जाते हैं। लेकिन जब तक बड़ी संख्या में प्रभावित लोग इन प्रयासों में शामिल नहीं होते, तब तक ये कोशिशें सफल नहीं हो पातीं।
हालात की मांग यही है कि हर व्यक्ति अपने सही विवेक का समय पर उपयोग करे, अपनी व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी को व्यवहार में महसूस करे, और किसी भी प्रकार की अन्यायपूर्ण कार्रवाई व अधिकारों के हनन के खिलाफ समान विचार रखने वालों के साथ खड़ा हो। अन्यथा, जो लोग हालात से दूरी बनाए रखते हैं, वे अनजाने में सामूहिकता से कटे रहने की कीमत चुकाने को मजबूर होते हैं।
आमतौर पर देश के मुसलमानों में हालात से जागरूकता, घटनाओं की समझ और उनके संभावित प्रभावों के प्रति उदासीनता देखी जाती रही है। लेकिन जब लगातार जागरूकता फैलाने और सरकार के नुकसानदेह फैसलों के बारे में जानकारी देने के प्रयास हुए हैं, तब मुसलमानों ने सामूहिकता का परिचय दिया है और एक आवाज़ बनकर अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आगे बढ़े हैं। यह भी देखा गया है कि ऐसी प्रतिरोध, विरोध और प्रदर्शनों को विफल करने के लिए सरकार ने कई बार अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया है। पुलिस को अधिकार देकर डराने-धमकाने की कोशिशें की गई हैं। ऐसी अनेक मिसालें हमारे सामने हैं।
चाहे नागरिकता संशोधन कानून का मामला हो या वक़्फ़ संशोधन कानून का विवाद—देश के मुसलमानों ने एकजुटता का प्रमाण दिया है। इसी के चलते कुछ हद तक हालात का रुख बदला और संभावित अधिकार हनन तथा संवैधानिक सुविधाओं की अवहेलना की तीव्रता में कमी आई।
कुल मिलाकर, हालात से वाक़िफ़ रहने की जो अहम ज़रूरत है, उसके प्रति हम लोग उदासीनता और लापरवाही का शिकार हैं। इतिहास गवाह है कि जो लोग हालात के अनुसार खुद को नहीं बदलते, वे पीछे रह जाते हैं; और जो समय की मांग के अनुरूप स्वयं को ढाल लेते हैं, वही सफल और सम्मानित होते हैं। सोशल मीडिया के बेहतर और सकारात्मक उपयोग को रेखांकित करते हुए कई चिंतित बुद्धिजीवियों ने जागरूकता फैलाने की कोशिश की है कि सम्मानजनक और आत्मविश्वास से भरे जीवन के लिए हालात से तालमेल रखना ज़रूरी है।
आधुनिक तकनीक के इस दौर में संचार माध्यमों का काफी विकास हुआ है। अख़बार, टेलीविज़न और सोशल मीडिया के ज़रिए घटती घटनाओं और हालात, विशेषकर उन मुद्दों से जिनका हमसे प्रत्यक्ष या परोक्ष संबंध हो, हमें लगातार अवगत रहना चाहिए। इस संदर्भ में जब भी हमने लापरवाही बरती है, नुकसान निश्चित रूप से हमारा ही हुआ है। जानकारी से अवगत रहने की जिज्ञासा हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। अन्यथा, कई डिग्रियां हासिल करने के बाद भी यदि हमारे भीतर समकालीन जागरूकता के प्रति ज़िम्मेदारी का भाव न हो, तो हम अशिक्षित और पिछड़े ही माने जाएंगे। यह स्पष्ट है कि सूचना का संकट हमें हर तरह के संकट में डाल देगा।







