हर साल 10 हज़ार से ज़्यादा किसान खुदकुशी को मजबूर, ज़िम्मेदार कौन?
हाल ही में हैदराबाद के शम्साबाद स्थित बहादुरगुड़ा गांव में प्रस्तावित बुलेट ट्रेन हब के लिए करीब 650 एकड़ ज़मीन की घेराबंदी के दौरान हुए विवाद ने एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या विकास परियोजनाओं के नाम पर किसानों की रोज़ी-रोटी और उनके अधिकारों को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है?
किसानों का कहना है कि वे वर्षों से इस ज़मीन पर खेती कर रहे हैं और यही उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है। हालांकि सरकारी रिकॉर्ड में इस ज़मीन को सरकारी भूमि बताया जा रहा है। ऐसे में कानूनी विवाद अपनी जगह है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल उन परिवारों के भविष्य का है, जो दशकों से इसी खेती पर निर्भर हैं।
लेख में कहा गया है कि किसी भी विकास परियोजना की सफलता तभी संभव है जब प्रभावित लोगों को विश्वास में लिया जाए। यदि सरकार वास्तव में इस परियोजना को जनहित में मानती है, तो प्रभावित किसानों को उचित मुआवज़ा, वैकल्पिक भूमि या बेहतर पुनर्वास पैकेज दिया जाना चाहिए।
किसानों की आत्महत्या अब भी बड़ा संकट
लेख के मुताबिक, देश में हर साल 10 हज़ार से अधिक किसान आत्महत्या कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार:
- 2015 में: 12,602 किसान आत्महत्याएं
- 2024 में: 10,546 किसान आत्महत्याएं
विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ता कर्ज़, फसलों का नुकसान, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाएं और आर्थिक दबाव किसानों को इस क़दम तक पहुंचा रहे हैं।
कई मामलों में कर्ज़ माफी की योजनाओं का लाभ छोटे और मध्यम किसानों तक नहीं पहुंच पाता, जबकि बैंकों की वसूली का दबाव लगातार बना रहता है।
सरकारी दावे बनाम किसानों की मांग
लेख में कहा गया है कि सरकार की ओर से पीएम किसान सम्मान निधि, एमएसपी (MSP) में बढ़ोतरी और कृषि बजट बढ़ाने जैसे दावे किए जाते हैं। वहीं किसान संगठन अब भी एमएसपी की कानूनी गारंटी, कर्ज़ राहत और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की मांग कर रहे हैं।
लेख में यह भी उल्लेख है कि 2020-21 के किसान आंदोलन के दौरान सरकार ने कई आश्वासन दिए थे। तीनों कृषि कानून 2021 में वापस ले लिए गए, लेकिन किसानों का कहना है कि उनके मूल मुद्दे आज भी हल नहीं हुए हैं।
ज़िम्मेदार कौन?
लेखक सवाल उठाते हैं कि जब हर साल इतनी बड़ी संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे हैं, तो इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा? क्या सरकार की यह ज़िम्मेदारी नहीं है कि किसानों को आर्थिक सुरक्षा, उचित फसल मूल्य और समय पर राहत उपलब्ध कराए?
लेख में यह भी कहा गया है कि आज भी कई राज्यों में किसान अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं।
वैश्विक चिंता भी बनी आत्महत्या
लेख में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि दुनिया में हर साल करीब 8 लाख लोग आत्महत्या करते हैं और लगभग हर 40 सेकंड में एक व्यक्ति अपनी जान गंवा देता है।
ब्रिटेन और जापान जैसे देशों में अकेलेपन और मानसिक स्वास्थ्य से निपटने के लिए विशेष पहल की गई है। लेखक का मानना है कि भारत में भी किसानों, छात्रों, बेरोज़गारों और आर्थिक संकट से जूझ रहे लोगों के लिए मज़बूत सामाजिक और मानसिक सहायता व्यवस्था विकसित करने की ज़रूरत है।
मुख्य सवाल
क्या सिर्फ़ योजनाओं और घोषणाओं से किसानों की ज़िंदगी बदलेगी, या फिर ज़मीनी स्तर पर ठोस कदम उठाने होंगे?
नोट: यह सारांश लेखक सरफ़राज़ अहमद क़ासमी के लेख पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के हैं।
रिपोर्ट: सरफ़राज़ अहमद क़ासमी, हैदराबाद
Source: Haqeeqat Times

