क्या राजनीतिक फायदे के लिए राष्ट्रीय विरासत को नजरअंदाज करना सही है?

 

देश में असहिष्णुता, राजनीतिक बदले की भावना और इतिहास को अपने-अपने राजनीतिक फायदे के हिसाब से देखने का रुझान अब कोई नई बात नहीं रह गई है। पिछले कुछ समय में यह मामला ज्यादा prominently सामने आया है। राजनीतिक स्तर पर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या मौजूदा नेतृत्व अपनी राजनीतिक कामयाबी साबित करने के लिए पिछली पीढ़ी के नेताओं और उनके ऐतिहासिक योगदान को कम करके दिखाने की कोशिश कर रहा है?

सवाल यह नहीं है कि पुराने नेताओं से गलतियां नहीं हुईं। गलतियां हुईं और उन पर आलोचना भी होनी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या राजनीतिक मतभेदों की वजह से किसी नेता की पूरी सेवाओं और योगदान को नजरअंदाज किया जा सकता है?

राज्यसभा में असहिष्णुता के मुद्दे पर हुई बहस के दौरान जनता दल यूनाइटेड के वरिष्ठ नेता के. सी. त्यागी ने महत्वपूर्ण बात कही थी। उन्होंने सत्ता पक्ष से कहा था कि देश के पूर्व नेताओं और उनके ऐतिहासिक विरासत को मिटाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। पुराने नेताओं को राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय देश के लिए उनकी सेवाओं को भी स्वीकार किया जाना चाहिए। उनका इशारा मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी की ओर था।

यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अब भारतीय राजनीति में बहस सिर्फ सरकार और विपक्ष के बीच नहीं रही, बल्कि इतिहास भी राजनीतिक मुकाबले का मैदान बनता जा रहा है।

नेताओं की उपलब्धियों को स्वीकार करना राजनीतिक समर्थन नहीं

मोतीलाल नेहरू एक कामयाब वकील थे और उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत थी, लेकिन उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया और जेल भी गए। जवाहरलाल नेहरू ने आजादी से पहले लंबा समय जेल में बिताया और आजादी के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री के रूप में भारत के राजनीतिक, आर्थिक और विदेश नीति के ढांचे को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उनके फैसलों पर आलोचना होनी चाहिए, लेकिन उनके ऐतिहासिक किरदार से इनकार नहीं किया जा सकता। यह समझना जरूरी है कि किसी व्यक्ति की राष्ट्रीय सेवाओं को स्वीकार करना उसकी राजनीतिक हिमायत करना नहीं है।

भारत की इतिहास में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, डॉ. बी. आर. आंबेडकर, मौलाना अबुल कलाम आजाद, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री और जयप्रकाश नारायण समेत कई नेताओं का योगदान रहा है।

इनमें से किसी एक को बड़ा साबित करने के लिए दूसरे को छोटा करना जरूरी नहीं है।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ऐसा महसूस होने लगा है कि राजनीतिक इतिहास में भी यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि किसका नाम लिया जाए और किसका नहीं।

महाराष्ट्र में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय हस्तियों से जुड़ी सरकारी कार्यक्रमों की सूचियों को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। मौलाना अबुल कलाम आजाद का नाम सरकारी स्तर की ऐसी सूची से हटाए जाने को लेकर भी सवाल उठे थे। इसे सिर्फ एक नाम को शामिल या बाहर करने का मामला समझना ठीक नहीं होगा।

मौलाना आजाद और मुस्लिम नेताओं का योगदान

मौलाना अबुल कलाम आजाद स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री थे। वे स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार, विद्वान और राष्ट्रीय राजनीति के महत्वपूर्ण नेता थे। भारत में उच्च शिक्षा और शैक्षणिक संस्थानों के विकास में उनका अहम योगदान रहा। 11 नवंबर को उनकी जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय शिक्षा दिवस मनाया जाता है।

इसके बावजूद अगर किसी राजनीतिक प्राथमिकता या वैचारिक मतभेद की वजह से उन्हें राष्ट्रीय स्मृति में कम जगह दी जाती है तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

मसला सिर्फ मौलाना आजाद का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत के इतिहास को राजनीतिक विचारधारा के हिसाब से दोबारा व्यवस्थित किया जाएगा?

महाराष्ट्र की राजनीतिक इतिहास भी कई मुस्लिम नेताओं के योगदान से समृद्ध है। ए. आर. अंतुले राज्य के पहले मुस्लिम मुख्यमंत्री थे। वे अपनी बेबाकी और प्रशासनिक अंदाज के लिए जाने जाते थे।

बाल ठाकरे और अंतुले का उदाहरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों की राजनीति एक-दूसरे से काफी अलग थी। इसके बावजूद ठाकरे ने अंतुले के कुछ राजनीतिक और प्रशासनिक गुणों की तारीफ की थी।

इसी तरह रफी अहमद किदवई भी उन नेताओं में शामिल हैं जिन्हें आजादी के बाद देश के लिए उनकी सेवाओं के कारण याद किया जाता है। खाद्य संकट के दौर में जब उन्होंने खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति से जुड़ी जिम्मेदारी संभाली, तब उनके सादगीपूर्ण जीवन के उदाहरण भी दिए जाते रहे।

ये उदाहरण बताते हैं कि पहले राजनीतिक मतभेदों के बावजूद राष्ट्रीय सेवाओं को स्वीकार करने की एक परंपरा मौजूद थी। आज जरूरत इस बात की है कि यह परंपरा खत्म न हो।

नेहरू की आलोचना हो, लेकिन इतिहास से बाहर नहीं

नेहरू के खिलाफ राजनीतिक अभियान कई वर्षों से जारी है। कश्मीर, चीन, आर्थिक नीति और विदेश नीति समेत कई मुद्दों पर उनके फैसलों की आलोचना की जा सकती है।

लेकिन नेहरू को कम करने से सरदार पटेल की अहमियत न कम होती है और न बढ़ती है। पटेल का योगदान अपनी जगह है और नेहरू का योगदान अपनी जगह।

नेहरू के दौर में वैज्ञानिक संस्थानों, उच्च शिक्षा, औद्योगिक योजना और सार्वजनिक क्षेत्र के कई महत्वपूर्ण संस्थान स्थापित हुए। गुटनिरपेक्ष आंदोलन में भारत की भूमिका भी उसी दौर की महत्वपूर्ण विदेश नीति का हिस्सा थी।

शीत युद्ध के दौरान भारत ने अमेरिका या सोवियत संघ में से किसी एक गुट का हिस्सा बनने के बजाय अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखने की कोशिश की। इस नीति से असहमति हो सकती है, लेकिन इसे इतिहास से हटाया नहीं जा सकता।

इंदिरा गांधी के दौर का दूसरा पहलू भी याद रखना होगा

इंदिरा गांधी के मामले में भी यही सिद्धांत लागू होना चाहिए।

1971 के युद्ध और बांग्लादेश के निर्माण के दौरान इंदिरा गांधी सरकार के राजनीतिक और कूटनीतिक फैसले भारतीय इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसी दौर से जुड़ा अटल बिहारी वाजपेयी का वह कथित बयान भी राजनीतिक इतिहास में दर्ज है, जिसमें उन्होंने इंदिरा गांधी को “दुर्गा” कहा था।

यह उस दौर की राजनीति का एक अलग पहलू था। राजनीतिक विरोधी होने के बावजूद राष्ट्रीय सफलता के मौके पर विरोधी नेता की तारीफ की गई।

लेकिन इंदिरा गांधी के राजनीतिक दौर का दूसरा पक्ष भी भुलाया नहीं जा सकता।

1975 की इमरजेंसी भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक काला अध्याय है। राजनीतिक विरोधियों की गिरफ्तारियां, प्रेस पर पाबंदियां और नागरिक स्वतंत्रताओं पर रोक को जायज नहीं ठहराया जा सकता। तुर्कमान गेट, जबरन नसबंदी और अन्य घटनाओं की भी कड़ी आलोचना हुई।

ऑपरेशन ब्लू स्टार और उसके बाद के घटनाक्रम ने देश को एक और गंभीर संकट में डाल दिया। 1984 के सिख विरोधी दंगों ने भारतीय राजनीति और समाज पर गहरा प्रभाव छोड़ा।

इसलिए इंदिरा गांधी की उपलब्धियों का जिक्र करने का मतलब उनकी हर नीति का समर्थन करना नहीं है। उसी तरह उनकी गलतियों का जिक्र करने का अर्थ यह भी नहीं कि उनकी सभी सेवाओं को खारिज कर दिया जाए।

1977 से आज की राजनीति के लिए सबक

1977 की राजनीतिक घटना आज की राजनीति के लिए भी एक सबक रखती है। इमरजेंसी के बाद जनता पार्टी ने बड़ी चुनावी कामयाबी हासिल की और इंदिरा गांधी सत्ता से बाहर हो गईं। जनता ने अपना फैसला सुना दिया था।

इसके बाद जनता पार्टी के पास मौका था कि वह देश को एक नए राजनीतिक दौर में ले जाए। लेकिन सरकार आंतरिक मतभेदों में घिर गई। सत्ता की खींचतान बढ़ी और इंदिरा गांधी के खिलाफ हुई कार्रवाइयों ने उन्हें दोबारा राजनीतिक रूप से पीड़ित नेता के तौर पर सामने आने का मौका दिया।

चिकमगलूर उपचुनाव ने उन्हें फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहुंचा दिया और 1980 में वे सत्ता में वापस आ गईं।

इससे एक साफ राजनीतिक सबक मिलता है कि जनता जिस नेता को चुनाव में हरा चुकी हो, उसे अनावश्यक बदले की कार्रवाई के जरिए दोबारा राजनीतिक फायदा नहीं देना चाहिए।

राजनीतिक मुकाबला चुनाव में होना चाहिए। सरकार अपनी performance के जरिए विपक्ष को जवाब दे, सिर्फ उसके अतीत को कुरेदकर नहीं।

2014 के बाद बदली भारतीय राजनीति

2014 में भाजपा को मिली चुनावी कामयाबी भारतीय राजनीति में एक बड़ा मोड़ थी। इसके बाद पार्टी ने कई राज्यों और राष्ट्रीय चुनावों में अपनी राजनीतिक ताकत साबित की। इस सफलता ने उसे देश की राजनीति में मजबूत स्थिति दी।

लेकिन बड़ी राजनीतिक ताकत के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी आती है।

सरकार के लिए दो चीजें बेहद महत्वपूर्ण हैं—खुद की तारीफ से बचना और बदले की राजनीति का impression पैदा न होने देना।

हर सरकार अपने काम का प्रचार करती है, यह स्वाभाविक है। लेकिन जब हर उपलब्धि को सिर्फ एक व्यक्ति, एक पार्टी या एक विचारधारा से जोड़ने की कोशिश होने लगे तो राजनीतिक बहस का दायरा सीमित हो जाता है।

इसी तरह अगर हर विरोधी को दुश्मन समझा जाए और हर पिछली सरकार को देश की समस्याओं के लिए जिम्मेदार बताया जाए तो लोकतांत्रिक राजनीति कमजोर होती है।

विपक्ष दुश्मन नहीं होता। वह सत्ता का विकल्प होता है।

अगर सरकार अच्छा काम करती है तो जनता उसे दोबारा चुनेगी। अगर सरकार नाकाम होती है तो जनता उसे बदल सकती है। यही लोकतंत्र है।

संस्थाओं पर भरोसा दोनों पक्षों की जिम्मेदारी

हाल के राजनीतिक बयानों में यह impression भी सामने आया है कि विपक्ष के कुछ नेताओं के खिलाफ होने वाली कार्रवाइयां राजनीतिक दबाव का हिस्सा हैं। सरकार को ऐसे सभी मामलों में transparency बनाए रखनी चाहिए, ताकि संस्थाओं की कार्रवाई पर राजनीतिक बदले का आरोप न लगे।

लेकिन विपक्ष को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। हर कानूनी कार्रवाई को राजनीतिक बदला कहना भी उचित नहीं है।

अगर किसी के खिलाफ कार्रवाई होती है तो उसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है, संसद में सवाल उठाया जा सकता है और जनता के सामने राजनीतिक जवाब दिया जा सकता है।

लोकतंत्र में संस्थाओं का सम्मान दोनों पक्षों की जिम्मेदारी है।

अल्ताफ हुसैन हाली ने “हयात-ए-जावेद” में यूरोपीय राष्ट्रों के हवाले से एक महत्वपूर्ण बात लिखी थी कि वे अपने देश के लिए सेवाएं देने वालों की सेवाओं को याद रखते हैं और उनकी व्यक्तिगत कमजोरियों को उनकी राष्ट्रीय सेवाओं पर हावी नहीं होने देते।

इतिहास को मिटाएं नहीं, संतुलित नजरिए से पढ़ें

भारत को भी इस मामले में balanced approach अपनानी होगी।

हम अपने नेताओं को देवता बनाकर पेश न करें, लेकिन उन्हें इतिहास से मिटाएं भी नहीं।

नेहरू की गलतियां भी पढ़ाई जाएं और उनकी उपलब्धियां भी।

इंदिरा गांधी की इमरजेंसी भी पढ़ाई जाए और 1971 का युद्ध भी।

मौलाना आजाद के राजनीतिक विचारों पर बहस भी हो और उनकी शिक्षा के क्षेत्र में सेवाओं को भी याद किया जाए।

सरदार पटेल और डॉ. आंबेडकर को उनका उचित सम्मान मिले, लेकिन इसके लिए नेहरू को मिटाने की जरूरत नहीं है।

गांधी के राजनीतिक विचारों से असहमति हो सकती है, लेकिन उनकी कुर्बानियों से इनकार नहीं किया जा सकता। भगत सिंह की जद्दोजहद और कुर्बानी भी उसी राष्ट्रीय इतिहास का हिस्सा रहनी चाहिए।

यह देश किसी एक परिवार, पार्टी या विचारधारा ने नहीं बनाया। यह अलग-अलग विचारों, राजनीतिक आंदोलनों, वर्गों और समुदायों की साझा कोशिशों से बना है।

इसलिए इतिहास को राजनीतिक मुकाबले का हथियार बनाना सही नहीं है।

आज जरूरत इतिहास को नए सिरे से लिखने से ज्यादा उसे पूरी तरह पढ़ने की है।

जो गलत हुआ, उसे गलत कहा जाए। जिसने गलत फैसला किया, उसकी आलोचना हो। लेकिन जो अच्छा हुआ, उसे भी स्वीकार किया जाए।

पिछली सरकारों की नाकामियों को सामने लाना मौजूदा सरकार का अधिकार है, लेकिन अपनी सफलता साबित करने के लिए अतीत के हर किरदार को नाकाम साबित करना राजनीतिक जरूरत नहीं होनी चाहिए।

सत्ता बदलती रहती है। सरकारें आती-जाती हैं। राजनीतिक पार्टियां सत्ता में आती हैं और विपक्ष में चली जाती हैं।

लेकिन देश कायम रहता है।
और इतिहास भी कायम रहता है।

आज जो लोग इतिहास के पन्नों से किसी का नाम कम कर रहे हैं, उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि आने वाली पीढ़ियां उनके अपने दौर का भी इसी पैमाने से मूल्यांकन करेंगी।

अगर आज कोई सरकार नेहरू का नाम कम करती है, तो कल कोई दूसरी सरकार मौजूदा नेताओं के नाम कम करने का justification तलाश सकती है। अगर आज इतिहास को राजनीतिक बदले का जरिया बनाया जाएगा तो कल यही तरीका किसी और के खिलाफ इस्तेमाल होगा।

इसलिए राजनीतिक लड़ाई राजनीति के मैदान में लड़ी जाए। चुनाव में लड़ी जाए। संसद में लड़ी जाए। जनता के बीच लड़ी जाए।

इतिहास को बदले का मैदान न बनाया जाए।

अपनी राजनीतिक विरासत मजबूत करने के लिए दूसरों की विरासत मिटाने की जरूरत नहीं है।

भारत को आज नई इतिहास-लेखन से ज्यादा एक संतुलित ऐतिहासिक चेतना की जरूरत है—ऐसी चेतना जो अपने नायकों को याद रखे, उनकी गलतियों से सबक ले, विरोधियों की खूबियों को भी स्वीकार करे और राष्ट्रीय इतिहास को किसी एक पार्टी का इतिहास बनने से रोके।

क्योंकि इतिहास मिटाने से इतिहास नहीं बदलता।
सिर्फ इतिहास के प्रति हमारा रवैया बदलता है।

और अगर हमने अपने अतीत को राजनीतिक जरूरत के मुताबिक बार-बार मिटाने की कोशिश की, तो आने वाली पीढ़ियों के पास भारत की एक मुकम्मल इतिहास नहीं, बल्कि अलग-अलग राजनीतिक सरकारों द्वारा बनाए गए कई विरोधाभासी भारत होंगे।

— जावेद जमालुद्दीन