युवा आवाज़ों को लाठी नहीं, जवाब चाहिए
ताक़त नहीं, एतमाद से मसाइल हल होते हैं
ख़ून से लथपथ दिल्ली और नौजवानों की बेचैनी
लाठी नहीं, मुकालमा ही जम्हूरियत का रास्ता

 

दिल्ली की सड़कों पर तलबा (छात्रों) पर बरसती पुलिस की लाठियां सिर्फ़ कुछ नौजवानों को ज़ख्मी नहीं कर रहीं, बल्कि पूरा मुल्क इस मंजर से आहत हो रहा है। यह किसी भी जम्हूरी समाज के लिए अच्छी अलामत नहीं है।

एहतिजाज (विरोध प्रदर्शन) करना हर नागरिक का जम्हूरी हक़ है। लेकिन एहतिजाज के नाम पर कानून तोड़ने या मुल्क के अहम इदारों की सलामती को ख़तरे में डालने की इजाज़त भी नहीं दी जा सकती। संसद की हिफाज़त करना हुकूमत और पुलिस की जिम्मेदारी है। अगर कोई गिरोह या समूह संसद की तरफ़ मार्च करता है, तो उसे रोकना भी ज़रूरी है।

लेकिन असल सवाल यह है कि क्या हर मसले का आख़िरी हल सिर्फ़ लाठी ही है?

अगर तलबा कई दिनों से एहतिजाज कर रहे हों, भूख हड़ताल जारी हो और संसद मार्च का ऐलान पहले से हो चुका हो, तो हुकूमत को पहले ही हालात की नज़ाकत समझ लेनी चाहिए थी। ऐसे वक़्त में बातचीत और मुकालमे का रास्ता ज़्यादा समझदारी भरा होता।

करीब 40 दिनों से जारी एहतिजाज और 20 दिनों की भूख हड़ताल के बाद संसद मार्च कोई अचानक होने वाला वाक़या नहीं था। हुकूमत के पास काफ़ी वक़्त था। अगर पहले ही तलबा के नुमाइंदों से बात की जाती, उनके मसाइल सुने जाते और उनकी बेचैनी को समझने की कोशिश होती, तो शायद यह नौबत ही न आती।

आज की नौजवान नस्ल पहले की नस्लों से अलग है। यह वह पीढ़ी है जिसने सख़्त मार और डांट से ज़्यादा आज़ादी और सहूलियत के माहौल में परवरिश पाई है। मोबाइल और सोशल मीडिया इसकी ज़िंदगी का अहम हिस्सा हैं। पुलिस की लाठी इनके लिए एक अजनबी तजुर्बा है।

जब किसी नौजवान पर लाठी पड़ती है, तो सिर्फ़ उसके जिस्म पर चोट नहीं लगती, बल्कि उसके दिल में भी एक सवाल उठता है—
“क्या मेरी बात सुनने वाला कोई नहीं?”

आज सोशल मीडिया का दौर है। पुलिस की एक लाठी, एक चीख़ और एक तस्वीर कुछ ही लम्हों में पूरे मुल्क तक पहुँच जाती है। फिर वही तस्वीर हज़ारों नौजवानों के ग़ुस्से और मायूसी की वजह बन जाती है।

इसीलिए हुकूमत को बेहद हिकमत और सब्र से काम लेना होगा। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ये नौजवान हमारे अपने बच्चे हैं। मुल्क का निज़ाम, तालीमी इदारे, किसान, मज़दूर और पूरा समाज आखिर इन्हीं के बेहतर मुस्तकबिल के लिए मेहनत कर रहा है।

इसलिए नौजवानों को सिर्फ़ काबू करने की नहीं, उन्हें समझने की ज़रूरत है।

तलबा जोश और जज़्बात से भरे होते हैं। कभी-कभी वह जज़्बाती होकर ग़लत क़दम भी उठा सकते हैं। लेकिन एक जिम्मेदार हुकूमत का फ़र्ज़ सिर्फ़ सज़ा देना नहीं, बल्कि सही रास्ता दिखाना भी है।

हुकूमतों की असली ताक़त पुलिस की लाठी नहीं, बल्कि अवाम का एतमाद होता है। किसी एक वज़ीर का इस्तीफ़ा हुकूमत के लिए बहुत बड़ा नुकसान नहीं होता। वज़ीर बदल सकते हैं, हुकूमतें बदल सकती हैं, लेकिन अगर नौजवानों का भरोसा टूट जाए, तो उसे दोबारा हासिल करना आसान नहीं होता।

आज हुकूमत के सामने एक अहम मौक़ा है। वह इस एहतिजाज को सिर्फ़ एक सियासी मसला समझकर नज़रअंदाज़ कर सकती है, या इसे एक गंभीर चेतावनी मानकर नौजवानों से बातचीत का रास्ता अपना सकती है।

यह ग़ुस्सा सिर्फ़ किसी एक इम्तिहान, किसी एक फ़ैसले या किसी एक शख़्स के इस्तीफ़े तक सीमित नहीं भी हो सकता। इसके पीछे नौजवानों की वह बेचैनी हो सकती है जो लंबे अरसे से उनके दिलों में जमा होती जा रही है।

दुनिया की तारीख़ गवाह है कि जब नौजवानों की आवाज़ को लगातार नज़रअंदाज़ किया जाता है, तो छोटा सा एहतिजाज भी बड़े संकट की शक्ल अख़्तियार कर सकता है। भारत एक जम्हूरी मुल्क है। यहां मुख़ालिफ़ आवाज़ों को दबाने के बजाय उन्हें सुनने की रवायत मज़बूत होनी चाहिए।

अभी भी वक़्त हाथ से नहीं निकला है। हुकूमत को चाहिए कि वह तलबा से बातचीत करे, उनके मुतालिबात सुने, जो जायज़ हों उन पर फ़ौरन अमल करे और माहौल को और बिगड़ने से बचाए।

क्योंकि आज जिन नौजवानों के हाथों में एहतिजाज के बैनर हैं, कल उन्हीं हाथों में इस मुल्क की जिम्मेदारी होगी।

उन्हें लाठी नहीं, यक़ीन चाहिए।
उन्हें ख़ौफ़ नहीं, बेहतर मुस्तकबिल चाहिए।
उन्हें ख़ामोशी नहीं, अपनी बात कहने का हक़ चाहिए।

और हुकूमत को यह समझना होगा कि—

लाठी किसी नौजवान को कुछ देर के लिए ख़ामोश कर सकती है, लेकिन मुकालमा ही उसके दिल का ग़ुस्सा कम कर सकता है।

इसलिए दिल्ली को और ज़्यादा ख़ून-ख़राबे से बचाइए…
नौजवानों से लड़िए नहीं, उनसे बात कीजिए।

लेखक: शरफ़ुद्दीन सैयद, बेंगलुरु

Source: Haqeeqat Times