आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने दावा किया था कि संगठन को औपचारिक पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है. मौजूदा क़ानूनी प्रावधानों में उसे छूट मिली हुई है. कर्नाटक के गृहमंत्री प्रियंक खरगे ने कहा कि जिस देश में हर ठेला-फेरी लगाने वाले को भी पंजीकरण कराना पड़ता है, वहां आरएसएस जैसा संगठन क़ानून से ऊपर कैसे हो सकता है. वे दिखाएं कि उन्हें संविधान के प्रावधानों से कैसे छूट प्राप्त है. 

 

नई दिल्ली: कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियंक खरगे ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को चुनौती देते हुए पूछा है कि वह उन्हें बताए कि किस कानून के तहत संगठन को सरकार के प्रति जवाबदेह होने से छूट मिली हुई है. उन्होंने कहा कि जिस देश में हर ठेला-फेरी लगाने वाले को भी पंजीकरण कराना पड़ता है, वहां आरएसएस जैसा संगठन कानून से ऊपर कैसे हो सकता है.

डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, 10 जून को की गई अपनी टिप्पणियों में कांग्रेस नेता ने आरएसएस नेताओं को अपने कार्यालय आने और संगठन की कानूनी स्थिति से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत करने का भी निमंत्रण दिया.

उन्होंने कहा, ‘आरएसएस मुझे अपने केशव कृपा मुख्यालय बुलाए. वे मुझे वह कानून दिखाएं जिसके तहत उन्हें सरकार के प्रति जवाबदेह होने से छूट मिली है. या फिर वे दस्तावेज लेकर मेरे कार्यालय आएं. वे दिखाएं कि उन्हें संविधान के प्रावधानों से कैसे छूट प्राप्त है. मैं इसकी जांच करूंगा. अगर मैं गलत हुआ तो माफी मांग लूंगा, वरना उन्हें अपनी गलती सुधारनी होगी.’

खरगे लगातार आरएसएस पर सवाल उठाते रहे हैं. आरएसएस सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का वैचारिक आधार है. और इसके प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि संगठन को औपचारिक पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है.

भागवत ने विवादास्पद रूप से दावा किया था कि आरएसएस एक ‘व्यक्तियों के समूह’ (body of individuals) के तौर पर काम करता है, जिसे मौजूदा कानूनी प्रावधानों के तहत पहले से ही मान्यता मिली हुई है.

भागवत ने कहा था, ‘हमें ‘व्यक्तियों के समूह’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है और हम एक मान्यता प्राप्त संगठन हैं. आयकर विभाग ने हमसे इनकम टैक्स भरने को कहा था, और मामला अदालत तक गया था. अदालत ने कहा कि यह व्यक्तियों का एक समूह है और हमारी गुरु दक्षिणा (दान) को आयकर से छूट दी गई.’

पिछले महीने खरगे ने आरएसएस और उससे जुड़े 2,500 से अधिक संगठनों के नेटवर्क का ‘सार्वजनिक ऑडिट’ कराने की मांग की थी.

उन्होंने कहा कि जहां आरएसएस और उससे जुड़े संगठन बिना रजिस्ट्रेशन के काम कर रहे हैं और इसलिए कानून के दायरे से बाहर हैं, वहीं, दूसरी ओर मोदी सरकार विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) का इस्तेमाल करके कई गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) की कार्यप्रणाली पर लगातार अंकुश लगा रही है.

इस कानून का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय संगठनों या अंतरराष्ट्रीय फंड पाने वाले घरेलू संगठनों की गतिविधियों पर नज़र रखने और उन पर रोक लगाने के लिए किया जा रहा है, जिससे नागरिक अधिकारों, मानवीय कार्यों और धार्मिक स्वतंत्रता पर असर पड़ रहा है.

सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट में खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीति में आने से पहले की विदेश यात्राओं पर भी सवाल उठाए. उन्होंने लिखा, ‘जब मोदीजी स्वयं को ‘फकीर’ कहते थे और आरएसएस प्रचारक थे, तब उन्होंने अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन, गुयाना, कनाडा, मलेशिया और फ्रांस सहित 14 से अधिक देशों की यात्रा की थी. उन यात्राओं का खर्च किसने उठाया? क्या इसके लिए आरएसएस, यानी तथाकथित रजिस्ट्रेशन वाले ‘एनजीओ’ ने पैसे दिए थे?’

डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट के अनुसार, 10 जून को खरगे ने कहा कि ‘ऐसे देश में जहां सड़क पर सामान बेचने वाले को भी पंजीकरण कराना पड़ता है, मंदिरों और देवताओं तक को प्राप्त प्रत्येक दान का हिसाब देना पड़ता है और नागरिकों को आयकर रिटर्न दाखिल करना पड़ता है, वहां आरएसएस को छूट नहीं मिल सकती.’

उन्होंने आगे कहा, ‘वे लगातार खुद को ‘व्यक्तियों का समूह’ बताते हैं. बेंगलुरु क्लब भी ‘लोगों का एक समूह’ है.’

राज्य के गृह मंत्री का पद संभालने के बाद एक ट्वीट में प्रियंक खरगे ने आरएसएस से कहा था कि वह पंजीकरण के लिए ‘अपने दस्तावेज तैयार रखे.’

इसके जवाब में भाजपा नेता सीटी रवि ने दावा किया था कि पूर्व प्रधानमंत्रियों जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने भी आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की थी, लेकिन सफल नहीं हुए.

इस पर खरगे ने डेक्कन हेराल्ड से कहा, ‘मुझे नहीं लगता कि सीटी रवि को इतिहास की जानकारी है. आरएसएस पर प्रतिबंध लगने के बाद उसके नेताओं ने नेहरू और सरदार पटेल के पैरों में गिरकर गुहार लगाई थी. जब इंदिरा गांधी ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया था, तब उसके सरसंघचालक ने आपातकाल का समर्थन करते हुए एक लंबा तारीफ भरा पत्र लिखा था.’

Source: The Wire